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याददाश्त को प्रभावित कर रहा है सोशल मीडिया

हर दिन लाखों लोग सोशल मीडिया पर अपने अनुभव शेयर करते हैं। कई बार अपने परिवारों के अविस्मरणीय पलों को सोशल मीडिया...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 13, 2018, 05:15 AM IST

याददाश्त को प्रभावित कर रहा है सोशल मीडिया
हर दिन लाखों लोग सोशल मीडिया पर अपने अनुभव शेयर करते हैं। कई बार अपने परिवारों के अविस्मरणीय पलों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रखते हैं। मित्रों से जुड़े रहने और नए दोस्तों को जोड़ने के लिए ऐसा कोई साधन पहले नहीं मिला। लेकिन जितना संवाद इन माध्यमों से बढ़ रहा है, इसकी कीमत हमारा दिमाग चुका रहा है। स्मरण शक्ति पर इसका खराब असर हो रहा है।

हाल ही में जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल सोशल सायकोलॉजी के रिसर्चर ने इस बात का खुलासा किया। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की रिसर्चर डायना तेमिर के नेतृत्व में इस संबंध में तीन अध्ययन हुए हैं। इनमें पाया गया कि जो लोग परिवार के साथ आनंद मनाने कहीं गए थे, उन्होंने फोटो लिए, सोशल मीडिया पर शेयर किए, लेकिन जो क्विज़ में उनसे पूछा गया, उसका वे संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

तेमिर और उनकी टीम ने पाया कि सोशल मीडिया पर अनुभव शेयर करके भूल गए, लेकिन उन्होंने क्या आनंद किया, उसका भान ही नहीं रहा। सोशल मीडिया पूरी तरह से इसके लिए जिम्मेदार तो नहीं है, लेकिन फिर भी इसका असर है।

याददाश्त में दो चीजें रहती हैं, एक जो हम तय करते हैं कि इसे याद रखेंगे और एक बाहरी संकलन होता है, जैसे मेरी पुस्तक या कुछ और। इंटरनेट के पहले तक सूचनाएं ज्ञान के स्तर जाकर बोध के रूप में दिमाग में संकलित होती थीं। दूसरा बाहर का संकलन रहता था, जैसे विशेषज्ञता, पुस्तकें आदि। सूचना को इस तरीके से विभक्त करना यानी उपलब्ध ज्ञान का अधिकतम उपयोग है। छोटे स्तर पर भी देखें तो प्रेमी जोड़े तत्काल अपनी मेमोरीज़ को एक-दूसरे को शेयर कर देते हैं। दोनों ही इस बात के लिए जिम्मेदार होते हैं कि जो सूचना दी है, वह उन्हें याद रहेगी। चूंकि इंटरनेट पोर्टेबल यानी स्मार्टफोन के जरिए मिल रहा है, जो मस्तिष्क उसकी भी जहमत नहीं उठाता है। ‘गूगल इफेक्ट’ के कारण पहले जो स्मृतियों को फिर से उभारने पर जोर रहता था, वह कम होता जा रहा है।



नींद की क्वालिटी खराब होगी

एक अध्ययन के अनुसार कुछ लोग यदि सामान्य ज्ञान के प्रश्नों का उत्तर देने का खेल खेल रहे हैं तो उन्हें भरोसा है कि कंप्यूटर हर चीज़ का जवाब दे देगा। इससे वे अपने दिमाग में सूचनाओं के संग्रहण का जोर नहीं डालते। ये अध्ययन बताता है कि इसी तरह की प्रक्रिया अनुभवों के साथ भी होती है।

जो जानकारियां पहले मस्तिष्क में सहेजकर रखी जाती थीं, वे स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के कारण महज बाहरी ज्ञान बनकर रह गया है। भले ही ये हमारे डिवाइस में अक्षुण्ण रहे, लेकिन हमारी याददाश्त में नहीं रह पाती है। सोशल मीडिया से एक और नुकसान हुआ है ‘फोमो’ (FOMO) यानी मिस हो जाने का भय। शेयर्ड कंटेंट के बढ़ते जाने से यह एक नई परेशानी है। आप हमेशा इस बात की आशंका लिए रहते हैं कि कहीं आप कुछ चूक तो नहीं कर या फिर आप कहीं छूट तो नहीं गए। फोमो आपके साथ है, तो आप जीवन से संतुष्ट नहीं हैं। आपका मूड खराब है और आप भावनात्मक रूप से ठीक नहीं हैं।

सोशल मीडिया में भी इंस्टाग्राम मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक घातक है। डेढ़ हजार युवाओं पर हुए सर्वे में पाया गया कि इस फोटो बेस्ड प्लेटफॉर्म पर स्वयं के फोटो डालते हैं, लेकिन इसके साथ भारी उद्वेग, अवसाद और आशंकाएं जुड़ी रहती हैं। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया से लाभ नहीं है। कुछ स्तर तक फायदे हैं, लेकिन गंभीर दुष्परिणाम भी हैं। आपकी नींद की क्वालिटी इससे खराब होती है, साथ ही शरीर और मानसिकता दोनों ही खराब होते हैं।

बुजुर्ग साथ रहते हैं, शादी नहीं करना चाहते

ज्यूडिथ ग्राहम

बात तीन वर्ष पुरानी है। बुजुर्ग विलियम मेमेल सीढ़ियां चढ़कर मार्गरेट के अपार्टमेंट में महज इसलिए गए, ताकि खराब हो चुके उनके सीलिंग फैन को ठीक कर सके। जैसे ही फैन ठीक कर नीचे उतरे, मार्गरेट ने कहा कि आपने ये काम किया, मुझे बहुत अच्छा लगा। तत्काल विलियम ने मार्गरेट को प्रेम का प्रतीकात्मक इजहार कर दिया, जो मार्गरेट को चौंकाने वाला था, लेकिन उन्होंने भी इसे स्वीकार कर लिया।

विलियम 87 वर्ष के हैं और मार्गरेट 74 वर्ष की। दोनों एक दूसरे के प्रति आज भी पूरे आदर के साथ प्रतिबद्ध हैं। अधिकांशत: रात में वे दोनों साथ ही रहते हैं, रात में साथ खाना खाते हैं। भले ही दोनों में रोमांस है, लेकिन नॉर्थ कैरोलिना के ये बुजुर्ग रहते अलग-अलग घरों में रहते हैं। ये शादी करने के इच्छुक नहीं हैं, लेकिन दोनों में प्रेम अगाध है। आबादी के विशेषज्ञ इस प्रकार के संबंध को ‘लिविंग अपार्ट टूगेदर’ (एलएटी) कहते हैं।समाजशास्त्र की प्रोफेसर लॉरा फंक कहती हैं कि अमेरिकी समाज मे यह नए तरह के चलन है, जो बुजुर्गों में है। इन्होंने ‘लिविंग अपार्ट टूगेदर’ के बारे में खूब लिखा भी है। इस तरह के चलन से कई सवाल उठते हैं कि ये अपरंपरागत जोड़ा समाज पर क्या असर डालेगा?

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दैिनक भास्कर, सागर, 13 मई 2018, रविवार

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