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लगातार बर्फीले तूफान, हवा की रफ्तार भी 100 किमी से ज्यादा... फिर भी सीहोर की मिट्‌टी एवरेस्ट पर पहंुचाना ही है

मेघा की यह तस्वीर खुंबु ग्लेशियर की है जो 19 हजार फीट की ऊंचाई पर है।  23 हजार फीट की ऊंचाई से मेघा परमार...

Dainik Bhaskar

May 14, 2018, 05:30 AM IST
लगातार बर्फीले तूफान, हवा की रफ्तार भी 100 किमी से ज्यादा... फिर भी सीहोर की मिट्‌टी एवरेस्ट पर पहंुचाना ही है
मेघा की यह तस्वीर खुंबु ग्लेशियर की है जो 19 हजार फीट की ऊंचाई पर है।



23 हजार फीट की ऊंचाई से
मेघा परमार

रविवार : दोपहर के करीब 3:30 बजे हैं। मैं माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप पर हूं। दो दिन पहले मैं 23 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित कैंप-3 पर थी। जहां हमेशा तापमान माइनस 18 डिग्री के आसपास रहता है। 15 मई के आसपास मैं फिर शिखर पर पहुंचने की योजना बना रही हूं।

कैंप के बाहर चारों तरफ पहाड़ियांे पर बर्फ की चादर बिछी है। इनके पीछे छिपा है मेरे बचपन का सपना सागरमाथा यानी माउंट एवरेस्ट। तीन घंटे पहले आए बर्फीले तूफान से बचने के लिए हम कैंप के अंदर बैठे हैं। बाहर भले ही 100 किमी की रफ्तार से हवाएं चल रही हैं, लेकिन सीहाेर की मिट्‌टी को माउंट एवरेस्ट यानी समिट तक पहंुचाना ही है। मेरे बैग में सीहाेर की मिट्‌टी, पत्थर तो हैं ही, सपने को सच करने के लिए गणेशजी की एक मूर्ति और मां-पिता की तस्वीर भी रखी है। हर बार कठिन चढ़ाई पर जाने से पहले इन्हीं से आगे बढ़ने की ताकत मिलती है। दो दिन पहले हम कैंप 3 यानी 23625 फीट की ऊंचाई कोे छू कर वापस आए थे। अब बेस कैंप पहुंचने को तैयार हैं। शिखर पर पहुंचना है तो बार-बार उतरने-चढ़ने की प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है।

दिन में आते हैं तूफान, रात 2 बजे बाद करते हैं चढ़ाई

यहां हर रोज 4 से 6 बर्फीले तूफान आते हैं। कई बार तो तेज आवाज के साथ बर्फ के बड़े-बड़े पहाड़ तूफानों के बीच खिसकने लगते हैं। यह घटनाएं दिन में ज्यादा होती हैं। इसी कारण चढ़ाई रात 2 बजे के बाद करते हैं। हम लोग प्रेस्टीज एडवेंचर ग्रुप के साथ हैं और मेरे अलावा इसमें ईरान से मेहरदाद शहलाए, इटली से मार्को ज़ाफरोनी और पोलैंड से पावेल स्टम्पनिएवस्की हैं। मेरा सपोर्ट निग्मा नुरु शेरपा कर रहे हैं।

टीम में सबसे छोटी, बाकी मेंबर दोगुनी उम्र के

मेरी टीम में सिर्फ मैं 24 साल की हूं बाकी सभी 50 से ऊपर के लोग हैं जो हमेशा मुझे मदद के लिए तत्पर रहते हैं। पिछले सप्ताह जब हम कैंप 2 से 3 के बीच सीधी पहाड़ी पर चढ़ रहे थे तब पहली बार पता चला कि माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई इतनी कठिन क्यों है। रात 2 बजे तेज हवाएं हमारा रास्ता रोक रही थीं और 8 घंटे लगातार सीधी चढ़ाई करने के बाद हम कैंप 3 पर पहुंचे थे। कैंप 2 से 3 के बीच पीठ पर बंधा आक्सीजन सिलेंडर हमेशा सांस लेने में मदद करता है।

ग्रुप में अकेली वेजिटेरियन, दाल-चावल का सहारा

कैंप 3 से आने के बाद भी हम लगातार आसपास मौजूद छोटी-छोटी पहाड़ियों पर चढ़ने की प्रेक्टिस करते रहते हैं ताकि एनर्जी बनी रहे। मेरे ग्रुप में अकेली मैं वेजिटेरियन हूं। केवल दाल-चावल और ड्रायफ्रूट ले रही हूं। हम उबले दाल-चावल, आलू साथ लाएं हैं। जिन्हें साथ में मौजूद ब्यूटेन गैस सिलेंडर के जरिए गर्म कर लेते हैं। कुछ पर्वतारोही नूडल्स, एनर्जी ड्रिंक्स, एनर्जी चॉकलेट्स भी लेकर आए हैं। कैंप के अंदर मेरे अलावा बाकी चारों का खाना एक साथ बनता है जो नाॅन-वेजिटेरियन होता है। बेस कैंप से शिखर तक कुल 4 कैंप है।

बर्फ काटकर पीते हैं पानी

बर्फीली पहाड़ियों पर चढ़ने के कारण शरीर में पानी की कमी भी होती है। इसे दूर करने बर्फ को काटकर एल्यूमिनियम के बर्तन में गर्म करते हैं। ताकि एनर्जी लेवल बना रहे। बेस कैंप मतलब 1000 की आबादी वाला छोटा गांव। यहां शेरपाओं, सपोर्टिंग स्टॉफ और माउंटेनियर्स ने अपने-अपने कैंप लगा लिए हैं। जैसे-जैसे ग्रीन सिग्नल मिलता है माउंटेनियर्स ऊपर के लिए रवाना हो जाते हैं। जब रास्ते में एक-दूसरे से मिलते हैं तो अपने अनुभव और हिदायतें शेयर करते हैं। इस साल भारत से 8 महिलाएं माउंट एवरेस्ट पर जाने वाली हैं।

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मुझे लगता है कि सबसे पहले मैं ही वहां जा पाऊंगी क्योंकि कैंप 3 तक का सफर मैं तय कर चुकी हूं। अभी-अभी एक अच्छी खबर आई है कि 8 शेरपा शिखर पर पहुंच चुके हैं। ऐसा करने वाले वे इस साल के पहले पर्वतारोही हैं। मुझे 15 मई के आसपास शिखर पर जाने का प्लान है। यहां पहुंचने के लिए मैंने आइस ट्रेनिंग यानी बाधाओं को सीढ़ियों के जरिए क्रास करने की ट्रेनिंग ली है। साथ ही रस्सियों के जरिए रेस्क्यू की ट्रेनिंग भी ली है। कैंप 3 के बाद हमें कड़ी परीक्षा देनी पड़ेगी क्योंकि वहां पर खड़ी चढ़ाई है तापमान माइनस 20 के भी नीचे होगा और ऑक्सीजन का लेवल बहुत ही कम होगा। लेकिन परीक्षा तो हमने बेस कैंप के ठीक बाद भी दी थी जहां दो पहाड़ों के बीच कई खाईयां है थी। जन्हें एल्यूमिनियम की सीढ़ी के जरिए पार करना पड़ा था। इस दौरान कमर में एक रस्सी बंधी थी जो हमारी रक्षा कर रही थी। ऐसे में सबसे ज्यादा खतरा एक्यूट माउंटेन सिकनेस का होता है। अब जैसे जैसे हम ऊंचाई पर पहुंचेंगे आक्सीजन कम होती जाएगी। फेफड़ों में पानी भरने व दिमाग के शून्य होने का खतरा होता है लेकिन इससे घबराने की बात नहीं है क्योंकि पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर बंधे होते हैं। जिससे शरीर को आक्सीजन मिलती रहेगी। अंतिम चढ़ाई के वक्त ऑक्सीजन सिलेंडर हमारे लिए प्राण वायु का काम करते हैं। मुझे आक्सीजन के 6 सिलेंडर मिले हुए हैं। हर माउंटेनर कैंप 3 से 4 के बीच अमूमन आॅक्सीजन का एक सिलेंडर उपयोग करता है। कैंप 4 से शिखर के बीच 2 आक्सीजन सिलेंडर का उपयोग कर पाएंगे। इसके अलावा कैंप 4 में सोते समय पूरे समय ऑक्सीजन लगाए रखना होता है। कैंप 3 के बाद हर टेंट में 3 लोगों के सोने की व्यवस्था होती है। कम्यूनिकेशन के लिए हमारे पास सैटेलाइट फोन और रेडियो सुविधा उपलब्ध है। इसके माध्यम से हम लगातार बेस कैंप के संपर्क में रहते हैं।

खांसी पर दवाएं बेअसर, अदरक से मिली राहत

ऐवरेस्ट समिट के लिए खुद को शारीरिक रूप से तैयार करने अलग - अलग ग्रुपों के करीब 200 से ज्यादा लोग बीते दो महीने से रोजाना बर्फीले पहाड़ों पर चढ़ाई की प्रैक्टिस कर रहे हैं। पिछले महीने इसी प्रैक्टिस में बर्फीली हवाओं से सर्दी के साथ खांसी हो गई। खांसी के साथ उल्टियां शुरू हो गई। दो हफ्ते तक दवाएं खाई, लेकिन न सर्दी, खांसी और न उल्टियां होना बंद हुआ। तभी अदरक खाकर खांसी ठीक करने का नुस्खा याद आया। अदरक खाने के बाद खांसी पूरी तरह से तो ठीक नहीं हुई। लेकिन, बीमारी से राहत मिल गई है।



मध्यप्रदेश की बेटी मेघा परमार माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने के करीब

इस साल माउंट एवरेस्ट पर जाने के लिए दुनिया की 22 महिलाओं को अनुमति मिली है। भारत की 8 महिलाओं में से एक सीहोर की मेघा परमार हैं। किसान परिवार में जन्मीं मेघा 23 हजार फीट की ऊंचाई को छू कर फिर बेस कैंप में पहुंच गई हैं। 15 मई के आसपास वह 29 हजार फीट के शिखर पर पहंुचने के लिए निकलेंगी। मेघा ने अपनी अबतक की यात्रा के अनुभव भास्कर के पाठकों के लिए खास तौर पर शेयर किए हैं...

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