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बीमार शिष्या की सेवा करने गुरू आर्यिका 250 किमी चलकर आईं

Dainik Bhaskar

May 14, 2018, 05:30 AM IST

Sagar News - गुरू के प्रति अटूट श्रद्धा और गुरू का शिष्य के प्रति अगाध प्रेम का अनुपम उदाहरण इन दिनों सागर के तिलकगंज जैन मंदिर...

बीमार शिष्या की सेवा करने गुरू आर्यिका 250 किमी चलकर आईं
गुरू के प्रति अटूट श्रद्धा और गुरू का शिष्य के प्रति अगाध प्रेम का अनुपम उदाहरण इन दिनों सागर के तिलकगंज जैन मंदिर परिसर में देखने को मिल रहा है। यहां आचार्य विद्यासागर महाराज की आज्ञानुवर्ती और समाधिस्थ मुनि विवेक सागर महाराज की शिष्या आर्यिका विज्ञानमति माता 11 सदस्यीय संघ के साथ विराजमान हैं। आर्यिका विज्ञानमति माता इन दिनों कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से पीड़ित अपनी पहली शिष्या आर्यिका बृषभमति को पल पल ढांढ़स बंधा रही हैं।

आर्यिका बृषभमति को इस असाध्य रोग की जानकारी टीकमगढ़ से तीन अन्य आर्यिकाओं के साथ सागर आने के बाद लगी। इसके पहले तो लगा कि यूं ही कोई मामूली बीमारी होगी, जिसके चलते थकान और कमजोरी महसूस हो रही है। सागर में चिकित्सकों ने परीक्षण करने के बाद उन्हें जब यह बताया कि उनको कैंसर है,ऐसे संकट के समय आर्यिका बृषभमति को अपनी गुरू एवं अध्यात्म मां की याद आई तो उन्होंने गुरू मां विज्ञान मति माता को संदेश पहुंचाया और उनका दर्शन करने की इच्छा जताई।

अंतत: हस्तिनापुर (उत्तर भारत) की यात्रा पर जा रही गुरू मां को सोनागिर पहुंचने के बाद शिष्य की भक्ति के प्रेम के आगे विवश होना पड़ा और शिष्या के पास लौटने का मन बनाया। भीषण गर्मी में 250 किमी पैदल विहार करते हुए सागर आ गईं। गुरू ने निर्जल उपवास में भी विहार किया। इससे 250 किमी की दूरी तय करने में 15 दिन लगे। अब गुरु मां विज्ञानमति माता अपनी प्रथम शिष्या की सेवा में इतनी मशगूल हो गईं कि उनको प्रवचन देना भी अच्छा नहीं लग रहा है । प्रवचन कार्य उनकी द्वितीय शिष्या आर्यिका आदित्य मति माता कर रही हैं ।

गुरू मां रात-रात भर जागकर अपनी शिष्या बृषभमती के स्वास्थ्य का ध्यान एक माँ की तरह रख रही हैं। आहार चर्या कराने शिष्या के साथ स्वयं जाती हैं । हर पल उनको मानसिक रूप से दृढ़ बनाए रखती हैं । सुबह, दोपहर और शाम उन्हें अपने पास बैठाए रहती हैं। समाज के लोगों यह देखकर बहुत अचरज हो रहा हैं। आर्यिका विज्ञानमति माता ने बताया हम गुरू शिष्य लोक व्यवहार में हो सकते हैं। जैन सिद्धांत के अनुसार तो वास्तव में हम मोक्षमार्ग के साथी हैं । सेवा तो हमारा स्वभाव होना चाहिए चाहे छोटों की हो या बड़ों की ।

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