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इतिहास गवाह: राज परिवार भी अबीर-गुलाल से होली खेलते थे
होली की भीड़़: उप्र में दूल्हा रवाना, दुल्हन स्टेशन पर छूटी
मिर्जापुर | उप्र के मिर्जापुर स्टेशन पर सोमवार को अजीब स्थिति बन गई। यहां की लड़की की शादी प. बंगाल के नवीन सोनकर से हुई थी। मिर्जापुर स्टेशन से बरात ट्रेन से रवाना होनी थी। ट्रेन आने पर दूल्हा एसी कोच में चढ़ गया। बराती भी बैठ गए, लेकिन भागमभाग में दुल्हन प्लेटफॉर्म पर ही छूट गई। बाद में उसे मायके लौटना पड़ा।
परंपरा : विश्नाेई समाज होलिका दहन नहीं करता
जोधपुर| यहां का विश्नोई समाज होलिका दहन नहीं करता, न रंग का उपयोग करता है। अनुयायियों का मानना है कि होली दहन में लकड़ियों का इस्तेमाल होता है। ज्वाला से सैकड़ों कीट-पतंगें मर जाते हैं, इसलिए समाजजन दूसरे दिन सामूहिक हवन के बाद पाहल बनाकर प्रसाद लेते हैं। इसके बाद सादा ‘बाजरा का खीच’ भोजन करते हैं।
इधर, मुंबई में होलिका दहन में बनाया गया कोरोना का पुतला
शेखावाटी में 150 साल पहले थी सूखी होली की परंपरा, हवेली के भित्तिचित्र इसके गवाह
175 वर्ष पहले मेहरानगढ़ के राजा ने अबीर और गुलाल से मनाई थी राजसी होली
चित्रकार : बुलाकी, सौजन्य- मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट
{काेराेनावायरस की दहशत के बीच मुंबई के वर्ली में एक हाेलिका दहन समिति ने हाेलिका के साथ काेराेनावायरस का पुतला भी बनाया है। हाेली के साथ पुतले का भी दहन िकया जाएगा, ताकि इस वायरस का नामाेनिशान मिट जाए।
_photocaption_सीकर| यह तस्वीर रामगढ़ शेखावाटी में रूइयों की गली स्थित पूर्व पार्षद रमाकांत पुजारी की 150 साल पुरानी हवेली में बने भित्तिचित्र की है। बुजुर्गों का कहना है कि पहले संस्कृति-धार्मिक भावनाओं के अनुरूप प्राकृतिक रंगों व फूलों से सूखी होली खेली जाती थी। कालांतर में इसमें पक्के रंग शामिल हो गए। होली का मूल स्वरूप उल्लास व खुशियां ही है, जो सूखी व सुरक्षित होली से ही संभव है।*photocaption*
_photocaption_-फोटो: राधाकृष्ण शास्त्री*photocaption*
_photocaption_जोधपुर| राजपरिवार के त्योहार भी शानो-शौकत से मनाए जाते थे। राजा-रानी की असली जिंदगी दिखाती 175 साल पुरानी पेंटिंग मेहरानगढ़ में मौजूद है। वर्ष 1845 की यह पेंटिंग राजपरिवार की होली के सप्त रंग दिखा रही है। इसमें महाराजा तखतसिंह और राजसी महिलाएं पिचकारी से एक-दूसरे पर रंग छिड़क रहे हैं। पूरे परिदृश्य में अबीर अौर गुलाल के रंग बिखरे हैं। चाैक में रंगों से भरे कड़ाह और व्यंजन के थाल पड़े हैं। *photocaption*