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मन्नत का करीला मेला; श्रद्धा, श्रद्धालु और व्यापार बढ़ा, पर सुबह होने वाली घेरे की राई बंद, आज होगा मन्नतों का बधाई नृत्य

एक वर्ष पहले
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50 सालों में करीला की पहाड़ी पर लगने वाला छोटा मेला अब 8-10 किमी क्षेत्र में फैल गया है। समय के साथ हर साल रंगपंचमी पर लगने वाले मेले का स्वरूप भी बदला है। 50 साल में करीला मेले की परंपराएं बदलने के साथ श्रद्धा और श्रद्धालु बढ़े। पिछले साल प्रशासन के अनुसार लाखों श्रद्धालु मेले में पहुंचे। पारंपरिक राई नृत्य में सुबह घेरे की राई बंद हो गई। लेकिन बधाई नृत्य की परंपरा चालू हो गई जो 50 साल पहले नहीं थी।

पहले मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बधाई के रूप में खुद नृत्य करते थे, अब नृत्यांगनाएं पैसे लेकर दूसरों की मन्नतों पर खुद नृत्य कर रही हैं। वहीं सबसे पहले मां को झंडा विदिशा जिले के ललितपुर गांव का चढ़ता है। ऐसी मान्यता है कि इस गांव के ग्रामीणों ने ही सबसे पहले मां जानकी और वाल्मीकि ऋषि के दर्शन किए थे।

1994 में जपं को दी मेले की जिम्मेदारी, हादसा होने के बाद मेला पहाड़ी के नीचे शिफ्ट : 1994 में पूर्व विधायक स्व. देशराज सिंह यादव के साथ अविभाजित जिले गुना की तत्कालीन कलेक्टर नीलम राव ने जनपद पंचायत को मेला सौंप दिया गया। 2008 में करीला में कुछ श्रद्धालुओं की भीड़ में मौत के बाद मेला पहाड़ी के नीचे शिफ्ट किया गया। अब सुरक्षा और व्यवस्था के हिसाब से सेक्टर में बांट दिया गया।

राई नृत्य और गांव की झलक देखनी है तो आइए करीला


अशोकनगर की मुंगावली तहसील की जसैया ग्राम पंचायत में एक पहाड़ पर है जानकी मैया का मंदिर, जिसको अब करीला धाम कहा जाने लगा है। राई नृत्य के लिए करीला मेला अपनी स्वतंत्र पहचान बना चुका है। इस मेले का धार्मिक, व्यावसायिक, सामाजिक महत्व तो है ही पर इस मेले की मुख्य पहचान इसका सांस्कृतिक पक्ष है। मेला अपने रंग में है। दुकानें सज चुकी हंै। प्रशासन के लिए ट्रैफिक को नियंत्रित करना चुनौती है। लोक विश्वास है कि लोग अपनी मनोकामनाओं के लिए यहां राई लाते हैं। एक किवदंती यह भी है कि यहां मां सीता ने जंगल में कभी रसोई पकाई थी। इसीलिए लोहे वालों का पेट जुड़ा हुआ है । राजस्थान से भोपाल आकर बस गए अनेक अगरिया, लुहार और लोहा पीटा बड़ी संख्या में यहां कड़ाई की दुकानें सजाए हैं। सागर जिले के करीब 11 साल के सुनील का ढोल बजाने का अंदाज अलग है । उसने बताया कि कभी स्कूल नहीं गया । जब उससे पूछा कब से बजा रहे हो तो बोला - जब सै भए हैं ( जब से पैदा हुए हैं )। लोक कलाकारों के जीवन और कठिनाइयों के बारे में हमारा समाज बहुत कम जानता है। मशाल की रोशनी में होने वाली राई की जगह हैलोजन में होने वाली राई इस नाच की मौलिकता को प्रभावित कर रही हैं । नृत्यांगनाओं के साथ बड़ी संख्या में थर्ड जेंडर के लोग भी इसमें प्रवेश कर रहे हैं । जैसा भी है ये मेला फिर भी इस मेले का एक सौंदर्य है। यहां आपको गांव की झलक मिलेगी। आपको बुंदेली राई नृत्य देखने को मिलेगा। इसके साथ ही हाट-बाजार, मेले, संघर्षशील जन का जीवन और जीवन में बचे रंग यहां आपको देखने को मिलेंगे।

कवि-रंगकर्मी हरिओम राजौरिया की कलम से करीला मेला

राई नृत्य की जगह बधाई नृत्य ने ले ली-50 साल से करीला में राई करने आ रहीं 65 साल की बसंती बाई ने बताया कि झंडा चढ़ाने के बाद राई होती थी। अब बधाई की परंपरा शुरू हो गई। बदलाव से राई नृत्य की जगह फूहड़ता आ गई। अब किन्नर और राजस्थान की नृत्यांगनाएं भी बधाई नृत्य करने लगी हैं जो पहले यहां नहीं आती थीं।**

बीना में ट्रेनें खचाखच फिर भी पहुंचे हजारों यात्री

2020

1995

एक्सपर्ट

मेले के बदलाव के गवाह....तब छोटा मंदिर, एक गुंबद 2 दरवाजे थे, पैदल ही लोग जाते थे

मां जानकी मंदिर से करीब 4 किमी दूर फुटेरा गांव निवासी 62 साल के रघुवीर सिंह यादव 50 साल से मेले के साक्षी बने हुए हैं। श्री यादव ने बताया कि छोटा मंदिर, एक गुंबद, दो दरवाजे शुरुआत में देखे। बैलगाड़ी और पैदल डेढ़ से दो हजार लोग ही यहां आते थे। बधाई नृत्य की परंपरा नहीं थी। जिनकी मन्नतें पूरी होती थी वे खुद मां जानकी के दरबार में नाचते थे। वहीं राई नृत्य रात को मशालों और नगाड़ों की थाप पर होता था। सुबह घेरे की राई में सभी नृत्यांगनाएं घेरा बनाकर नृत्य करती थीं। तब नृत्यांगनाओं की संख्या 8 से 10 होती थी जो आज दो से ढ़ाई हजार तक है।

25 साल पुरानी तस्वीर....पहले 30 हजार वर्ग फीट में फैला था मंदिर, आज करीब 1.80 लाख वर्ग फीट में

करीला धाम पहुंचने के लिए बीना अशोक नगर के बीच में चलने वाली ट्रेनों में ठसाठस भीड़ रही । बीना-कोटा पैसेंजर,नागदा,सावरमती एक्सप्रेस सहित कई ट्रेनों में पैर रखने को भी जगह नहीं मिली। ट्रेन का आलम यह था कि शौचालय से लेकर पार्सलयान में ठसाठस यात्री बैठकर यात्रा कर रहे थे । साथ ही कुछ यात्री ट्रेन के दरबाजे पर लटक कर यात्रा करने को मजबूर थे । करीला धाम पहुंचने के लिए शहर के अलावा आसपास के शहरों,कस्वों एवं गांव के लोग बड़ी संख्या में रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन पकड़कर मुंगावली एवं गंजबासौदा की यात्रा कर करीला धाम पहुंचे। ये यात्री जान जोखिम में डालकर रेलवे लाइन पार करते हुए रेलवे स्टेशन पहुंचे । वहीं कुछ यात्री ट्रेनों के छूटने के बाद बच्चों के साथ दौड़ते हुए ट्रेनों को पकड़ा।
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