कट-काॅपी-पेस्ट से पीएचडी की शिकायत : यूजीसी करेगी जांच, सागर विवि के 118 शाेधार्थी भी अाएंगे दायरे में

Sagar News - विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने जोड़-ताेड़ से पीएचडी करने वालाें की मुसीबत बढ़ा दी है। यूजीसी के नए आदेश...

Bhaskar News Network

Jun 14, 2019, 09:05 AM IST
Sagar News - mp news phd complaint from cut cap paste ugc will investigate 118 candidates from sagar university
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने जोड़-ताेड़ से पीएचडी करने वालाें की मुसीबत बढ़ा दी है। यूजीसी के नए आदेश से ऐसे पीएचडी धारक सकते में आ गए हैं जिन्होंने कट, काॅपी अाैर पेस्ट करते हुए अपनी पीएचडी डिग्री हासिल की थी। दरअसल, यूजीसी ने अनुसंधान के गिरते स्तर को रोकने के लिए पिछले 10 सालाें की पीएचडी की थीसिस जांचने के निर्देश दिए हैं। इसका कारण पीएचडी के लिए वर्ष 2009 में बनाए गए यूजीसी के वे नियम हैं, जिसमें पीएचडी के लिए इंट्रेंस टेस्ट, काॅलेज के शिक्षकों काे गाइड नहीं बनाने जैसे निर्देश थे। लेकिन अधिकांश संस्थानों ने तब इनका पालन ही नहीं किया। इस कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध में भारत की गैरमौजूदगी पर भी सवाल उठते आ रहे हैं। निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में तेजी से इजाफे के बाद तो पीएचडी की गुणवत्ता और भी हासिए पर चली गई है। बहरहाल यूजीसी ने विश्वविद्यालयों को नोटिस जारी किया है। इसके तहत पीएचडी की जांच कराने के बाद यह जानकारी केंद्र और राज्य सरकारों को भी भेजी जाएगी। डाॅ. हरीसिंह गाैर विश्वविद्यालय मंे 2009 से लेकर 2019 यानी अब तक 118 थीसिस जमा हुईं। जिनकाे यहां पर शाेध गंगा साॅफ्टवेयर से जांचा गया, उसी के बाद यह सर्टिफिकेट दिया गया कि इसमें यूजीसी के मापदंडों के अनुसार ही कंटेंट है। अब उन्हें एक बार फिर से अाैर भी ज्यादा बारीकी जी से जांचा जाएगा। जिससे कहीं काेई चूक या गड़बड़ी हुई हाे ताे पता लग सके।

नए बदलाव से आएगी पारदर्शिता, अपात्रों पर कसेगी नकेल, पात्रों को मिलेगा लाभ

वर्तमान में जो पीएचडी अवार्ड हो रही हैं, उसके लिए इन 11 नियमों का पालन करना होता है। एडमिशन इंट्रेंस टेस्ट, इंटरव्यू या फिर दोनों तरीके से लिया गया हो। गाइड के लिए पीएचडी शाेधार्थियों की लिमिट, रिजर्वेशन नीति, कोर्स वर्क व रिसर्च मैथडोलॉजी थ्योरी, रिसर्च एडवाइजरी कमेटी का रिव्यू, मैथडोलॉजी परीक्षा, सिनोप्सिस जमा करने से पहले पीएचडी प्रजेंटेशन, थीसिस सबमिट करने से पहले कम से कम एक पेपर का पब्लिकेशन, कांफ्रेंस व सेमिनार में दो पेपर्स का प्रेजेंटेशन, सुपरवाइजर के अलावा थीसिस का इवैल्यूएशन स्टेट के बाहर के एक्सपर्ट से कराना और थीसिस की सॉफ्ट कॉपी का होना। इन 11 नियमों में से 6 नियमों को फॉलो करने वाले को ही विश्वविद्यालय की तरफ से प्रमाणपत्र दिया जाता है। अब नियमों में बदलाव होने से पारदर्शिता आएगी। अपात्रों पर नकेल कसेगी और पात्र छात्रों को लाभ होगा।

6 नियमों को पालन करना जरूरी, कई जगह सिर्फ दाे ही किए गए

यूजीसी को शिकायत मिली है देश भर में अधिकांश पीएचडी जो कॉलेज शिक्षकों के सुपरविजन में पूरी की गई हैं, वो दोयम दर्जे की हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह कट-कॉपी-पेस्ट वाली पीएचडी हैं। ये यूजीसी के मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं। 11 नियमों में से 6 नियमों को फॉलो करना जरूरी है। लेकिन अधिकांश स्थानों पर मात्र दो ही नियमों का पालन हो रहा है। ऐसे में विवि से अवाॅर्ड हो रहीं पीएचडी की साख पर सवाल उठने लगे हैं। पहले यह संख्या काफी कम थी, लेकिन 2019 तक यह संख्या लाखों में पहुंच गई है। इससे मेहनत करने वाले छात्रों को घाटा हो रहा है। इसी कारण यूजीसी ने उपरोक्त निर्णय लिया है।

छात्र संगठन और नए शोधार्थी बोले सराहनीय है यूजीसी का निर्णय : इस नए नियम के आने के बाद छात्र संगठन के नेताओं और नए शोधार्थियों का कहना है कि यूजीसी का यह निर्णय सराहनीय है। अभाविप के जिला संयोजक श्रीराम रिछारिया अाैर एनएसयूआई के प्रदेश सचिव अक्षय दुबे का कहना है कि विवि में पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की पीएचडी के ज्ञान का स्तर भी परखा जाए। कई लाेग फर्जी पीएचडी करके विवि-काॅलेजाें में जमे हुए हैं। इसीलिए एेसे लाेग ये कक्षाओं में कम, प्रशासनिक काम काज में ज्यादा नजर आते हैं।

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