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अंग्रेज फौजी की डायरी पढ़ इंग्लैंड से सागर आए बेटा-पोता, यहां गोरिल्ला युद्ध अभ्यास का रूट देखा, खोजे अपने पूर्वज के कदमों के निशान

एक वर्ष पहले
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80 साल पहले अंग्रेज सैनिक फ्रैंक बेर्कोविच सागर छावनी में पदस्थ थे, आजादी के बाद वे इंग्लैंड चले गए, 2017 में मौत

कहानी कुछ फिल्मी सी है। लंदन में एक रिटायर्ड फौजी फ्रैंक बेर्कोविच की मृत्यु के बाद उनके पोते को उनकी डेली डायरी मिलती है। पोता डेनियल बर्क इस डायरी में अपने दादाजी की जिंदगी का लेखा-जोखा पढ़ रोमांचित हो उठता है। वह अपने पिता टोनी बर्क को मनाता है कि क्यों न हम दादाजी की स्मृति को जीवंत सा महसूस करने भारत चलें। पिता भी बेटे की बात मान लेते हैं और बुंदेलखंड अंचल में आ पहंुचते हैं। जहां कभी उनके पूर्वज यानी इस पोते के दादा ने फौजी के रूप में चिंडित्त(बर्मा का एक धार्मिक चिन्ह, जिसका आकार शेर और ड्रैगन से मिलकर बना है ) अभियान में हिस्सा लेकर जापान के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध का अभ्यास किया था।

यह था चिंडित्त अभियान

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1943 में अंग्रेजी सेना, बर्मा (म्यांमार) में जापानियों से हार गई थी। क्योंकि जापानी गोरिल्ला युद्ध में माहिर थे। तत्कालीन अंग्रेज सैन्य अफसर ब्रिगेडियर आर्ड विनगेट को बर्मा-म्यांमार और एमपी-यूपी के बुंदेलखंड के जंगल, पठार एक समान लगे तो उन्होंने इस इलाके में सैकड़ों सैनिकों को 400 किमी के रूट में गोरिल्ला युद्ध की प्रेक्टिस कराई। दोबारा म्यांमार पहुंच जापानियों को हरा दिया।

Áपेशे से वकील डेनियल और उनके पिता टोनी ने कहा कि कैंट के कब्रिस्तान को देखरेख की जरूरत है। ब्रिटिशर्स के कॉमनवेल्थ कमीशन का ध्यान यहां क्यों नहीं गया। जबकि यहां 1803 तक के लोगों की कब्रें हैं। हम लोग कमीशन को लिखेंगे।

पोते की जुबानी : सच मानिए, यहां घूमते हुए ऐसा लगा मानो दादा साथ चल रहे हों, उनके दोस्तों की कब्रें देख मैं भावुक हो गया

फ्रैंक के दोस्तों की कब्रों को तलाशते टोनी और डेनियल बर्क।

फ्रैंक बेर्कबिच।

कब्रिस्तान में डेनियल बर्क।

दादाजी से मेरा स्वाभाविक लगाव था। 2017 में 87 साल की उम्र में वे हमें छोड़कर चले गए। इससे मेरे जीवन में एक खालीपन महसूस होने लगा। मैं उनसे बात करना चाहता था, उन्हें छूना चाहता था। ऐसे में एक दिन उनकी डायरी मेरे हाथ आ गई। सच मानिए, ऐसा सुकून मिला कि जैसे मेरे दादा मुझे फिर मिल गए। उसी डायरी में दादा के सागर आर्मी बेस में सन 1943 में चिंडित्त अभियान में भाग लेने और फिर उसके बाद इंग्लैंड पहुंचने का रोमांचक ब्योरा पढ़ा। दादा के मुश्किल भरे लेकिन बेहद शौर्य और रोमांच से भरे दिनों की बातें मुझे भावुक कर गईं। बहुत मन हुआ कि काश! उन स्थानों पर जाकर दादा को महसूस कर सकूं। मन की बात पिता टोनी को बताई। वे भी अपने पिता से मन से काफी जुड़े थे। इसलिए तुरंत मान गए। हम दोनों पहले बर्मा पहुंचे। लेकिन वहां वह संतुष्टि नहीं मिली जो सोचकर हम गए थे। इसलिए तीन साल बाद अब बबीना(झांसी)-सागर- दमोह का रूट देखने बुंदेलखंड आए हैं। ओरछा के गाइड हेमंत गोस्वामी की मदद से आपके शहर (सागर) के कैंट स्थित सेंट्स पीटर्स चर्च आए। यहां द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान प्राण न्योछावर करने वाले फौजियों के नाम पढ़े। इनमें से कई का जिक्र दादा ने डायरी में किया है। दरअसल ये सब दादा के दोस्त हुआ करते थे। उसी चिंडित्त अभियान के साथी और उसकी रिहर्सल के दौरान ही ये लोग जान गवां बैठे। फिर हम पास के कब्रिस्तान गए। उन लोगों की कब्रें देखीं। विश्वविद्यालय के जंगल भी गए। सच मानिए यहां मैं अपने दादा के फुट प्रिंट (पद चिन्ह) ढूंढता रहा। महसूस करता रहा उन्हें.... मानो वे मेरे साथ-साथ चल रहे थे। डायरी के शब्द जैसे जिंदा हो उठे...! (जैसा डेनियल ने भास्कर को बताया)**
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