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रंग बरसे पान खाएगोरी का यार...

एक वर्ष पहले
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श्रीराम के अयोध्या लौटने से दीपावली उत्सव प्रारंभ हुआ। संभवत होली उत्सव द्वापर युग से शुरु हुआ। ‘मदर इंडिया’, ‘शोले’, ‘नवरंग’ और ‘टॉयलेट-एक प्रेमकथा’ जैसी फिल्मों में होली के दृश्य नाटकीय व निर्णायक दौर प्रदान करते हैं। यूरोप में भी होली की तरह एक उत्सव में रंग के बदले टमाटर फेंके जाते हैं। जैसा फरहान अख्तर अभिनीत फिल्म में प्रस्तुत किया गया था। बरसाना होली उत्सव में महिलाएं पुरुषों पर लट्‌ठ बरसाती हैं। इस उत्सव में महिलाएं और पुरुष अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वाह मनोयोग से करते हैं। वर्षभर पिटने वाली स्त्रियों को एक अवसर अपनी भड़ास निकालने का मिलता है। यथार्थ जीवन में तो हिसाब बराबर करने का अवसर मिलना संभव ही नहीं है।

विद्या बालन अभिनीत ‘कहानी’ में क्लाइमैक्स दुर्गा उत्सव के समय रचा गया है। नायिका आतंकी को मारकर महिलाओं के जुलूस में शामिल हो जाती है। सभी महिलाओं के चेहरे पर गुलाल मला जाता है। अतः पुलिस कत्ल करने वाली महिला को पहचान नहीं पाती। राजीव कपूर की ‘प्रेम ग्रंथ’ में रावण दहन का दृश्य प्रस्तुत किया गया। रावण दहन का दृश्य शशि कपूर की ‘अजूबा’ में भी प्रस्तुत किया गया। शशि कपूर की फिल्म ‘उत्सव’ का प्रारंभ ही बसंत उत्सव से होता है। फिल्म उद्योग में राज कपूर अपने स्टूडियो में होली उत्सव धूमधाम से मनाते थे। सितारा देवी नाचती थीं। फिल्म उद्योग में होली मनाने का प्रारंभ करने वाले राज कपूर की अपनी निर्देशित किसी फिल्म में होली दृश्य नहीं है। अपने संघर्ष के दिनों में अमिताभ ने आरके स्टूडियो की होली में ‘रंग बरसे’ गीत गाया था। कुछ वर्ष पश्चात यश चोपड़ा की फिल्म ‘सिलसिला’ में इसका प्रयोग किया गया। इस होली दृश्य में पति की मौजूदगी में प|ी अपने प्रेमी से छेड़छाड़ करती है। इस दृश्य में संजीव कुमार उस निरीह पति की भूमिका में हैं और जया बच्चन उस प|ी की भूमिका में है, जिसका पति अन्य व्यक्ति की प|ी के साथ मर्यादा का सरेआम उल्लंघन कर रहा है। अमिताभ, जया, संजीव कुमार और रेखा जैसे शिखर सितारों द्वारा अभिनीत यह फिल्म दर्शक वर्ग ने ठुकरा दी थी। संभव है कि होली दृश्य के कारण ही फिल्म पसंद नहीं की गई। यश चोपड़ा की ‘केप फियर’ से प्रेरित फिल्म ‘डर’ में भी होली उत्सव पर पुते हुए चेहरों का लाभ उठाकर खलनायक एक स्त्री के चेहरे पर रंग लगाता है। यह एकतरफा प्रेम की फिल्म थी।

राकेश रोशन अभिनीत फिल्म में होली के रंग के कारण एक पात्र अपनी आंखें खो देता है। उसे अन्य मृत व्यक्ति की आंखों का प्रत्यारोपण किया जाता है। फिल्म में यह प्रस्तुत किया गया कि किसी भले आदमी की आंख प्रत्यारोपण के बाद उनकी सोच भी बदल जाती है। आंखों के साथ उसके दृष्टिकोण में सकारात्मकता आ जाती है। इस वर्ष तेजी से फैलते कोरोना वायरस के कारण होली उत्सव पारंपरिक धूमधाम से नहीं मनाया जाएगा। पारंपरिक तौर पर होली उत्सव के समय भांग का सेवन भी किया जाता है। यह माना जाता है कि भांग खाने वाला मीठा खाने का आग्रह करता है और मिठाई के कारण नशा दोगुना हो जाता है। शराब जल्दी चढ़ती है और जल्दी उतरती है परंतु भांग का नशा लंबे समय तक कायम रहता है। भंगेड़ी हंसना शुरू करता है तो हंसता ही रहता है और बातों को दोहराता रहता है। भांग, अफीम, शराब और गांजे के प्रभाव भी अलग-अलग पड़ते हैं। दरअसल सारे नशे कैटेलिटिक एजेंट की तरह काम करते हैं और नशे में मनुष्य के असली रुझान ही सामने आ जाते हैं। नशे का प्रयोग अच्छे व्यक्ति को बेहतर बना देता है और बुरे व्यक्ति की नकारात्मकता बढ़ जाती है। यह बात रवींद्र जैन की पंक्तियों की याद ताजा करती है-‘गुण अवगुण का डर भय कैसा, जाहिर हो भीतर तू है जैसा।’ रवींद्र जैन ने यह गीत राज कपूर की एक फिल्म के लिए रचा था जो कभी बनाई ही नहीं गई। प्रदर्शित फिल्मों से अधिक संख्या है उन फिल्मों की जिनका आकल्पन किया गया परंतु कभी बनाई नहीं गई। संभवत: फिल्म कथाओं की भी कुंडली होती है और किसी किसी पर शनि की दृष्टि पड़ जाती है।

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जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

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