• Hindi News
  • Mp
  • Sagar
  • Sagar News mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions

जिनके मन में प्रश्न नहीं उठते, वे मनुष्य नहीं; परमात्मा को खोजना है तो गुरू के पास जाएं और प्रश्न करें

Sagar News - भास्कर संवाददाता | सागर

Dec 11, 2019, 10:21 AM IST
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
भास्कर संवाददाता | सागर
सुख और विलासिता के साथ शांति नहीं मिलेगी, मोह-माया छोड़ना होगी : गिरी

स्वामी परमानंद गिरी ने कहा कि वैसे तो पीने वाले मैंने कई अमृत सुने हैं। इन्हें पीने वाले भी मर भी गए। लेकिन कान से जो अमृत पिया जाता है वही मरने नहीं देता। मृत्यु को भी महोत्सव बनाने की क्षमता रखने वाला ही अद्वैत है। उसी से आत्मज्ञान व परमज्ञान हो सकता है। परन्तु ब्रह्मज्ञान महज जानने से नहीं बल्कि अनुभव करने से पूर्ण होता है। शंकर का सिद्धान्त गणित के सूत्र की तरह है। इसमें कुछ भी परिवर्तित नहीं किया जा सकता। उन्होंने उदाहरणों के जरिए बताया कि मनुष्य शांति तो चाहता है लेकिन भौतिक सुख एवं विलासिता के साथ। वह मिल नहीं सकती। इसके लिए मोह-माया के पीछे की भागम-भाग छोड़नी होगी। अद्वैत को अपने जीवन में आत्मसात करके शांति प्राप्त कर सकते हैं।

पहला सत्र

ज्ञान लगातार जलने वाली मशाल, अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं : प्रो. पटेल- प्रो. गौतम भाई पटेल ने कहा कि ज्ञान एक अनवरत जलने वाली मशाल है, जिसे प्रत्येक युग अपने अतीत से प्राप्त करता है। इसलिए अपनी आने वाली पीढ़ी तक ज्ञान की यह ज्योति पूर्ण वैभव के साथ पहुंचाने के प्रयास करने चाहिए। संत परम्परा की अध्ययन पद्धति उच्च शिक्षा पद्धति से बेहतर है। वेद में भक्ति के अनेक प्रकार बताए गए हैं। ‘गीता’ में भगवान कहते हैं कि भक्ति अमृत तुल्य है। परन्तु जब तक संसार के प्रति भक्ति का भाव है तब तक ईश्वर से भक्ति नहीं हो सकती।

भारत में पुनर्जागरण नहीं होता, सब अंर्तधारा में चलता है : प्रो. झा- जेएनयू के प्रो. रामनाथ झा ने कहा कि सबने माया शब्द का प्रयोग किया है, लेकिन सबमें इसके आशय अलग-अलग रहे हैं। गुरू नानकदेव कहते हैं कि मन और माया अलग-अलग नहीं हैं। भारत में पुनर्जागरण नहीं होता। यहां सब अंर्तधारा के तहत चलता रहता है। ऋषि ज्ञान परम्परा अनादि, सनातन है। आदि शंकराचार्य व्यक्ति ही नहीं बल्कि परम्परा के प्रतीक हैं। यह परम्परा आज भी हमारा पथ प्रदर्शित करती है।

शंकराचार्य को यूथ आइकॉन बनाने की जरूरत : मित्रानंद सरस्वती

स्वामी मित्रानंद सरस्वती ने कहा कि भारत जब मजबूत और समृद्ध था दुनिया भर के लोग यहां आते थे। आज भारत को पुनः मजबूत और समृद्ध बनाने की आवश्यकता है। शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन से हम देश को मजबूत बना सकते हैं। शंकराचार्य को यूथ आइकॉन बनाने की आवश्यकता है। इससे हम काफी चीजें बदल सकते हैं। उन्होंने कहा कि अद्वैत को जानने के लिए साहस की आवश्यकता है। दुनिया में शांति और भाईचारा लाने के लिए अद्वैत सिद्धांतों का पालन करना पड़ेगा। ब्रह्मविद्या के बिना विश्व को शांति नहीं मिल सकती उन्होंने आवाहन किया कि शंकर के अद्वैत और विज्ञान पर भी ऐसी ही एक संगोष्ठी आयोजित करना चाहिए और दुनिया भर के विद्वानों को बुलाना चाहिए।

जो शंकराचार्य ने दर्शन किया, आज विज्ञान उसकी पुष्टि कर रहा है : वर्मा - पूर्व राजनयिक और चिंतक पवन वर्मा ने कहा कि आज विज्ञान उन बातों की पुष्टि कर रहा है। शंकराचार्य ने ध्यान और योग के माध्यम से जिनका दर्शन किया था। वेद मूल स्रोत हैं और शंकराचार्य का अद्वैत उसका विस्तार है। उन्होंने कहा कि हमारी बाह्य वैधता हमेशा के लिए बदल जाती है। जब हम आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान को प्राप्त हो जाते हैं। अद्वैत के सिद्धान्त को अपनाने से विभिन्न देशों और समाजों के बीच अंतर नहीं होगा। उन्होंने कहा कि आज युवा वर्ग शंकराचार्य को जानना चाहता है और उन्हें पढ़ना चाहता है।

दूसरा सत्र

आज पूरी मानव जाति अतिरेक से गुजर रही : प्रो. शर्मा : दार्शनिक चिंतक प्रो. अंबिकादत्त शर्मा ने कहा कि आज पूरी मानव जाति अतिरेक से गुजर रही है। 18 करोड़ 70 लाख लोग युद्ध में मारे गए हैं और इतनी ही बड़ी आबादी कुपोषण, भुखमरी से मर रही है। आज सुरक्षा के गैर-परम्परागत खतरे विकराल होते जा रहे हैं। आज हम सर्वाधिक व्यय शस्त्रों, सौंदर्य प्रसाधन, अश्लीलता और चांद पर पहुंचने में कर रहे हैं। ऐसे समय में भारत ही विश्व को वैकल्पिक सभ्यता का दर्शन करा सकती है। उन्होंने कहा कि बाइबिल की परंपरा ने मनुष्य को स्वामित्ववादी बनाया। इससे वह भस्मासुर बन गया और उसने सर्वाधिकारवादी भूमिका अपना ली।

आजकल मोबाइल फोन राक्षस के समान हैं; हर व्यक्ति के साथ हैं : गुरूमां

समापन सत्र में आनंदमूर्ति गुरूमां ने कहा कि आपने पौराणिक कथाओं में सुना होगा कि राक्षस होते थे। आजकल तो हर व्यक्ति के साथ राक्षस हैं। ये मोबाइल फोन राक्षस के समान हो गए हैं। अविद्या हमें देह से मिलती है। यह प्रसाद हमें बचपन में ही माता-पिता, संबंधियों और पड़ोसियों से मिल जाता है। सत्य सनातन धर्म में भगवान आकाश में नहीं रहता। वेदांत सिर्फ सन्यासियों के लिए नहीं है। ज्ञान आपको पलायन या भोगवाद नहीं सिखाता। जिस शिक्षा, पीएचडी डिग्री को लेने के बाद भी नौकरी नहीं मिल रही। तरक्की नहीं हो रही तो यह अविद्या है। मन के किसी कोने में ईर्ष्या का भाव है शांति नहीं तो वह अविद्या है। सिर्फ वेदांत ही इस दुख को दूर करता है। वस्तुओं से मिला सुख उधर का है और गुलाम बनाता है। हम सभी को हर वस्तु, तरफ, ज्ञात और कभी खत्म न होने वाला सुख चाहिए। मिलेगा कहां? पता नहीं। ऐसे भाव हैं तो आपको परमात्मा चाहिए, क्योंकि वही ऐसा सुख दे सकते हैं। यह तब तक नहीं मिलेगा जब तक ज्ञान गुरू की शरण में नहीं जाओगे। दुनिया के चक्कर से मुक्ति नहीं मिलेगी। वेदांत को रेसिपी नहीं जरूरत नहीं है। अकादमिक बनाया जाएगा तो वह रेसिपी बन जाएगा। कच्ची

विवि अकादमिक क्षेत्र में डिप्लोमा और अद्वैत वेदांत पीठ स्थापित करेगा : प्रो. तिवारी

समापन समारोह में कुलपति प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी ने कहा कि तीन दिवसीय इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी को अद्वैत वेदांत के सागर सम्मेलन के रूप में जाना जाएगा। विश्वविद्यालय अद्वैत वेदांत के आधार पर विश्व में शांति, न्याय और समरसता को ध्यान में रखते हुए पाठयक्रमों का निर्माण करेगा। अकादमिक क्षेत्र में डिप्लोमा और अद्वैत वेदांत पीठ की स्थापना के लिए सभी प्राधिकारियों से चर्चा करेगा। इस क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के लिए भी कदम उठाए जाएंगे। कार्यक्रम की सफलता के लिए उन्होंने सभी का आभार व्यक्त किया। सभी सत्रों का संचालन विनय उपाध्याय ने किया।

समापन सत्र

अद्वैत अमृतम : ये सिफारिशें भारत सरकार के जरिए भेजी जाएंगी संयुक्त राष्ट्र

द्वैत वेदांत दर्शन पर आधारित तीन दिन के अंतर्राष्ट्रीय अद्वैत उत्सव में विचार मंथन के बाद वैश्विक संदेश के रूप में अमृत निकला। इस संदेश को भारत सरकार के जरिए संयुक्त राष्ट्र संघ को भेजा जाएगा। ताकि अद्वैत वेदांत दर्शन को आधार बनाकर सभ्यता और विकास का एक वैकल्पिक प्रतिमान प्रस्तुत किया जा सके। यह दर्शन संघर्ष और समस्याओं से जूझ रहे विश्व को क नई दिशा देगा। संगोष्ठी के समापन पर तीन दिन तक संतों, विद्वानों और विचारकों से विमर्श के बाद प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव इस तरह है।

1. भगवत्पाद आचार्य शंकर के आविर्भाव दिवस को ‘अद्वैत दिवस’ के रूप में मनाया जाए और 2020 से आरम्भ होने वाले दशक को सार्वभौमिक एकात्मता के दशक के रूप में उद्घोषित किया जाए। ताकि दुनिया के हर कोने में चराचर की एकात्मता का अद्वैत बोध प्रचारित किया जा सके।

2. समाज विज्ञान और मानविकी के पाठ्यक्रमों में अध्ययन की एक पद्धति के रूप में अद्वैत पद्धति शास्त्र को सम्मिलित किया जाए। ताकि आने वाली पीढ़ी जागतिक और पर्यवेक्षणीय व्यवहार एवं तथ्यों को केवल परागमुखी चेतना के धरातल पर समझने वाली आधुनिक पद्धति शास्त्रों का अतिक्रमण कर प्रत्यक्षमुखी चेतना के उच्च धरातल पर भी उन्हें समझने का एक ऐसा वैचारिक उपक्रम साध सके, जिससे मानव जाति को विभाजित करने वाली अवधारणाओं के मिथ्यात्त्व का प्रकटीकरण और सार्वभौमिक एकात्मता के आदर्श को साकार करने वाली अवधारणाओं का विकास किया जाना संभव हो सके।

3. अद्वैत वेदांत आधारित जीवन दृष्टि को सभ्यता एवं विकास के एक वैकल्पिक प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत किया जाए। ताकि सभी तरह के संघर्षों से मुक्त निष्काम कर्मयोग हमारी जीवन शैली बन सके।

4. सत्य, मत एवं भ्रांति को एक आयामी दृष्टि से देखने पर दुनियाभर में व्याप्त प्रत्यक्ष, व्यवस्थागत एवं संरचनात्मक हिंसा और विभेदों को दूर नहीं किया जा सकता। इसके लिए आवश्यक है कि सत्य, मत एवं भ्रांति को सभी दृष्टिकोणों से समझा जाए। अद्वैत दृष्टि ही इसका एकमात्र विकल्प और निष्काम कर्मयोग का आदर्श ही इसकी फलश्रुति है। आज की साभ्यतिक पीड़ाओं से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय अद्वैत जीवन दृष्टि को एक समग्र जीवन दृष्टि के रूप में अात्मसात करना है।

5. दुनियाभर में साभ्यतिक संघर्षों के समाधान के लिए भारत सरकार द्वारा भारत में और भारत से बाहर अद्वैतपीठ की स्थापना की जानी चाहिए। ताकि वसुधैव कुटुंबकम और आत्मवत सर्वभूतेषु की चेतना में मूलित वैकल्पिक सभ्यता बोध को बढ़ावा दिया जा सके।

6. भोगवादी जीवन दृष्टि ने अपने साभ्यतिक विकास के महज तीन सौ साल से भी कम समय में हजारों सालों से चली आ रही सभ्यताओं के लय को आंतरिक एवं बाह्य संघर्षों के जाल में उलझा दिया है। यह मायाजाल मनुष्य के तटस्थ लक्षणों को स्वरूप लक्षण मान लेने की भूल के कारण विकसित हुआ है। पहचान आधारित संघर्षों और अन्याय के समाधान के लिए अद्वैत जीवन दृष्टि को अपनाया जाए।

7. अद्वैत वेदांत सार्वभौमिक एकात्मता के उस समाज दर्शन को प्रस्तावित करता है जो क्वांटम भौतिकी के सूत्रों के अनुसार सामाजिक विन्यास में सहयोगी हो सकता है। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की यह अद्वैतवेदांतीय आधारशिला ही दुनिया को एक ‘विश्वयारी-सभ्यता दृष्टि’ प्रदान कर सकती है।

Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
X
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
Sagar News - mp news those who do not have questions they are not human if you want to find god then go to guru and ask questions
COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना