दुनिया की अर्थव्यवस्था में क्या गड़बड़ है?

Sagar News - एक दशक से लगभग हर साल दुनिया में आर्थिक गिरावट से मायूसी छा जाती है। व्यापार युद्धों के कारण जर्मनी, चीन और यहां तक...

Bhaskar News Network

Aug 23, 2019, 06:35 AM IST
BAREHATA News - mp news what is wrong with the world economy
एक दशक से लगभग हर साल दुनिया में आर्थिक गिरावट से मायूसी छा जाती है। व्यापार युद्धों के कारण जर्मनी, चीन और यहां तक कि अत्यंत सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिका में भी वृद्धि में रुकावट आने के संकेतों के कारण पिछले हफ्ते वॉल स्ट्रीट कांप गई। हालांकि, कहानी ट्रेड वॉर और डोनाल्ड ट्रम्प से बड़ी है। दुनिया की अर्थव्यवस्था सिर्फ वैश्वीकरण की प्रक्रिया उलटने से ही नहीं बल्कि सिकुड़ती आबादी के असर, घटती उत्पादकता और कर्ज के बोझ से भी संघर्ष कर रही है। कर्ज का यह बोझ अभी उतना ही है, जितना यह संकट की कगार पर रहते था।

आज कोई भी देश दस फीसदी से ज्यादा गति से नहीं बढ़ रहा है, वह दर जो चीन और अन्य चमत्कारी अर्थव्यवस्थाओं ने बरसों तक कायम रखी। यह महायुद्ध के बाद 1950 और 2007 के बीच का स्वर्ण युग था। लगभग हर देश में राष्ट्रीय बहस का विषय यही है कि वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए क्या किया जाना चाहिए। वे इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि नवीनतम आर्थिक हताशा वैश्विक ताकतों से संचालित है, जो किसी एक सरकार के नियंत्रण से परे हैं। हताशा की शृंखला से गुजरने और वृद्धि दरों को बढ़ाने के निष्फल प्रोत्साहन-प्रयासों से खुद की मुश्किलें बढ़ाने की बजाय हम सबको आर्थिक सफलता व नाकामी की हमारी परिभाषा पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।

जर्मनी कम से कम उन पांच प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से हैं जो मंदी की कगार पर है, जिसे नकारात्मक वृद्धि की लगातार दो तिमाहियों से परिभाषित किया जाता है। वास्तविक मुद्दा यह है कि क्या सिकुड़ते श्रम-बल वाले जर्मनी जैसे देश के लिए इस परिभाषा का कोई अर्थ है भी। इसकी कामकाजी आबादी (15-64 वर्ष की उम्र वाली) बरसों से सिकुड़ रही है और संभावना है कि अगले बीस वर्षों में यह 5.40 करोड़ से गिरकर 4.70 करोड़ हो जाएगी। इसलिए जर्मनी का धीमी गति से बढ़ना अपरिहार्य है। लगातार दो नकारात्मक तिमाहियों को मंदी कहते रहने का निहितार्थ यह है कि यह नतीजा कुछ असामान्य है, लेकिन बात ऐसी नहीं है। हाल के दशकों में घटती आबादी वाले देशों की संख्या 2 से बढ़कर 46 हो गई है, जिनमें चीन, रूस और यूरोप व एशिया की प्रमुख शक्तियां शामिल हैं। 2040 के अनुमान के मुताबिक चीन की कामकाजी आबादी में 11.40 करोड़ की कमी आएगी और वह 90 करोड़ रह जाएगी। जापान की कामकाजी आबादी 1.40 करोड़ की गिरावट के साथ 6 करोड़ रह जाएगी। उन्हें यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि उनकी आर्थिक वृद्धि उतनी तेज होगी, जो कभी रहा करती थी। हताशा से बचने के लिए बहस उन कदमों पर ले जाने की आवश्यकता है, जो मानव संतुष्टि को बेहतर ढंग से व्यक्त करते हैं जैसे प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि। जिन देशों में आबादी घट रही है वहां प्रति व्यक्ति आय तब तक बढ़ती रहेगी, जब तक आबादी की तुलना में अर्थव्यवस्था उतनी तेजी से न सिकुड़ रही हो। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि क्यों जर्मनी और उससे भी ज्यादा जापान में नकारात्मक सुर्खियों के बावजूद सामाजिक अस्थिरता नहीं दिखाई दे रही है। हालांकि उनकी अर्थव्यवस्थाएं इस दशक में अमेरिका की तुलना में अधिक धीमी गति से बढ़ी है पर जापान में प्रतिव्यक्ति आय अमेरिका की ही तरह 1.5 फीसदी से बढ़ी है और जर्मनी में तो यह दर करीब 2 फीसदी रही। बरोजगारी कई दशकों में सबसे कम है या इसके नज़दीक है। कामगारों को काम इसलिए मिल रहा है, क्योंकि उनसे स्पर्धा के लिए पर्याप्त लोग नहीं है।

इस नए युग में सफलता की परिभाषा भी बदलने की जरूरत है। कई उभरते देश जापान, दक्षिण कोरिया और ताईवान जैसी चमत्कारी अर्थव्यवस्थाओं की राह पर चलने की हसरत रखते हैं। चीन ने यही किया। इन देशों ने कई दशकों तक दो अंक वाली आर्थिक वृद्धि कायम रखी, जो महायुद्ध बाद के बेबी बूम और वैश्वीकरण से संचालित थी। अब आबादी में आया वह उछाल खत्म हो गया है और वैश्वीकरण भी घट रहा है। इसलिए संभावना नहीं है कि कोई देश निकट भविष्य में वैसी आर्थिक तेजी दिखा पाएगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था विश्वयुद्ध के बाद के 4 फीसदी से अधिक के औसत से गिरकर 3 फीसदी के नीचे चली गई है। उस दौर में हर पांच अर्थव्यवस्थाओं में से एक 7 फीसदी से अधिक की रफ्तार से बढ़ी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष 200 अर्थव्यवस्थाओं पर निगाह रखता है और सिर्फ 8 या 20 में से एक ही 7 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर की राह पर है। ज्यादातर अफ्रीका की छोटी अर्थव्यवस्थाएं हैं। इस हफ्ते खतरे की घंटी उन रिपोर्टों से बजीं, जिनमें कहा गया है कि एक दशक पहले प्राय: दो अंकों वाली रफ्तार दिखाने वाले चीन की रफ्तार 6 फीसदी से थोड़ी ही ऊपर रहेगी। यदि आबादी में उछाल न हो तो यह दुर्लभ ही होता है कि अर्थव्यवस्थाएं 6 फीसदी की वृद्धि दर से बढ़ें। 2015 में न सिर्फ चीन की आबादी में वृद्धि ने नकारात्मक मोड़ लिया बल्कि दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक के रूप में डिग्लोबलाइजेशन की सबसे ज्यादा मार भी इसी पर पड़ी। इसकी अर्थव्यवस्था पर घटती उत्पादकता का बोझ भी है और कर्ज का बोझ तो कई धनी अर्थव्यवस्थाओं से भी अधिक है। यदि चीन वाकई 6 फीसदी से अधिक की गति से बढ़ रहा है तो यह जश्न का मौका है। हर देश को सफलता की अपनी परिभाषा पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए 5 फीसदी की दर ही 7 फीसदी के बराबर है, जो तीव्र वृद्धि का बेंचमार्क रहा है। चीन जैसी मध्यआय वाले देश के लिए 3-4 फीसदी की आर्थिक दर नया मानक होना चाहिए। अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए दर 3 से 4 फीसदी से घटाकर 1 से 2 फीसदी होनी चाहिए।

इस पुनर्विचार की लंबे समय से आवश्यकता थी। अपेक्षा है कि 2040 तक घटती कामकाजी आबादी वाले देशों की संख्या 46 से बढ़कर 67 हो जाएगी और कई तरह से उत्पादकता वृद्धि भी धीमी पड़ेगी, जिस पर दुनिया के भारी कर्ज और बढ़ते व्यापार प्रतिबंधों का और असर पड़ेगा। आर्थिक सफलता के मानकों को पुनर्परिभाषित करने से कई देशों की धीमी वृद्धि को लेकर अतार्किक चिंताओं का इलाज होगा और दुनिया में अधिक चैन आएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

रुचिर शर्मा ग्लोबल इन्वेस्टर, बेस्टसेलिंग राइटर अौर द न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार

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