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युवावस्था जीवन का स्वर्णकाल है, जिसमें हम समाज, माता-पिता की सेवा सहित सारे जगत के हित के कार्य कर सकते हैं : डाॅ. राजेंद्रदास

Sagar News - जीवन में मनुष्य की जाे युवावस्था है, वह उसका स्वर्णकाल है। एक अवस्था प्रमाद में चली जाती है बचपन की। बुढ़ापे में...

Nov 15, 2019, 09:21 AM IST
Sagar News - mp news youth is a golden period of life in which we can work for the benefit of society and all the world including the service of parents dr rajendradas
जीवन में मनुष्य की जाे युवावस्था है, वह उसका स्वर्णकाल है। एक अवस्था प्रमाद में चली जाती है बचपन की। बुढ़ापे में शरीर से कुछ हाेता नहीं है। युवावस्था ही ईश्वर की बहुत बड़ी भेंट है, जिसमें लाेगाें के लिए जिसमें हम समाज की सेवा, राष्ट्र की सेवा, गाैवंश की सेवा, संताें की सेवा, माता-पिता की सेवा, अपने सहित सारे जगत के हित के कार्य कर सकते हैं। सबकी सेवा कर सकते हैं। यह बात मलूक पीठाधीश्वर डाॅ. राजेंद्रदास महाराज ने संत समागम श्रीमद भागवत कथा के शुभारंभ पर कही।

धर्मश्री स्थित बालाजी मंदिर परिसर में सप्ताह भर चलने वाले सदगुरु कृपा महोत्सव में व्यासगादी से उन्होंने कहा कि श्रीमद भागवत कथा अतीत के शोक, भविष्य के भय और वर्तमान के मोह से निवृत कराती है। भागवत कथा की महिमा एेसी है कि इसकी श्रवण इच्छा मात्र से ही प्रभु हृदय में कैद हो जाते हैं। उन्होंने गौ माता को साक्षात अग्निहोत्र और यज्ञ बताया।

डाॅ. राजेंद्रदास महाराज ने यह भी कहा -

 शिष्य-पुत्र की प्रशंसा अनुपस्थिति में हाे : शिष्य अाैर पुत्र की प्रशंसा हमें नहीं करना चाहिए। क्योंकि शास्त्र में एेसी अाज्ञा है कि शिष्य अाैर पुत्र की प्रशंसा नहीं करना चाहिए। बल्कि इनके दाेष ही बताना चाहिए। गुण नहीं। इनकी पीठ पीछे प्रशंसा जरूर करना चाहिए।

 श्रद्धा के बिना कर्म का काेई फल नहीं मिलता : गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि यदि जीवन में श्रद्धा न हो तो यज्ञ, हवन, दान और तप सब बेकार हैं। श्रद्धा के बिना किए गए कर्म का कोई फल नहीं मिलता। जीवन में श्रद्धा होनी ही चाहिए। साधकों की सबसे बड़ी पंूजी श्रद्धा ही है। बिना महात्म्य श्रवण के श्रद्धा नहीं है।

 जीवन धर्म में लगा रहे : मानव जीवन दीपक के प्रकाश के समान है। जाे कि तेज अाैर धीमा रहता है। उसकी राेशनी हम सब पर पड़ती है। जब वह बुझने की अाेर हाेता है ताे धर्म का पतन हाेता है। मानव का पतन हाेता है। इसलिए इस बात की काेशिश करते रहना चाहिए कि जीवन धर्म में लगा रहे अाैर सदा अलाैकिक बना रहे अाैर दूसराें काे करता रहे।

 माता-पिता ही हर बात का पालन करें : माता-पिता अाैर गुरु की हर बात का पालन हर हाल में करना चाहिए। यदि वे शास्त्र विरुद्ध आदेश भी करते हैं ताे भी उसका पालन करना चाहिए। क्योंकि आदेश देने वाले काे पाप लगता है करने वाले काे नहीं। युधिष्ठिर काे जुअा खेलने का आदेश धृतराष्ट्र ने दिया था। इसलिए उसका पाप धृतराष्ट्र काे लगा, युधिष्ठिर काे नहीं।

 सेवा करने से ही सब मिलता है : सेवा करने से ही सब प्राप्त हाेता है। सेवा से ही कथा का पाचन हाेगा। अन्यथा कथा पचती नहीं है। ब्राह्मण वही है ताे गाय की उपासना करे। क्षत्रिय वही है जाे गाय का रक्षण करे। वैश्य वही है जाे गाय का पालन करे। शूद्र वही है जाे गाय की सेवा करे। ब्रह्मचारी वही है जाे गाय का चारण करे।

सागर के लिए यह आयोजन सौभाग्य का विषय है : किशाेर देवजू महाराज

भागवत कथा की अध्यक्षता करते हुये श्रीकिशोर देवजू महाराज ने कहा कि सागर के लिये यह सौभाग्य का विषय है कि मलूकपीठाधीश्वर भागवत सम्राट डाॅ. राजेंद्रदास महाराज के मुखारविंद से भागवत कथा हाे रही है। जिसमें राष्ट्रीय संतो का आगमन हो रहा है। उन्होंने हरि कीर्तन भी कराया। साध्वी कनकेश्वरी देवी ने कहा कि राजा परीक्षित को संत अवज्ञा के बाद भी सात दिन का समय दिया गया। क्योंकि एक बार उन्होंने गौ रक्षा के लिये तलवार उठाई थी। इन्हीं सात दिनों में काल से पहले कालातीत महापुरुष मिल गए। श्रीमद् भागवत कथा गौ माता का प्रसाद है। रसराज महाराज ने स्वामीजी के आगमन को सागरवासियों का सौभाग्य बताया। उन्होंने कहा कि सागर अब तीर्थ सागर हो गया।

सागर आस्था के साथ ही छोटे वृंदावन के रूप में जाना जाता है

सुबह पत्रकारों से चर्चा करते हुए डाॅ. राजेंद्रदास महाराज ने कहा कि भारत वर्ष पवित्र देश आर्य संस्कृति की धरती है। जिसमें मानवीय संस्कृति बसती है और देश के सभी स्थानों में देवताओं का वास है। भारत माता का हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश भावना प्रेम, श्रृद्धा की धरती है। मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड अाैर सागर की धरा आस्था धार्मिक एवं पुण्य भूमि के साथ ही छोटे वृंदावन के रूप में जानी जाती है। सागर के भक्तप्रेमी लंबे समय से संत समागम के लिए प्रयासरत थे, लेकिन अब यह अायाेजन हाे पा रहा है। उन्होंने कहा कि रसराजदास का जाे श्रम है, वह निश्चित ही बहुत प्रशंसनीय है। इन्होंने सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। सभी का समर्पित सहयोग रहा। पूज्य गाेरीलाल कुंजवाले महाराज कह रहे थे कि हमारे ध्यान में लगभग 40 वर्षाें में इतना काेई विराट उत्सव नहीं हुअा।

रात में वृंदावन की रासलीला में डूबे रहे भक्त

सागर। रात में वृंदावन की रासलीला की प्रस्तुति हुई। कलाकारों ने एेसी रास रचाई कि हर काेई मंत्रमुग्ध सा हाेकर उसमें डूबा रहा। हजाराें की संख्या मंे लाेग कथा स्थल पर पहुंचे।

Âयह कार्यक्रम भी हुए : अायाेजन स्थल पर सुबह 4 बजे से चाराें वेदाें का पाठ, भागवत का मूल पाठ, 18 हजार श्लाेकाें का परायण 108 विद्वान पंडितों द्वारा शुरू कर दिया गया था। साथ ही श्रीरामचरित मानस का पाठ 108 संतों द्वारा किया गया। भक्तमालजी का पाठ 108 संतों द्वारा एवं हरिनाम संकीर्तन भी हुअा। दोपहर में 1 से 5 बजे तक कथा हुई। इसके बाद भंडारे में हजाराें लाेगाें ने प्रसादी ग्रहण की। राेजाना सभी कार्यक्रम इसी समय पर हाेंगे। कार्यक्रम स्थल पर गाैपूजन भी हुअा। रात में रासलीला हुई।

देश भर से जुटे संत, डाॅ. राजेंद्रदास महाराज के पिता ने भक्ताें अाैर संताें के बीच बैठकर कथा सुनी

संत समागम के पहले ही दिन सैकड़ाें की संख्या में देश भर से अाए संत पहुंचे। मलूकपीठाधीश्वर डाॅ. राजेंद्रास महाराज के पिता रामस्वरूप पांडे भी टीकमगढ़ जिले से कथा सुनने के लिए बालाजी मंदिर परिसर पहुंचे। उन्होंने संताें के बीच बैठकर कथा सुनी। कथा में श्रृवणानंद महाराज वृन्दावन, भृगुनंद, शुद्धानंद अमरकंटक, श्री लक्ष्मण किला झील अयोध्या, रामाप्रसाददास, राघवेंद्रदास, शिवरामदास, सीतारामदास, रामनुग्रहदास, हरिदास, रामगोपालदास, अर्जुनदास, जगन्नाथदास, रामस्वरूप अादि संत पहुंचे। इंदौर से विधायक रमेश मेंदोला सहित हजाराें की संख्या में श्रद्धालु कथा सुनने पहुंचे।

डाॅ. राजेंद्रास महाराज के

पिता रामस्वरूप पांडे

राम का चरित्र अपनाने से व्यक्तित्व आकर्षक होता है, जीवन में अगर राम अा जाएंगे ताे घर-घर में राम राज्य अा जाएगा : कनकेश्वरी देवी

संदीप तिवारी। सागर

राम से हमें चरित्र सीखना है। आकर्षक राम के चरित्र से अपना चरित्र बना लेते हैं, उनका व्यक्तित्व आकर्षक हाेता है। कृष्ण मतलब एक आकर्षक व्यक्तित्व जाे खीचने वाला है। यानी एेसा व्यक्तित्व जाे किसी काे भी भा जाए। उनका देखना अच्छा लगता है। उनका सुनना, सब अच्छा लगेगा। वाे श्याम हाेकर भी सुंदर हैं। क्या काेई दुनिया में श्याम हाेकर सुंदर हाेता है? परंतु कृष्ण की श्यामता भी माेहक है। कृष्ण बनना हाे ताे चरित्र राम से सीखना पड़ेगा। जीवन में अगर राम अा जाएंगे ताे घर-घर में राम राज्य अा जाएगा। यह बात अग्नि अखाड़ा की पहला महिला महामंडलेश्वर कनकेश्वरी देवी ने भास्कर से विशेष साक्षात्कार में कही। वे सागर में अायोजित संत समागम के शुभारंभ के माैके पर सागर पहुंची थीं। उन्होंने कहा कि मेरे हिसाब से देश में जाे सबसे बड़े दाे काम हाेना चाहिए, उनमें से सबसे पहला है कि गाय काे बचना चाहिए। लाेगाें काे गाय की महिमा काे समझना चाहिए। गाय का महत्व हर काेई समझे। गाय में कितनी खूबियां पड़ी हैं। कितनी शक्तियां हैं। उनसे जगत लाभांवित हाेगा, यह समय की आवश्यकता है। दूसरा काम है कि धर्म ग्रंथों का जाे स्वरूप है, उसे विकृत हाेने से बचाना है।

 संत समागम जैसे आयोजनों से अाखिर उद्देश्य क्या हाेता है, यह किस तरह का असर करते हैं?

- लाेग जाे धर्म काे मानते हैं, लेकिन जानते नहीं हैं, वह इस तरह के अायाेजनाें से ही धर्म के मर्म काे समझते हैं। क्योंकि कई लाेग सिर्फ परंपराओं के नाम पर धर्म काे बिना जाने ही मानते रहते हैं। एेसे लाेगाें काे काेई भी भ्रमित कर सकता है। एेसे समय में एक मंच पर देश भर के महात्माओं का मिलाप हाेने से धर्म का सटीक स्वरूप समाज में स्थापित हाे जाता है। धर्म की व्याख्या लाेगाें के दिमाग में बैठती है।

 अाप अग्नि अखाड़े की पहली महिला मंडलेश्वर हैं, एेसे में धर्म में महिलाओं की स्थिति काे किस तरह से लेती हैं?

- धर्म सभी का लक्ष्य रहता है। परंतु धर्म क्षेत्र में जब माताओं काे, महिलाओं काे अागे बढ़ना हाेता है, प्रचार का काम करना हाेता है तब उनके सामने जाे परिस्थिति हाेती हैं, वह बिल्कुल अलग हाेती हैं। जब पुरुष धर्म प्रचार करते हैं ताे उनके लिए अलग ही माहाैल मिलता है। महिलाओं के लिए बहुत चमक-धमक से लाेगाें की बाताें से, ठाठ से परहेज करते हुए अागे बढ़ना पड़ता है।

 गाैवध कैसे रुकेगा, सड़क पर विचरण के लिए लाेग जाे गायाें काे छाेड़ देते हैं, उसका समाधान अाप क्या मानती हैं?

- जब गाय काे धर्म, अर्थ, काम अाैर माेक्ष चाराें दृष्टिकोण से देखा जाए ताे गाय बच जाएगी। केवल धर्म की दृष्टि से देखेंगे कि गाय के पूजन का महत्व है गाैसेवा से स्वर्ग, माेक्ष, बैकुंठ मिलता है। ताे यह बातें सुनने में अाैर धर्म की दृष्टि से अच्छी लगती हैं। लेकिन गाय काे बचाना है ताे हमें यह समझना हाेगा कि गाय के द्वारा समृद्धि अाती है। गाय से अर्थ की प्राप्ति हाेती है। जितने भी लाेक हैं, समस्त लाेकाें की समृद्धि का अाधार गाय ही है। यह पुराणाें से हमें समझना हाेगा। इस पर चिंतन करना पड़ेगा। गाैलाेक पर ही संपूर्ण लाेक की समृद्धि है। शिव लाेक की समृद्धि का मूल भी गाय है। शिवपुराण में इसका उल्लेख है। शिव सबसे बड़े दाता है। शिव के पास कहां से अाता है? शिव लाेक में पांच प्रकार की गाय हैं। नंदा, सुनंदा, सुरभि, सुशीला अाैर सुमन। ये पांचाें प्रकार की गायें यानी सभी भारतीय गायें समृद्धि का अाधार हैं। जिस दिन लाेग यह समझ जाएंगे, गाय बचने लगेंगी। गाैवध रुक जाएगा।

 क्या समाज सुधार के लिए साधु हाेना जरूरी है?

- समाज सुधार के लिए साधु हाेना काेई जरूरी नहीं है। इसके लिए सिर्फ विचारवान हाेना जरूरी है। साधु ताे उससे भी बड़ा काम करता है। साधु समाज-सुधार का काम नहीं करता है। समाजसुधारक ताे दुनिया में बहुत अाते हैं अाैर चले जाते हैं। थाेड़ा-बहुत सुधार भी कर लेते हैं। परंतु साधु समाज के जीवाें काे जगाने का काम करता है।

महिला महामंडलेश्वर कनकेश्वरी देवी

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