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एक बार विश्वास टूट जाए तो दोबारा हासिल करना असंभव होता है : मुनि सुब्रतसागर

अंकुर कालोनी में विराजमान मुनि सुब्रतसागर महाराज ने धर्मसभा में कहा यदि आपने शुद्धात्मा की प्राप्ति के लिए...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 05:05 AM IST
अंकुर कालोनी में विराजमान मुनि सुब्रतसागर महाराज ने धर्मसभा में कहा यदि आपने शुद्धात्मा की प्राप्ति के लिए लक्ष्य बनाया है तब उसे प्राप्त करने के लिए प्रय| करना पड़ेगा। जिस प्रकार एक बच्चा अपनी जिद की पूरी करने लिए प्रय| करता है और सफल हो जाता है।

पुरुष लड़-झगड़ कर, नारियां रो-रो कर अपनी इच्छा की पूर्ति करवा लेती हैं। मन वचन काय से प्रय| करने पर इच्छा पूरी हो जाती है। हमें जहां पर विश्वास होता है वहीं पर हम अपनी वेदना को व्यक्त करते हैं ।एक कथा के माध्यम से मुनिश्री ने बताया कि एक युवक शादी करके विदेश से अपनी प|ी को लेकर पानी के जहाज से अपने देश को लौट रहा था आगे तूफान आने से जहाज डगमगा जाता है ,लोग घबरा जाते हैं ।सभी अपने इष्ट देव को याद करने लगते हैं नई नवेली दुल्हन भी आंखें बंद करके भगवान को याद करने लगती है। परंतु पति निश्चिंत भाव से बैठा रहता है ।प|ी ज्यों ही आंखें खोलकर देखती है पति को उलाहना देते हुए कहती है इस संकट की घड़ी में आप चुपचाप बैठे हो कुछ भी नहीं कर रहे हो आपको प्रार्थना करना चाहिए। पति गुस्से में चाकू निकालकर प|ी की गर्दन पर रख देता है पर प|ी अपनी भक्ति में लीन हो जाती है पति यह देखकर प|ी से कहता है कि तुम चाकू से भयभीत क्यों नहीं हो रही हो प|ी ने कहा मैं तुमसे डरने वाली नहीं तुम अगर तलवार भी लेकर आओ तो भी मैं नही डरूंगी क्योंकि मुझे अपने पति पर भरोसा है।

मुनि परंपरा के संवाहक थे आचार्य शांतिसागर महाराज : आर्यिका विज्ञानमति

सागर | बीसवीं सदी के प्रभावक संत आचार्य विद्यासागर महाराज के दादा गुरू आचार्य शांतिसागर महाराज का समाधि दिवस मंगलवार को नेहानगर में पूजन व महाआरती कर मनाया गया।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका विज्ञानमति माता ने कहा कि आचार्य शांतिसागर महाराज के काल में मुनियों के दर्शन दुर्लभ हो गए थे । अंग्रेजों का शासन था , भगवान के दर्शन तो सर्वत्र थे लेकिन मुनियों का अभाव था । उस समय उन्होंने देश में साधु समाज की जो पगडंडी बनाई थी , उस पगडंडी को आचार्य विद्यासागर महाराज ने पक्का मार्ग बना दिया। आर्यिका ने कहा कि अंग्रेजों के समय जब उन्होंने दिल्ली के लालकिले के सामने खड़े होकर फोटो निकलवाई तो लोगों ने कहा था कि महाराज ये फोटो किसलिए तब उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों के समय भी दिगंबर साधु अपनी चर्या के लिए स्वतंत्र थे। उन्होंने अपने 36 वर्ष के साधु जीवन में 27 वर्ष उपवास किये थे । जब आंखों से दिखना बहुत कम हो गया तो उन्होंने समाधि की साधना प्रारंभ कर दी । संविधान में जैन धर्म को हिंदू धर्म से जोड़ने का प्रस्ताव का विरोध करते हुए तीन दिन अन्न जल छोड़ दिया था । उनके समाधि दिवस पर हम संकल्प लें कि हमारा जीवन उनके बताए आदर्शों पर चल सके।