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आठवीं पास सरला की तरकीब ने गांव को बना दिया निर्मल

गांव की साधारण सी महिला सरला। कोई बड़ी एप्रोच नहीं और शिक्षा स्तर भी कोई ऊंचा नहीं, लेकिन पूरे गांव को सुधारने का काम...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 14, 2018, 05:35 AM IST

आठवीं पास सरला की तरकीब ने गांव को बना दिया निर्मल
गांव की साधारण सी महिला सरला। कोई बड़ी एप्रोच नहीं और शिक्षा स्तर भी कोई ऊंचा नहीं, लेकिन पूरे गांव को सुधारने का काम कर दिया। गांव के लोगों में आपसी तालमेल बनाना और हर बात को आधुनिक सोच के अनुसार गढ़ना सरला का जुनून है। इसी कारण भोगईखापा गांव विकसित है। अपनी नई-नई तरकीब से सरला ने पहले गांव को निर्मल बनाया फिर परिवारों से विवादों को खत्म किया। इसलिए सरला आज गांव की सुकन्या बहू है।

2000 से 2010 के दशक में महिलाओं को खुली आजादी नहीं थी। इसी बीच 2006 में बंजारीढाल जैसे आदिवासी गांव से ब्याह कर भोगईखापा आई सरला के लिए यहां आकर काम करना अलग माहौल जैसा था।

मगर, गांव के लिए कुछ करने का जुनून था। इसलिए पति मनोज शीलूकर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर परिवार की जिम्मेदारी निभाई। उस दशक में आदिवासी घरों में शौचालय बनाना यानी घर में गंदगी रखना मानते थे। मगर, महज 8वीं पास सरला ने सबसे पहले अपने घर में पक्का बाथरूम और शौचालय बनाया। इससे निकले वेस्ट पानी से उसने लोगों को खेती करना सिखाया। अब गांव के तकरीबन हर घर में शौचालय है। यही कारण है सरपंच नब्बी नंदोरी धुर्वे के रहते हुए भोगईखापा को निर्मल ग्राम का अवार्ड मिला।

चूंकि अवार्ड समुदाय आधारित था इसलिए सभी को जागरूक करना और स्वच्छता के मापदंड को बरकरार रखना चुनौती है, लेकिन गांव में जागरूकता के कारण अब यह कठिन नहीं है। सरला इसकी मॉनीटरिंग खुद करती है। ग्राम भारती महिला मंडल की अध्यक्ष भारती अग्रवाल ने बताया सरला समय-समय पर संस्था की मदद भी लेती है।

सारनी। घर में टॉयलेट से निकले वेस्ट वाटर से सब्जियां लगाई जाती हैं। सफाई करती सरला।

घर का विवाद घर में ही रहे गांव में आपसी सुलह से बात बने

2006 के बाद जब सरला ब्याह कर भोगईखापा पहुंची तो यहां की बड़ी समस्या थी। घरों में विवाद, थाने, चौकी के चक्कर काटकर लोग परेशान थे। परिवार टूटते थे, लेकिन इसके बाद सरला ने गांव के हर घर में अपनी एप्रोच बनाई, लोगों से बात की। विवाद होता तो बैठकर सुलझाते। गांव के बड़े, बुजुर्गों और सरपंच हस्तक्षेप कर विवादों को शांत करते। खास बात यह है पिछले 10 सालों में गांव में एक भी दहेज और विवाद का प्रकरण सामने नहीं आया। लोग घुल मिलकर रहने लगे।

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