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शोध: कम लागत में होगी सोयाबीन खेताें से पानी में नहीं मिलेगा केमिकल

2 वर्ष पहले
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आरएके कॉलेज में चल रहे अनुसंधान काे वर्जीनिया अमेरिका के डेवलपमेंट हेड ने देखा

भास्कर संवाददाता | सीहोर

माईकोमिक्स के प्रयोग से सोयाबीन की फसल में कम लागत में अधिक उत्पादन लेने पर शोध किया जा रहा है। इसमें खास बात यह है इससे खेतों से जो केमिकल पानी में जाकर मिलता है, उस समस्या से भी आने वाले दिनों में निजात मिल सकेगी। इस कल्चर का उपयोग करने से मिट़्टी का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है और यह अगली फसलों के लिए भी लाभकारी होता है। बुधवार को आरएके कॉलेज में इस शोध को देखने वर्जीनिया अमेरिका के एप्लिकेशन डेवलपमेंट हेड और देश के एप्लिकेशन डेवलपमेंट हेड देखने पहुुंचे। यहां पर उन्हें कृषि वैज्ञानिकों ने विस्तार से जानकारी दी जिसे देख उन्होंने शोध कार्य को बेहतर बताया।

आरएके कृषि कॉलेज स्थित अखिल भारतीय सोयाबीन अनुसंधान केंद्र में सोयाबीन की उपयुक्त उपज वृद्धि और प्रदूषण रहित मिट्टी के स्वास्थ्य को बरकरार रखने के लिए चल रहे अनुसंधान कार्यों को देखने वर्जीनिया अमेरिका के एप्लिकेशन डेवलपमेंट हेड डॉ. ली वेस्ट, एप्लिकेशन डेवलपमेंट हेड चिन्मय सर्देश पांडेय एवं मिर्जा वेग सीहोर आए। इस मौके पर उन्होंने यहां पर किए गए शोध कार्यों की सराहना की। राईजोबियम जापोनिकम एवं वेसीकुलर अर्वस्कुलर माईकोराईईजल कल्चर ( माईकोमिक्स) के प्रयोग पर चल रहे अनुसंधान कार्यों की अखिल भारतीय सोयाबीन अनुसंधान केंद्र के अंतर्गत डॉ. आरसी जैन प्रधान वैज्ञानिक एवं एमएससी छात्र छात्राएं शोध कर रहे हैं।

इस दौरान कृषि महाविद्यालय के डीन. डॉ. राजेश वर्मा, राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पूर्व संचालक कृषि अनुसंधान डॉ. एचएस यादव, डॉ. आरपी सिंह, प्रधान वैज्ञानिक शस्य विज्ञान डॉ. केएन पाठक आदि मौजूद थे।

क्या होते हैं फायदे

वैज्ञानिकों ने बताया कि कम लागत में इसका कल्चर का उपयोग करने से अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। केमिकल का उपयोग करने पर एक हेक्टेयर रकबे में जब सोयाबीन की खेती करने में किसानों को 21 हजार की लागत आती है जबकि जीवाणु कल्चर का उपयोग करने पर एक हेक्टेयर क्षेत्र में 14 से 15 हजार रुपए का खर्च आता है। इसी तरह उत्पादन पर भी इसका असर दिखाई देता है। 12 से 20 फीसदी उत्पादन भी अधिक होता है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि केमिकल का उपयोग करने पर खेतों से यह पानी में जाता है। इसके बाद नालों से नदियों और कुअों तक के पानी में यह केमिकल पहुंचता है जो पेयजल में आ जाता है। इससे काफी नुकसान होता है।

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