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अहंकार विनाश का सूचक, सबसे बड़ा पराक्रम संसार को त्याग करना है: आचार्य जितरत्न सागर

एक वर्ष पहले
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आज के समय में लोगों ने अपने घर को होटल का रूप दे रखा है। होटल में खाना खाता है, वह घर नहीं जाता है, बीमार पड़ता है। समाज में सुधार क्यों नहीं हो रहा ,क्योंकि न तो वह संतों की सुन रहे हैं और न महावीर के बताए हुए मार्ग पर चल रहे हैं। कोई नोट के लिए मर गए, तो कोई वोट के लिए मर गए। आज भगत सिंह जिंदा होते हैं तो कहते हैं हम किन लोगों के लिए मर गए। आज की बहू -बेटियां अज्ञानता में जी रही हैं। दिनभर इस नश्वर काया को आप लोग संवारने में लगे हैं, लेकिन यह काया आपका साथ नहीं देगी। यह काया किराए के मकान के समान समझना चाहिए। आज लोगों में मोह रूपी नशा चढ़ा हुआ है। संसार का सबसे बड़ा पराक्रम संसार का त्याग करना है। अहंकार विनाश का सूचक है।

उक्त बातें नगर की बेटी चंचल सुराणा को दीक्षा दिलाने के लिए पधारे आचार्य जितर|सागर सूरिश्वर महाराज ने श्री महावीर श्वेतांबर जैन मंदिर गंज के उपाश्रय में आशीष वचन के दौरान कहीं। उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति को भोजन में भक्ष-अभक्ष का ध्यान नहीं रहता, कल आपके बच्चे-बच्ची नहीं मानेंगे। वह लोग सिखाने से नहीं देखने से सीखते हैं। आज घरों में क्या-क्या आ रहा है और क्या-क्या खा रहे हैं ,इस पर ध्यान देना होगा।

आचार्य जितर|सागर महाराज ने कहा कि पहले जैन का घर लोगों को स्वतरू ही पता चल जाता था, सूर्यास्त के पहले भोजन करते थे, आज स्थिति इसके विपरीत है। चंचल सुराणा ने भी समझ लिया कि यह काया धोखा है, उसके पहले भावना धाड़ीवाल ने इसे सबसेेे पहले समझा था और वह त्याग के पथ पर अग्रसर होकर साध्वी के रूप में आज इस नगर में पधारी है। आचार्य श्री ने कहा कि जो समझेगा वहीं तपस्या के पथ पर चलेगा।

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