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मान्यता आखिर क्यों पूजे जाते हैं बाबा गरीबनाथ

एक वर्ष पहले
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शहर से 66 किमी दूर शजापुर जिले की सीमा में स्थित गांव अवंतिपुर बड़ोदिया में शनिवार को करीब 30 हजार लोग बाबा गरीबनाथ धाम पर जुटे। मौका था ध्वज पाट उतारने और फिर चढ़ाने का। 85 फीट ऊंचे ध्वज की कलंगी पर लगी आलतुम्बी यानी सूखी गोल लौकी की पपड़ी और साल भर बाद जमीन से हूबहू निकले नारियल व अन्य सामग्री पाने के लिए एकत्रित हुए। सूनी गोद भरने 4 हजार से ज्यादा महिलाओं ने ध्वज स्तम्भ पर गोबर से उल्टा सातिया बनाए।

आयोजन के दौरान भी प्रदेश में चल रही राजनीति का असर देखने को मिला। हर साल यहां सांसद, विधायक सहित कई नेता और जनप्रतिनिधि पहुंचे हैं, लेकिन लेकिन इस शनिवार को यहां कोई नही पहुंचा। शनिवार सुबह बाबा गरीबनाथ धाम पर सागौन से बने 13 टन वजनी ध्वज पाट उतारे गए और मरम्मत कर इसी दिन शाम को ध्वज वापस हर वर्ष की तरह खड़ा किया गया। पंचमी पर यहां समाधि स्थल पर लगा ध्वज स्तंभ साल में एक बार उतारा जाता है और देशभर से आए श्रद्धालु 13 टन वजनी ध्वज के नीचे 20 फीट गहरे गड्ढे में मन्नत के नारियल,अगरबत्ती व पान के पत्ते डालते है, जो एक साल बाद भी हुबहू निकलते है।

गरीबनाथ धाम : सुबह 13 टन वजनी 85 फीट लंबे ध्वज पाट को नीचे उतारा फिर सूनी गोद भरने महिलाओं ने बनाए सातियां, शाम को श्रृंगार कर 700 फीट की रस्सी से 200 लोगों ने ऊपर चढ़ाया

गरीबनाथ धाम पर ध्वज पाट चढ़ाने
में इतनी सामग्री का हुआ उपयोग


85 फीट लंबा ध्वज

13 टन वजन

130 घन फीट सागौन

15 लीटर रंग

700 फीट रस्सी

1 क्विंटल फूल

7 हजार नारियल

10 हजार पान पत्ते

50 किलो अगरबत्ती

2 क्विंटल नमक

85 फीट लंबे होते हैं पाट

सागौन के नौ पाटों से बने इस ध्वज स्तंभ की लंबाई 85 फीट है। जिसे सिर्फ 5 फीट जमीन में गाड़ा जाता है। कच्ची जमीन में नारियल के ऊपर गड़े होने के बाद भी करीब 13 टन भारी यह स्तंभ साल भर स्थिर खड़ा रहता है।

24 मार्च तक चलेगा मेला

आयोजन समित के महेंद्र सोनी ने बताया कि ये मेला रंगपंचमी से शुरू होकर 24 मार्च तक चलेगा। बाबा गरीब नाथ की समाधि पर स्थापित 13 टन वजनी सागौन के स्तंभ को साल में एक बार इस दिन उतार दिन भर साफ-सफाई, मरम्मत व नवीन श्रृंगार कर सूर्यास्त के पूर्व वापस खड़ा किया जाता है।

प्राचीन दुर्लभ लेखों के अनुसार बाबा गरीबनाथ गुसाईं (गोस्वामी) सम्प्रदाय से थे। सं.1246 में झांसी के जूना मठ पर अपने गुरु हरीगिरदासजी महाराज के समाधि लेने के बाद वे तीर्थाटन के लिए निकले और घूमते हुए अवंतिपुर बड़ोदिया पहुंचे। यहां दूधी नेवज किनारे सुरम्य तट देख मांं लालबाई-फुलबाई (अन्नपूर्णा) की भक्ति करते हुए कुटिया बनाकर वे यहीं रहने लगे। 1345 ई. में समाधि ले ली। समाधि के 1 माह बाद गांव के तीर्थ यात्रियों को उप्र के सौरंमजी गंगाघाट पर उन्होंने साक्षात दर्शन दिए थे। उन्होंने बाबा को गांव चलने को कहा वे नहीं माने तो जबरन डोली में बैठा करा ग्रामीण इन्हें लाने लगे पर लश्कर (ग्वालियर) के समीप ही बाबा डोली से अंतर्ध्यान हो गए और एक पाती छोड़ी जिसमें उन्होंने हर वक्त गांव की रक्षा करने का वचन दिया। पाती में इन्होंने यह भी लिखा था कि नौ-नौ हाथ के नौ सागौन के पाट से एक स्तंभ तैयार कर मेरे समाधि स्थल पर रंग पंचमी पर खड़ा करें। मैं भंवरे के रुप में हर साल वहां आऊंगा। बस तभी से यहां से परम्परा चल पड़ी।
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