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गुर्जर समाज ने होली के दिन गमी वाले घरों में रंग डालने के नाम पर चल रही कुप्रथा बंद की
जिले के गुर्जर समाजजनों ने समाज में सालों से प्रचलित कुप्रथा को बंद करने का कमाल कर दिखाया है। कपड़ा प्रथा बंद होने से अब न तो गमी (जिन घरों में होली के बाद किसी की मौत हो चुकी है) पर बोझ पड़ता है और न ही वहां रंग डालने पहुंचने वालों पर। ऐसे में अब सीधे 90 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च की बचत होने लगी है।
ज्ञात रहे गुर्जर समाज में होली के दिन गमी वाले घर पर रंग डालने जाने वाली बहन बेटियों के लिए वर्तन व कपडा प्रथा थी, जिसमें बहन-बेटी 100 रुपए देती थी। इसके बदले गमी वाले परिवार के लोग उन्हें बर्तन या साडी देकर विदा करते थे। इस प्रथा को समाप्त करते हुए बहन बेटियों द्वारा दी जाने वाली राशि पूर्णत: बंद कर दी गई। वहीं बदले में गमी वाले परिजनों की तरफ से उन्हें दिए जाने वाले कपड़े व बर्तन आदि की कुप्रथा को बंद कर इसकी जगह सिर्फ 100-100 रुपए नकद देकर
विदा किया जाता है।
कुप्रथा को दूर करने की शुरूआत 2015 मंें हुई थी
समाज में फैली कुप्रथा को बंद करने के लिए 5 साल पहले समाज के कुछ वरिष्ठजनों ने शुरूआत की। समाजजनों की बेरछा के समीप ग्राम बटवाडी के पास पहाड़ी पर बैठक हुई। यहां सभी ने इस कुप्रथा को बंद करने का फैसला लिया। प्रथा को रोकने के लिए प्रत्येक गांव में समाज सुधार समिति बनाई गई।
भगवान देवनारायण को बनाया समिति अध्यक्ष
समाज के वरिष्ठ कृष्णकांत कराड़ा ने बताया शाजापुर, आगर, देवास, उज्जैन, राजगढ़ आदि जिले के 300 गांवों में समितियां बना दी है। समाज सुधार समिति के नाम से संचालित समितियों में सभी जगह अध्यक्ष के रूप में समाज के ईष्टदेव भगवान देवनारायण को ही बनाया गया है। बाकी सभी समाजजन सदस्य के रूप में काम करते है।
इन्होंने की शुरुआत
समाज सुधार समिति के सदस्य कृष्णकांत कराड़ा एडवोकेट, मान सिहं राणा, मोती सिहं, बने सिहं, मोड सिह, शिक्षक इंदर सिह, रतन सिंह, भगवान सिंह, मदन सिंह व विहारीलाल, राजेश अंसल एडवोकट, वीरेंद्र सोंती एडवोकेट आदि ने 5 साल पहले इसकी शुरुआत की थी।
यह बदलाव आया : पहल शुरू करने वाले कृष्णकांत कराड़ा ने कहा कि इस बदलाव से समाज आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है। इस कुप्रथा के कारण हर साल खर्च होने वाले 1 करोड़ रुपए से ज्यादा फिजूलखर्ची पर अब रोक लग गई है। इससे समाज में शिक्षा का बढ़ावा मिला है। **