हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा, नागपुर की रंगोली, बड़नगर के बैंड ने समा बांधा

Shajapur News - सोमवार को समीपस्थ कस्बे पिड़ावा में सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा समाधि प्राप्त महामुनि श्री ब्रह्मानंद सागर जी...

Dec 04, 2019, 10:47 AM IST
Susner News - mp news pushp varsha by helicopter rangoli from nagpur band of badnagar tied sama
सोमवार को समीपस्थ कस्बे पिड़ावा में सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा समाधि प्राप्त महामुनि श्री ब्रह्मानंद सागर जी महाराज के आशीर्वाद व उपाध्याय ज्ञेय सागर जी महाराज के सानिध्य में भगवान पार्श्वनाथ की वार्षिक रथ यात्रा का आयोजन किया गया। अलसुबह भगवान का अभिषेक, शांतिधारा व पूजन के बाद शेर मोहल्ला स्थित श्री सांवलिया पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर से चल समारोह की शुरुआत की गई। जो नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए नयापुरा पहुंचा जहां उपाध्याय ज्ञेय सागरजी महाराज के मंगल प्रवचन हुए। उसके बाद चल समारोह सूरज कुण्ड पहुंचा। जहां रथ में विराजित भगवान का अभिषेक किया गया। इस दौरान नगर में जगह-जगह बैनर पोस्टर व तोरण द्वार लगाकर रथ की अगवानी की गई। समाजजनों द्वारा अपने घर प्रतिष्ठान के आगे भगवान की आरती की।

चल समारोह में सबसे आगे बडनगर से आए बैंड में धार्मिक भजनों की धुन पर नृत्य करते युवा, बारां का महिला बैंड, नासिक के ढोल सहित बड़ी संख्या में नगर और राजस्थान के जयपुर, कोटा, झालावाड़, झालरापाटन, रटलाई, भवानीमंडी, सुनेल, कडोदिया व मध्यप्रदेश के भोपाल, इन्दौर, उज्जैन, आगर, नलखेडा, महिदपुर, सुसनेर, सोयत से पधारे समाजजन शामिल रहे। स्वागत में चल समारोह के आगे-आगे सड़कों पर नागपुर के कलाकारों द्वारा बनाई गई रंगोली, हेलिकॉप्टर द्वारा पुष्पवर्षा आदि आकर्षण का केंद्र रहे। रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ, जिसमें महेन्द्र जैन भगवा द्रोणगिरी द्वारा नाटक का मंचन किया गया।

पिड़ावा कस्बे में निकाली सावलिया पार्श्वनाथजी की रथ यात्रा में शामिल समाजजन।

सैकड़ों साल पुराना है रथयात्रा का इतिहास

नगर में यह रथयात्रा की परंपरा का इतिहास सालों पुराना बताया जाता है। नगर में भगवान सांवलिया पार्श्वनाथ का मंदिर होने के कारण रथ यात्रा निकाली जाती है सांवलिया पार्श्वनाथ का बड़ा मंदिर 1500-1600 संवत पुराना होकर अति प्राचीन है। पहले रथ बैलों से खींचा जाता था, लेकिन 2002 में मुनि ब्रह्मानंद सागर महाराज के चातुर्मास के समय मुनि श्री ने बैलों से रथ को खींचना जीवों को सताने वाला माना। तभी से उन्होंने समाज के लोगों को संकल्प दिलाया कि रथ को हाथों से खींचा जाए। तभी से समाज के लोगों ने परंपरा को कायम रखा और आज भी रथ को हाथों से श्रद्धालुओं द्वारा खींचा गया।

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