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गिर के शेर बसाने डेढ़ हजार परिवारों से उपजाऊ जमीन लेकर पथरीली दे दी, अब दूसराें के यहां मजदूरी कर रहे

एक वर्ष पहले
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24 साल से चल रही कूनाे में गिर के शेर लाने की प्रक्रिया, गुजरात के अड़ंगे के कारण अधूरी

कूनाे में गिर के शेर बसाने की प्रक्रिया 24 साल से चल रही है। लेकिन यह अब तक पूरी नहीं हो पाई है। इस दौरान कूनो में गिर के शेर बसाने के लिए सेंक्चुरी का दायरा 345 वर्ग किमी से बढ़ाकर 400 वर्ग किमी करने के लिए 20 साल पहले 24 गांवों का विस्थापन (पहले चरण में 19 और दूसरे चरण में छह गांव) किया गया।

इन गांवाें के 1547 परिवारों की खेतीहर जमीन लेकर वन विभाग ने इन्हें 9-9 बीघा जमीन के पट्टे दिए, वह पथरीली जमीन दी है। अब यह आदिवासी अाैर दलित किसान खुद की जमीन हाेने के बाद भी दूसराें की जमीन पर खेती करने काे मजबूर हैं। खुद की जमीन से बेदखल करते समय इनसे प्रशासन ने कई वादे किए थे लेकिन उन पर भी अमल नहीं हुआ।

इस बीच अभी दो गांवों के 596 परिवारों का और विस्थापन किया जाना है। पूर्व में विस्थापित हुए ग्रामीणों के हाल देखकर इन गांवों के लोग चिंतित है। इन गांवाें के लाेगाेें का कहना है कि हम गांव नहीं छाेड़ेंगे। वहीं पूर्व में विस्थापित 24 गांवाें के लाेगाें में भी अाक्राेश है।

हमने लड़ाई लड़ी तो जेल भेजा, प्रशासन सुनना ही नहीं चाहता...

पैरा गांव के रघुलाल जाटव कहते हैं कि जो जमीन दी है, वह पथरीली हैं। 1547 परिवारांे में से 1200 परिवारों के साथ यही धाेखा हुअा। विस्थापन के बाद हम यहां जीने के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं। जब हमने आंदोलन शुरू किया और भूख हड़ताल की तो हमें जेल भेज दिया गया।

24 गांव के लाेगाें काे विस्थापित करते समय बड़े-बड़े वादे

कूनो सेंक्चुरी का दायर बढ़ाने के लिए पहले चरण में 19 गांव विस्थापित किए। इनमें पालपुर, पैरा, जाकौद, नेगपुरा, टपरपुरा, खेरा, बसंतपुरा, खजूरी, पीपलबावड़ी, हेरबानी, लादर, दुर्रेडी, खजूरी खुर्द, फलाई, चक, पारौंद, बर्रेड गांव शामिल थे।

ग्रामीणों की मदद की दिशा में काम करेंगे

प्रतिभा पाल, कलेक्टर, श्योपुर

विस्थापित किए गए 1547 परिवारों में से करीब 1200 परिवारों के पास पथरीली जमीन, एक पौधा नहीं लगा पा रहे ग्रामीण

बागचा और जहानगढ़ के ग्रामीण चिंतित, 10 लाख लें या जमीन

1275 वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल में कूनो सेंक्चुरी का दायरा करीब 345 वर्ग किमी है। इसे 24 गांव विस्थापित कर बढ़ाया गया है। अब इसका दायरा 400 वर्ग किमी किया जाना है। जिसके लिए 2 गांव और विस्थापित होंगे। जिसमें करीब 596 परिवार शामिल हैं। यह गांव बागचा और जहानगढ़ हैं। जिन्हें विस्थापन के आदेश हो चुके हैं। यहां इन ग्रामीणों को विस्थापन के बदले में 10 लाख रुपए प्रति परिवार को दिए जाने के प्रावधान हैं। ऐसे में वह कहीं भी जाकर बस सकेंगे। जबकि 10 लाख नहीं लेने की स्थिति में 9 बीघा के पट्टे और वन विभाग द्वारा चिह्नित की गई भूमि पर बसना होगा।

यह बोले पीड़ित

भास्कर लाइव... जमीन के मालिक थे, सपने दिखाकर पथरीली जमीन दे दी, दूसराें के यहां मजदूरी काे मजबूर

कूनो विस्थापितों की हकीकत जानने के लिए भास्कर की टीम विजयपुर से आगे बसे विस्थापित गांव में पहुंची। दोपहर करीब 2.30 बजे अगरा गांव के नजदीक पड़ने वाले पैरा गांव में पहुंची। यहां सन्नाटा था, क्योंकि महिला-पुरुष मजदूरी के लिए जा चुके थे। गांव के पटेल पूरन आदिवासी से विस्थापन के बारे में पूछा तो वे रो पड़े। उन्होंने कहा कि हमको वन विभाग ने जो जमीनें दी हैं, वह बंजर हैं, क्योंकि इसमें चट्टानों और पत्थरों के अलावा कुछ नहीं है। जबकि हमसे उपजाऊ जमीन ली गई। अब पेट पालने के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी करनी पड़ रही है। यहां से आगे बढ़े तो शाम करीब 5 बजे दुर्रेडी गांव पहुंचे। यहां भी विस्थापितों को बसाया गया है। गांव के गजा आदिवासी से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि गांव के हालत बुरे हैं। क्योंकि यहां पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं है।

न पट्टे दिए, न उपजाऊ जमीन, रोजगार भी नहीं

जमीन ऐसी दी, जिसमें सिर्फ पत्थर ही पत्थर

खेती लायक जमीन 19 गांवों में बहुत कम लोगों को मिली, जबकि 1200 से ज्यादा ऐसे परिवार हंै, जिन्हें पथरीली जमीन दे दी गई। इस पर खेती नहीं हो रही है। इसकी लड़ाई भी लड़ी आंदोलन भी किए। लेकिन मुझे जेल भेज दिया गया। हमारी न तो सरकार ने सुनी न ही प्रशासन ने।
रघुलाल जाटव, निवासी पैरा जाटव मोहल्ला

हमसे उपजाऊ जमीन ली, लेकिन उसके बदले हमें जो जमीन दी गई, वह पूरी तरह से पथरीली है। जिसमें चट्टानें भरी पड़ी हैं। इस पर खेती कैसे करते। हमने शिकायत भी की, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। अब पूरा गांव मजदूरी कर पेट पाल रहा है।
पूरन आदिवासी, पटेल, निवासी विस्थापित पैरा गांव

2018 में नेशनल पार्क का दर्जा

02 गांव और होंगे विस्थापति

24 गांव कूनो से विस्थापित

345 वर्ग किमी रकबा कूनो का
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