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1024 अर्घ समर्पण कर की विश्व शांति की कामना

एक वर्ष पहले
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1024 अर्घ समर्पण कर विश्व शांति की कामना से हवन में आहुति डाली गईं और इस दौरान विधानाचार्य पंडित सुगनचंद आमोल ने विधान में बैठे लोगों को संकल्प दिलाया कि वह इस दौरान मिले संस्कार को जीवन में सहेजकर रखेंगे।

आठ दिन से शहर के छत्री जैन मंदिर और चंद्रप्रभ जैन मंदिर भक्त मंडल द्वारा सिद्ध चक्र महामंडल का आयोजन किया जा रहा है। इस विधान की आराधना के दौरान क्रमश: 8,16, 32, 64, 128, 256, 512 और 1024 अर्घ का समर्पण किया गया। खास बात यह रही कि आखरी दिन की पूजा सबसे लंबी हुई और 8 घंटे की आराधना में भक्तों ने 1024 अर्घ समर्पण कर सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक निरंतर यह आराधना की। आयोजन के दौरान पंडित सुगनचंद जैन आमोल ने सभी भक्तजन को यह क्रिया भक्ति भाव के साथ मंदिर परिसर में कराईं। आयोजन में इन अर्घ का अर्थ बताते हुए पंडित सुगनचंद जैन आमोल ने कहा कि संसार से विरागता को धारण कर भगवान ने मोक्ष दशा को प्राप्त कर सिद्धत्व को प्राप्त कर लिया है। अब वह संसार के आवागमन से मुक्त हो गए हैं और हम भी यदि सिद्घ बनना चाहते हैं तो हमें उनके गुणों का अनुसरण कर तदनुरुप आचरण करना पड़ेगा, तो हमारा जीवन भी सुखमय बन जाएगा और हम भी संसार के आवागमन से मुक्त हो सकते हैं, लेकिन हम लौकिक सुख की चाह में सिद्धत्व दशा को प्राप्त नहीं कर सकते और संसार मार्ग में उलझे रहते हैं।

हवन कुंड में हर आहुति समर्पित कर मांगी विश्व में शांति

मंदिर परिसर में हवन कुंड बनाए गए थे इन कुंडों में आहुति समर्पित कर भगवान सिद्ध प्रभु की आराधना की गई और इसके बाद भगवान से मोक्ष की कामना के साथ प्रत्येक आहुति पर घी कपूर और धूप के साथ भगवान की पूजा आराधना की गई।
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