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रसोई गांव में आठ साल से झोपड़ी में लग रहीं कक्षाएं, हरियार में खुले में पढ़ रहे बच्चे

Shivpuri News - 2500 आबादी वाले रसोई गांव के आदिवासी मजरा हरियार में न प्राथमिक शिक्षा न आंगनबाड़ी, पानी से भी महरूम ग्रामीण राहुल...

Jan 16, 2020, 08:25 AM IST
Kolaras News - mp news classes in hut for eight years in kitchen village children studying in open in hariyar
2500 आबादी वाले रसोई गांव के आदिवासी मजरा हरियार में न प्राथमिक शिक्षा न आंगनबाड़ी, पानी से भी महरूम ग्रामीण

राहुल दुबे-जीतेंद्र गोस्वामी |बदरवास

जनपद मुख्यालय से 30 किमी. दूर स्थित ग्राम दोहा पंचायत के गांव रसोई गांव में स्कूल भवन के अभाव में आठ साल झोपड़ी में सरकारी स्कूल की कक्षाएं चल रही हैं। वहीं इसी पंचायत के ग्राम हरियार में स्कूल भवन जर्जर होकर जमींदोज हो जाने के कारण खुले आसमान के नीचे बच्चों की प्राथमिक कक्षाएं संचालित हो रही है। गौरतलब यह है 2500 की आबादी वाले रसोई व हरियार आदिवासी मजरा में न तो सड़क, पानी, आंगवाड़ी, सहित अन्य सुविधाओं से लोग वंचित बने हुए हैं। हालात ये है कि गांव में कच्ची सड़कों की हालत खस्ता है। सड़कें गड्ढों में तब्दील हो गई हैं जहां लोगों का पैदल चलना दूभर हो रहा है। गांव वालों का कहना है कि पंचायत प्रतिनिधियों तथा प्रशासन ने आज तक उनके गांव की सुध नहीं ली है। वहीं झोपड़ी में संचालित स्कूल में भी शिक्षक नहीं होने से अतिथि शिक्षक के भरोसे 23 से अधिक बच्चों का भविष्य टिका हुआ है। इसी प्रकार हरियार में खुलेआम मान के नीचे बच्चे अपने भविष्य गढ़ने के लिए लगे हुए हैं।

अनदेखी
बदरवास के ग्राम रसाेई में झोपड़ी में अतिथि शिक्षक के इंतजार में खड़े बच्चे।

जर्जर होकर भवन हुआ जमींदोज, खुले में पढ़ते हैं बच्चे

दोहा ग्राम पंचायत के रसोई में विद्यालय नहीं होने से झोपड़ी में सरकारी स्कूल चल रहा है। वहीं हरियार में स्कूल भवन जर्जर होकर भर-भर एक साल पहले जमींदोज हो गया है। इसके चलते अब गांव में एक शिक्षक के भरोसा खुले आसमान की नीचे बच्चे पढ़ाई करने को मजबूर बने हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल नहीं होने से बच्चे स्कूल पढ़ने के लिए नहीं जाते हैं। यदि कभी जाते भी है तो महज दो-चार बच्चे ही स्कूल पहुंचते हैं। इससे गांव का भविष्य अंधार में बना हुआ है।

स्कूल न होने से बच्चों का भविष्य अंधकार में

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ढाई हजार बस्ती वाले गांव में आज तक प्राइमरी स्कूल की स्थापना नहीं हो सकी है। गांव में स्कूल न होने से छोटे बच्चे प्रारंभिक शिक्षा से महरूम हैं और वह गाय-भैंस चराते हैं। गांव के कुछ सक्षम परिवार के बच्चों को पढ़ाई के लिए रोज बदरवास तक की भागदौड़ करनी पड़ती है जिसमें पूरा दिन हो जाता है। पहाड़ी वाले जंगली रास्ते से आवाजाही होने से अभिभावकों को बच्चों का भय सताता रहता है।

हमारी कोई नहीं सुनता


झोपड़ी में स्कूल होने कम बच्चे जाते हैं पढ़ने

गांव में आज तक प्राथमिक विद्यालय की स्थापना तक नहीं हो सकी है। छोटे बच्चे स्कूल जाने की बजाय गाय-भैंसे चराते हैं। वहीं बड़े बच्चों को पढ़ाई के लिए बदरवास तक की भागदौड़ करनी पड़ती है। सुविधाएं उपलब्ध कराने के नाम पर गांव वालों को जनप्रतिनिधियों तथा प्रशासनिक अधिकारियों का अब तक आश्वासन ही मिल सका है। आदिवासी मजरा के ग्रामीण जहारसिंह, साधनसिंह, हरनाम सिंह तथा संग्राम सिंह आदि ने बताया कि रसोई गांव की हरियार आदिवासी मजरा की आबादी 2500 हजार है। बस्ती में निवासरत आदिवासी तथा गुर्जर समाज के लोग वर्षों से सड़क, पानी तथा स्कूल आदि की समस्याओं से जूझते चले आ रहे हैं। जब भी चुनाव होता है तो जनप्रतिनिधि गांव आते हैं और आश्वासन देते हैं लेकिन आज तक गांव वालों की किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सका है।

सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी


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