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सिद्धचक्र महामंडल विधान से भक्त भी बन सकते हैं भगवान:मुनि श्री

एक वर्ष पहले
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नगर में अति प्राचीन श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र पर बड़े ही भक्ति भाव से श्री 1008 सिद्ध चक्र महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। इसमें जैन समाज द्वारा आचार्य विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनि श्री सुव्रत सागर के पावन सानिध्य में भक्ति भाव से श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान के अंतर्गत 512 अर्घ पंच परमेष्ठी भगवान संबंधी समर्पित किए गए। यह अर्घ यह बताता है कि भगवान की भक्ति करता हुआ सम्यक साधना करता है तो भक्त भी भगवान बन सकता है। विधान कर एक भक्त भगवान बन सकता है लेकिन जिस रास्ते से सिर्फ भगवान बनते हैं उसी रास्ते पर हमें भी चलना होगा अर्थात व्रत, संयम, नियम लेकर के पापों से बचना होगा। इस अवसर पर मुनि श्री सुव्रत सागर महाराज ने उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज का इंसान संकट में फंस कर सारे काम तो कर लेता है। लेकिन भगवान को याद नहीं करता अगर वह संकट में फंस कर सारे काम ना करें लेकिन भगवान को याद करें तो उसके ऊपर संकट क्यों आएंगे। जब हम भगवान को अपने संकट के बारे में बताते हैं तो संकट को भी हम अपने भगवान के बारे में बता सकते।

संकटों को नहीं बताया कि भगवान कितना बड़ा है: हमने भगवान को यह तो बता दिया कि हमारा संकट इतना बड़ा लेकिन आज तक संकटों को ही नहीं बताया कि हमारा भगवान इतना बड़ा है। अगर हम संकट को भगवान के दर्शन करा देंगे तो संकट कभी नहीं आएंगे, क्योंकि हम स्वार्थी के कारण भगवान के अस्तित्व के बारे में परिचित नहीं हो पाते अगर हम नि:स्वार्थ भाव से भगवान का वैभव जान लें तो हमें अपने वैभव की याद आ जाएगी। अर्थात भगवान की बताए रास्ते पर चलते-चलते हम स्वयं भगवान बन जाएंगे और जितने लोग भगवान बने हैं। बेशक भगवान के बताए हुए रास्ते पर ही चले होंगे

प्रवचन देते मुनिश्री।
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