आपस में झगड़ा व कलह पशुता की निशानी: शास्त्री

Shivpuri News - गुरुपूर्णिमा महोत्सव समिति के तत्वाधान में राष्ट्रीय कथा प्रवक्ता आचार्य गिरिजेश शास्त्री के दिशा-निर्देशन में...

Bhaskar News Network

Jul 14, 2019, 07:15 AM IST
Dinara News - mp news shastri a sign of conflict and strife between animals
गुरुपूर्णिमा महोत्सव समिति के तत्वाधान में राष्ट्रीय कथा प्रवक्ता आचार्य गिरिजेश शास्त्री के दिशा-निर्देशन में कस्बे के शीतला माता के प्रांगण में चल रही भागवत कथा के पंचम दिवस शास्त्री ने कृष्ण की बाल लीलाओं का रोचक वर्णन किया। साथ ही भक्तों में परमात्मा के प्रति प्रेम और विश्वास भाव जगाया। केवल भगवान के साथ बनाया रिश्ता अमर है, इसके अलावा सारे रिश्ते नाते, संपत्ति, भोग, विलास की सामग्री सब खिलौने के समान है। जब जीव सच्ची श्रद्धा और बिना दिखावा के साथ भक्ति करता है, तो प्रभु उसके जीवन के साथ मृत्यु को भी सवार देते हैं।

उन्होंने कहा कि भगवान भाव के भूंखे हैं, उन्हें धन, दौलत, पावर से नहीं बुलाया जा सकता पर भाव से पुकारने पर प्रभू दौड़े चले आते हैं। शास्त्री ने आगे कहा कि पशुओं की तरह एक दूसरे से झगड़ा, कलह करने में लगे है। अरे विचार करो रेत को कोल्हू में पेरो तो शायद तेल निकल आए, यदि पानी को मथानी में मथो तो शायद भी घी निकल आए, लेकिन शास्त्र एवं सत्पुरुष कहते हैं कि बिना भजन भगवान के भवसागर से पार नहीं जाया जा सकता। तो ये मानव देह जो हमें मिली है, समय रहते हम चिंता संसार की छोड़ दें और भगवत चिंतन में लग जाएं सत्संग का उद्देश्य यही है। मानव देह की सफलता यही है। नहीं तो पशु भी कोसते है।

दिनारा में आयोजित भागवत कथा में मौजूद भक्तगण।

किसी भी वस्तु का अभिमान न करें

ईश्वर को अभिमान नहीं भाता जब गोपियों को अभिमान हो गया तो कृष्ण उन्हें छोड़कर चले गए थे। ठीक उसी प्रकार जब हमें किसी वस्तु का अभिमान हो जाता है तो प्रभू उसे छीन लेते है। आगे पूज्य शास्त्री ने कहा यदि शास्त्रोचित कर्म किया जाए तो पुण्य का फल है स्वर्ग, किंतु जो पुण्य बल से देवता हो गए बो चिंतित है की किया हुआ पुण्य ही स्वर्ग सुख के रूप में हम भोग रहे हैं। जिस दिन यह सुकृत की पूंजी समाप्त हो जाएगी तो हमें स्वर्ग से हटा दिया जाएगा। हे भगवान कहीं हमें मनुष्य शरीर दे दो तो हम शास्त्रों के बताएं विधान का पालन करेंगे और आपका भजन, सत्संग कर के पुण्य रूपी धन को जुटाने में लग जाएंगे क्योंकि बिना मानव शरीर के पुण्य नहीं हो सकता अब हमें विचार करना चाहिए कि हम मनुष्य हैं और यह जीवन केवल भोग भोजन की चिंता में बिता रहे हैं।

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