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बाबा गरीबनाथ धाम अवंतिपुर बड़ोदिया में आज से शुरू होगा 15 दिवसीय मेला

भास्कर संवाददाता | शुजालपुर बाबा गरीबनाथ धाम अवंतिपुर बड़ोदिया में आज मंगलवार रंगपंचमी से 15 दिवसीय मेला शुरू...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 06, 2018, 05:35 AM IST

भास्कर संवाददाता | शुजालपुर

बाबा गरीबनाथ धाम अवंतिपुर बड़ोदिया में आज मंगलवार रंगपंचमी से 15 दिवसीय मेला शुरू होगा और इसमें करीब 1 लाख श्रद्धालु शामिल होंगे। पंचमी पर यहां स्थित समाधि स्थल पर लगा ध्वज स्तंभ साल में एक बार उतारा जाता है और देशभर से आए श्रद्धालु 13 टन वजनी ध्वज के नीचे 20 फीट गहरे गड्ढे में मन्नत के नारियल, अगरबत्ती व पान के पत्ते डालते है जो एक साल बाद भी हूबहू निकलते हैं।

मप्र तीर्थ व मेला विकास प्राधिकरण के अंतर्गत यह मेला देश के प्रमुख मेलों में शुमार है, जो आज से शुरू होकर 22 मार्च तक चलेगा। यहां हर साल रंगपंचमी पर शाम होते-होते इतनी भीड़ जमा हो जाती हैं कि नजारा किसी महाकुंभ से कम नहीं होता। गली-मोहल्लों में जाम की स्थिति और धाम के चारों और स्थित मकानों के छप्परों पर पैर रखने की जगह नहीं होती। इस चमत्कारी समाधि स्थल पर वर्षों से रंगपंचमी की सुबह खड़े 13 टन वजनी इस स्तंभ को उतारा जाता है व दिनभर साफ-सफाई, मरम्मत व नए शृंगार के बाद विधि-विधान से पूजन कर सूर्यास्त के पूर्व इस स्तंभ का पुन: खड़ा कर दिया जाता है और स्तंभरूपी ध्वज को उतारने व चढ़ाने के बीच में जो चमत्कार होता है, लोग सिर्फ उसी को निहारने आते है, खास वक्त होता है स्तंभ ध्वज चढ़ाने के पूर्व का, इस समय लोग स्तंभ गाढ़ने हेतु खोदे गए लगभग 16 फीट गहरे आठ फीट चौड़े व 20 फीट लंबे गड्ढों में नारियल, पान, सिक्के, खड़ा नमक और अगरबत्ती चढ़ाकर मन्नत मानते हैं। किवदंती है यहां मांगी हर मुराद पूरी होती है, देखते ही देखते यह गड्ढा 20 हजार नारियलों से लबालब हो जाता है। ध्वज उतारने के बाद जब खुदाई की जाती है, तो पिछली रंगपंचमी पर डाले गए हजारों नारियल, पान और खड़ा नमक इन गड्ढों में वैसे के वैसे ही निकलता है सुरक्षित।

एक साल तक जमीन में गड़े रहने के बाद ये चीजें पुन: हूबहू कैसे निकलती होगी, इसी आश्चर्य को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं। खुदाई में निकलने वाले नारियलों को लोग इतना महत्वपूर्ण प्रसाद मानते है कि इसे पाने के लिए यहां भारी छीनाझपटी होती है। ठीक इसी तरह ध्वज स्तंभ की कलंगी पर लगा आलतुंबी (सूखी गोल लौकी) की पपड़ी को भी भक्त बरकती मानते हुए इसे पाने के लिए भारी मशक्कत करते हैं। सागौन के नौ पाटों से बने इस स्तंभ की लंबाई 85 फीट है। जिसे सिर्फ 5 फीट जमीन में गाड़ा जाता है और कच्ची जमीन में नारियलों के ऊपर सिर्फ इतना कम गड़ा होने के बाद यह 13 टन का भारी स्तंभ वर्षभर स्थिरता से खड़ा रहता है।

ऐसा रहता है नजारा (फाइल फोटो)

आखिर क्यों पूजे जाते हैंै बाबा गरीबनाथ

प्राचीन दुर्लभ लेखों के अनुसार बाबा गरीबनाथ गुसाईं (गोस्वामी) संप्रदाय से थे। सं.1246 में झांसी के जूना मठ पर अपने गुरु हरीगिरदासजी महाराज के समाधि लेने के बाद वे तीर्थाटन के लिए निकले और घूमते हुए अवंतिपुर बड़ोदिया पहुंचे। यहां दुधीनेवज किनारे सुरम्य तट देख मांं लालबाई-फूलबाई (अन्नपूर्णा) की भक्ति करते हुए कुटिया बनाकर रहने लगे। अवंतिपुर बड़ोदिया में 100 वर्ष रहने के बाद अपने तप व दैविक शक्तियों के बल पर दिन-दुखियों की सेवा करते हुए उन्होंने विक्रम संवत् 1345 ई. में जीवित समाधि लेकर 1 माह बाद गांव के तीर्थ यात्रियों को उप्र के सौरंमजी गंगाघाट पर साक्षात दर्शन दिए थे। उन्होंने बाबा को गांव चलने को कहा। वे नहीं माने, तो जबरन डोली में बैठाकर ग्रामीण इन्हें लाने लगे पर लश्कर (ग्वालियर) के समीप ही बाबा डोली से अंतरध्यान हो गए और एक पाती छोड़ी, जिसमें उन्होंने हर वक्त गांव की रक्षा करने का वचन देते हुए इसी दिन गांव के हर कुएं में भारी ओलावृष्टि होने की भविष्यवाणी की, जो सही साबित हुई। पाती में इन्होंने यह भी लिखा था कि नौ-नौ हाथ के नौ सागौन के पाट से एक स्तंभ तैयार कर मेरे समाधि स्थल पर रंगपंचमी पर खड़ा करें। मैं भंवरे के रूप में हर साल वहां आऊंगा। बस तभी से यहां से परंपरा चल पड़ी। आयोजन प्रबंध समिति के महेंद्र सोनी ने बताया कि यह स्थान विज्ञान को भी चुनौती देता है और वास्तव में आज भी जब गांव में बेमौसम बरसात की संभावना या ओलावृष्टि की आशंका होती है, तो लोग शंखनाद कर बाबा का ध्यान करते है। जिससे संकट टल जाता है। यहां आज तक ओलावृष्टि नहीं हुई।

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