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केमिकल ट्रीटमेंट खराब होने से बिगड़ा राणोगंज की ऐतिहासिक छत्री का सौंदर्य

भास्कर संवाददाता | शुजालपुर केमिकल ट्रीटमेंट खराब होने व नियमित संधारण न होने से राणोगंज की ऐतिहासिक छत्री का...

Danik Bhaskar

Feb 28, 2018, 06:35 AM IST
भास्कर संवाददाता | शुजालपुर

केमिकल ट्रीटमेंट खराब होने व नियमित संधारण न होने से राणोगंज की ऐतिहासिक छत्री का सौंदर्य बिगड़ा हुआ है। पुरातत्व विभाग ने बीते पांच साल से यहां कोई कार्य नहीं किया है। पुरातत्व विभाग के अधीन होने से यहां ग्रामीण व नगरीय निकाय विभाग संधारण काम करने से कतरा रहे हैं। सौंदर्य व आकर्षण कम होने से यहां आने वाले सैलानियों की संख्या में भी कमी आई है।

पांच साल पहले मार्च 2013 में धार के बाग टांडा, रतलाम के विरूपाक्ष महादेव मंदिर, भानपुरा के यशवंतराव की छत्री, हिंगलाजगढ़ (भानपुरा) तथा इंदौर की लालबाग छत्री के साथ ही शुजालपुर की इस छत्री का जीर्णोद्धार किया गया था। पुरातत्व विभाग के तत्कालीन उपसंचालक जयकुमार सोलंकी सहित 8 लोगों की टीम की देखरेख में तब इस छत्री पर केमिकल ट्रीटमेंट कर इसे चमकाकर धुलाई-घिसाई का काम कराया गया था। धुलाई व घिसाई के बाद पिलरों व छत्री की नक्काशी उभरकर सामने आने से इसका नजारा सैलानियों को आकर्षित कर रहा था। बारिश के पानी से केमिकल धुलने से पुरातत्व विभाग इंदौर द्वारा कराया गया काम अब आकर्षणविहीन हो गया है। आकर्षण विहीन होने से यहां आसपास के लोग व दूरदराज से आने वाले सैलानियों की संख्या में कमी आई है। इस बारे में पुरातत्व विभाग इंदौर के उपसंचालक केएल डाबी ने चर्चा में कहा कि स्थल निरीक्षण कर जल्द ही नियमानुसार आवश्यक संधारण कार्य कराया जाएगा।

छत्री से शुजालपुर का इतिहास

शुजालपुर-अकोदिया मार्ग पर स्थित राणोगंज की छत्री शुजालपुर के अतीत को दर्शाती है। इतिहास को संजोकर रखने वाले शांतिलाल अग्रवाल बताते हैं कि आजादी के पूर्व शुजालपुर शहर में कभी पिंडारियों का राज हुआ करता था। सिंधिया वंश संस्थापक राणोजी शिंदे का पिंडारियों से लड़ते हुए 3 जुलाई 1745 को मात्र नगर से 6 किमी की दूरी पर पश्चिम दिशा में निधन हो गया था। तब यह नगर बाजीराव पेशवा की जागीर था। उन्होंने पिंडारियों के आतंक से नगर को मुक्त कराने हेतु अपने सेना के एक साधारण सैनिक राणोजी की नियुक्ति की थी। राणोजी महाराष्ट्र प्रांत के सतारा जिले के ग्राम फन्हेर के रहने वाले थे। युद्ध कौशल व साहस में उनका कोई सानी नहीं था। अपनी सूझबूझ से राणोजी ने आततायियों को परास्त किया, लेकिन भागते-भागते भी अपनी विशिष्ट शैली में, आवाजें लगाते हुए उन्होंने राणोजी को घेर कर चिरनिंद्रा में सुला दिया। मगर इससे पहले ही बाजीराव पेशवा ने राणोजी की पिंडारियों को परास्त करने के कौशल के समाचार सुन उन्हें ग्वालियर राज्य इनाम में दे दिया। 1745 में दिवंगत हुए राणोजी के 63 वर्ष बाद जनता को आतंक से बचाने हेतु पिंडारी नेता करीम खां को 1808 में यह नगर जागीर में दे दिया। जिसे 1862 में सिंधिया ने वापस प्राप्त किया। इसी काल में यहां छत्री बनाकर शिंदे की स्मृति में शिव मंदिर स्थापित किया गया। आज यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। यहां शिवरात्रि के दिन एक दिवसीय मेला आयोजित किया जाता है।

देखरेख के अभाव में ऐतिहासित राणोजी की छत्री का आकर्षण कम हो गया है।

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