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4 साल बाद फिर शुरू हुआ मवेशी मेला, न मवेशी आए और न दुकानें लगीं

भास्कर संवाददाता | आगर-मालवा 4 साल पहले बंद हुआ बैजनाथ महादेव मवेशी मेला कलेक्टर अजय गुप्ता की पहल पर इस बार शुरू...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 01, 2018, 05:40 AM IST

4 साल बाद फिर शुरू हुआ मवेशी मेला, न मवेशी आए और न दुकानें लगीं
भास्कर संवाददाता | आगर-मालवा

4 साल पहले बंद हुआ बैजनाथ महादेव मवेशी मेला कलेक्टर अजय गुप्ता की पहल पर इस बार शुरू हो चुका है, लेकिन मेले में न तो बिकने के लिए मवेशी आए न बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले-चकरी व खिलौनों की दुकान लगी। जिस मेले में 2 करोड़ रुपए से अधिक के मवेशी (जानवर) खरीदे-बेचे जाते थे और हजारों लोगों की भीड़ जमा रहती थी वहां इस बार सन्नाटा पसरा है। करीब 200 दुकानों के बजाए इस बार सिर्फ 6 दुकानें ही लगी हैं। इन व्यापारियों का भाड़ा तक नहीं निकल पा रहा है।

2012 के पहले बैजनाथ महादेव में कार्तिक व चैत्र मास में 2 बार मेले का आयोजन होता था। दोनों बार समापन पूर्णिमा पर ही होता था। मेले की शुरुआत सन् 1984 की अक्षय तृतीया से हुई थी, लेकिन गत 77 सालों से यह मेला अनवरत चल रहा था। 2013 में आचार संहिता के चलते मेला नहीं लगाया गया था। इसके बाद सूत्र बताते है कि मेला इसलिए नहीं लगाया गया क्योंकि आमदनी से ज्यादा खर्च होता था।

दोनों मेलों को लेकर आगर नगर ही नहीं आसपास के ग्रामवासियों में भी खासा उत्साह रहता था। सर्कस, मौत का कुआं, झूले-चकरी के अलावा खिलौने, खाने-पीने का सामान, होटल मनिहारी सामान, टूरिंग टॉकीज, घरेलू उपयोग के सामान, बर्तन, किराना, जूते-चप्पल, फोटो स्टूडियो, फल-सब्जी के अलावा बास-बल्ली, कवेलू घर बनाने का सामान तथा खेती के उपकरण बेचने की करीब 200 दुकानें लगती थी। ये सभी दुकानदार 1 करोड़ से अधिक का कारोबार करते थे।

15 दिनी इस मेले में सैकड़ों ग्रामीण मेला शुरू होने से ही रहते थे, लेकिन पूर्णिमा के दिन विशेष भीड़ होती थी। दिन में दूर-दूर से ग्रामीण महिला-पुरुष व बच्चे आते थे, तो शाम से देररात तक शहरवासी अपने परिवार के साथ मेले का आनंद लेते थे।

इस बार मेले में मवेशी न आने व पिछले 4 सालों से मेला न लगने के कारण कई व्यवसायी दुकान लेकर ही नहीं आए। शनिवार को पूर्णिमा के दिन मेले में तीन खिलौने, 2 गन्ना रस व 1 आइस्क्रीम का पंडाल लगा था। खिलौने की दुकान लगाने वाले आगर के मिश्रीलाल ने बताया वह 40 हजार रुपए का माल लेकर आए है। 15 हजार थोक व्यापारी को उधारी देना है। अभी तक बिक्री नहीं हुई। दुकान का किराया व भाड़ा जैब से देना पड़ेगा। यही हाल अन्य दुकानदारों का है। कई दुकानदार तो मेला सुना देखकर वापस चले गए। जबकि सारंगपुर से आए एक व्यापारी ने तो अपना सामान ही नहीं जमाया।

जहां लगती थी कभी 200 दुकानें वहां यह है हालात।

1 रुपए साई में होते थे हजारों के सौदे

मेले में जो पशु बिकने आता था उसे देखकर किसान व व्यापारी उसके मालिक से मोल भाव करते थे। सौदा जब तय हो जाता था, तो बयाने के रूप में 1 रुपए दिया जाता था। यह एक रुपया साई कहलाता था। हजारों-लाखों रुपए के सौदे 1 रुपए की साई में हो जाते थे। यदि बेचने वाला या खरीदने वाला लेने-देने से इंकार करता, तो उनका फैसला पंच करते थे। पूर्णिमा के अगले दिन चावड़ी (पशु शुल्क) जमा करने के बाद मवेशी मेले से ले जाए जाते थे। बिके हुए पशु की ही चावड़ी कटती थी। यह चावड़ी 1 रुपए सैकड़ा अर्थात 100 रुपए पर 1 रुपए के मान से होती थी। जनपद को पशु चुकारा शुल्क व दुकान किराए के रूप में करीब ढाई से तीन लाख की आय होती थी। वर्ष 2010-11 मे मेला पूरे शबाब पर था। बताते है इन वर्षों में 8 से 10 हजार पशुओं तक की खरीदी बिक्री हो चुकी है।

सड़क के दोनों ओर बंधे रहते थे हजारों मवेशी, इस बार है सन्नाटा।

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