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आंतरिक कोढ़ यानी झूठ और क्लेश, उज्जैन की धरती इससे मुक्त करती है-मणिप्रभजी

3 वर्ष पहले
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गच्छाधिपति आचार्य मणिप्रभ सुरिश्वरजी ने गुरुवार को खाराकुआं छगनीराम पेढ़ी में प्रचवन के दौरान कहा- उज्जैन ही वह पावन धरा है जहां हजारों साल पहले मैना सुंदरी ने अपने पति श्रीपाल राजा को नवपद आराधना कर न केवल शारीरिक कोढ़ से मुक्त कराया था बल्कि आंतरिक कोढ़ भी समाप्त कर मोक्ष मार्ग पर प्रशस्त हुए थे।

महाराजश्री ने कहा शरीर का कोढ़ तो एक जन्म में समाप्त हो सकता है लेकिन यदि अंतरात्मा का कोढ़ यानी झूठ और क्लेश समाप्त नहीं हुआ तो वह जीवन दर जीवन चलता है और नर्क तक ले जाता है। हमें सम्यक भाव से दूर कर देता है। इस धरा के पुण्य प्रताप का लाभ भी यदि नहीं लिया तो यहां रहना व्यर्थ है।आचार्य ने कहा अभी हमने वीतराग परमात्मा का परिचय नहीं जाना है। परमात्मा के प्रति आपकी भक्ति है पर ध्यान रहे बिना प्रेम के भक्ति नहीं हो सकती और बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता। परमात्मा के गुणों को जानकर ही उनका परिचय हो सकता है और परिचय होने पर ही उनका अनुसरण कर सकते हैं। पूज्य गुरुदेव ने भक्ति के दो भेद बताते हुए कहा प्रमोद रूपी भक्ति और प्रयोग रूपी की भक्ति। इन्हें जानना जरूरी है।

शब्दों से दी श्रद्धांजलि
मणिप्रभ सुरीश्वरजी ने अपने गुरुदेव आचार्य श्री जिन कांतिसागर सुरीश्वरजी की 33 वीं पुण्यतिथि पर शब्दों से श्रद्धासुमन समर्पित करते हुए कहा- गुरुदेव ने हमेशा सभी गच्छ पंथों का सम्मान किया। उनकी इच्छा के अनुरूप उनकी समाधि स्थल मांडवला में जहाज मंदिर का निर्माण किया, जिसमें सर्व गच्छ के समस्त आचार्य की प्रतिमा विराजमान है। प्रवचन के प्रारंभ में मनोहर इंदु मंडल व नवर| महिला मंडल एवं प्रमिला चोपड़ा ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। पुखराज चोपड़ा ने गुरुदेव के जीवन का परिचय दिया।

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