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34 साल पहले महाकाल-सिंहपुरी गेर एक थी, विवाद के बाद दो हो गई

एक वर्ष पहले
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34 साल पहले महाकाल की गेर अलग नहीं थी। महाकालेश्वर मंदिर के पंडे-पुजारी सिंहपुरी की गेर में ही शामिल होते थे। विवाद हो जाने पर 1986 में महाकाल मंदिर से नई गेर की शुरुआत हुई। दूसरे साल से इसमें झांकी भी शामिल की गई। पहली झांकी वैष्णोदेवी की बनाई गई थी।

मंदिर के पुजारी पं. महेश गुरु (ध्वज चल समारोह समिति के पूर्व अध्यक्ष भी) बताते हैं कि पहले महाकाल मंदिर के पंडे-पुजारी भी सिंहपुरी की गेर में ही निकलते थे। क्योंकि सभी पुजारी सिंहपुरी में ही रहते थे। गेर में अखाड़ा प्रदर्शन के दौरान विवाद हो जाने पर करीब 34 साल पहले महाकाल की अलग गेर शुरू की गई। यह गेर महाकाल में स्थित वीरभद्र अखाड़े के हीरालाल शर्मा के नाम से महाकाल थाने में दर्ज है। यह गैर अब काफी बड़ा रूप ले चुकी है। महाकाल मंदिर से गेर के लिए ध्वज सिंहपुरी ले जाने की परंपरा आज भी है।

शहर में निकलने वाले ध्वज चल समारोहों (गेर) का लिखित इतिहास नहीं है, इसे पारंपरिक उत्सव माना जाता है। विक्रमादित्य शोध पीठ के पूर्व निदेशक डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित कहते हैं कि हमें अब तक इसका कोई इतिहास नहीं मिला है। यह पारंपरिक रूप से मनाया जाने वाला उत्सव है। इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका लिखित रिकाॅर्ड नहीं है। इसे मराठा कालीन माना जा सकता है। इससे जुड़ी कहानियों में सिंधिया वंशजों की जानकारी आयोजन से जुड़े लोग देते हैं। सिंधिया वंश के धर्माधिकारी पं. नारायण उपाध्याय का कहना है कि सामान्य गेर की परंपरा प्राचीन है। लेकिन ध्वज के साथ उत्सव मनाने की परंपरा मराठा काल से शुरू होना बताते हैं। बायजाबाई, जीवाजीराव के समय गुर्जर गौड़ ब्राह्मणों को वीरता प्रदर्शन की प्रतियोगिता जीतने पर सम्मान के साथ ध्वज दिया था। तभी से यह उत्सव मनाया जाने लगा। शासन की ओर से समाज को ध्वज देने की परंपरा जारी रही। स्वतंत्रता के बाद शासन की ओर से ध्वज देने की परंपरा अभी भी है, जिसे महाकाल मंदिर समिति निर्वाह कर रही है। मंदिर से ध्वज दिया जाता है।

यह फोटो 34 साल पहले गोपाल मंदिर का है। सिंहपुरी की गेर से अलग होकर महाकाल से नई गेर निकालने की शुरुआत हुई थी।

महाकाल की गेर में 1987 में पहली झांकी वैष्णोमाता की निकाली गई थी। यह झांकी विजय पुजारी ने बनाई थी। (दोनों चित्र पं. महेश पुजारी ने उपलब्ध कराए)

संस्कृति बचाने के लिए होली से शुरू किया उत्सव
भागसीपुरा की गेर से जुड़े पुनीत मेहता बताते हैं कि ध्वज चल समारोह की परंपरा सम्राट विक्रमादित्य ने नव संवत् के अवसर पर शुरू की होगी। मान्यता है कि नए साल का उत्सव ध्वज के साथ मनाया जाता था। कालांतर में मुगल व अंग्रेजों के शासन में संस्कृति को बचाने के लिए इस उत्सव को होली से शुरू किया गया। होली और नव-संवत के बीच 15 दिन का अंतर होता है। इससे इस उत्सव का विस्तार हुआ ताकि ज्यादा लोगों को उत्सव से जोड़ा जा सके। कभी शहर में एक ही ध्वज चल समारोह होता था। लेकिन बाद में लोग अलग होते गए और अनेक चल समारोह निकलने लगे। इसलिए भागसीपुरा की गेर का नाम अभी भी विक्रम ध्वज चल समारोह ही चल रहा है।

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