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अंजन, चारोली सहित 72 प्रजाति के 9 लाख पौधे तैयार, दो महीने में रोपकर बिछाएंगे हरियाली

2 वर्ष पहले
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बारिश का ग्रीन इफैक्ट...संभाग की सबसे बड़ी नर्सरी ने की पौधारोपण की तैयारी

राजेश पांचाल | उज्जैन

बािरश के बाद घर-आंगन में हरियाली हो। बगीचों में पौधारोपण किया जा सके। इसके लिए संभाग की सबसे बड़ी वन विभाग की नर्सरी में 72 प्रजातियों के 9 लाख पौधे तैयार हैं। नर्सरी के प्रभारी को गत वर्ष भोपाल में प्रदेश में उत्कृष्ट प्रभारी का दूसरा पुरस्कार मिला था। पिछले साल नर्सरी सेे 6.5 लाख पौधे अलग-अलग स्थानों पर भेजे थे। किसान समृद्धि योजना के तहत 2.5 लाख पौधे किसानों को दो साल तक सहेजने के लिए दिए थे। इन पौधों की मानिटरिंग विभाग कर रहा है। यह संभाग की पहली पूरी तरह से जैविक नर्सरी है। पौधों में डालनेे के लिए जैविक खाद परिसर में ही तैयार की जाती है।

वन विभाग के अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त की अगुवाई में देवास रोड स्थित शिप्रा विहार में छायादार, फल-फूल के साथ 20 विलुप्त प्रजातियों के पौधे भी मिलेंगे। वन रोपणी प्रभारी और वन विस्तार सहायक केके पंवार बताते हैं कि अभी से पौधों की मांग आने लगी है। वन मंडल उज्जैन से चार लाख, शाजापुर से 38 हजार, मंदसौर से 50 हजार पौधों की मांग आई है। इसे देखते हुए 3.5 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधे तैयार करने के साथ तैयार पौधों की देखरेख भी की जा रही है। 6 सेक्टर में बंटी नर्सरी में अलग-अलग पौधे तैयार हैं। वर्मी कंपोस्ट, कोकोपीट, ग्रीन हाउस, पॉली हाउस, मिक्स चैंबर भी हैं।

पहले दिन से लेकर एक महीने तक...एक बीज ऐसे बनता है पौधा, अब हमारी जिम्मेदारी कि इसे पेड़ बनाएं

पहला दिन : मिट्‌टी के साथ रेत व खाद

एक तगारी मिट्‌टी, एक तगारी वर्मी कंपोस्ट, एक तगारी बालू रेत, दस ग्राम डीएपी लेकर अच्छी तरह मिलाया जाता है। मिश्रण तैयार होने के बाद उसे पॉलीथिन में भर देते हैं। नमी बनी रहे इसके लिए दिन में एक बार थोड़ा पानी डाला जाता है।

दूसरा दिन : बीज से

दोगुनी गहराई में रोपण

एक मीटर बाय 10 मीटर के बेड में कतार में मिट्‌टी भरी हुई पॉलीथिन में बीज डालने का काम होता है। जितना बड़ा बीज होता है। उसके आकार सेे दोगुनी गहराई में उसे रोपा जाता है। मिट्‌टी सख्त होने पर उपरी परत को डंडे सेे हटाया जाता है।

चौथा दिन : बीज में अंकुरण शुरू होगा

चार दिन तक हर रोज दो बार थोड़ा-थोड़ा पानी देने से मिट्‌टी की नमी बनी रहती है। इसके बाद उसका अंकुरण होने लगता है। नर्सरी प्रभारी के अनुसार बीज के अंकुरण के लिए 33 से 34 डिग्री तापमान सबसे अच्छा माना जाता है।

सातवां दिन : बीज अब पौधा बन गया

अंकुरण के बाद बीज पर सीधे पानी न डालें। ध्यान रखें कि मिट्‌टी में नमी न कम हो न ज्यादा। ऐसे में पौधा जल्दी बड़ा होगा। उसमें अलग से खाद डालने की जरूरत नहीं होती है, मिट्‌टी में डाला गया खाद पौधे के लिए पर्याप्त है।

पंद्रहवें दिन: फफूंद और कीट से बचाएं

इस अवधि के पौधे नाजुक होते हैं। उन्हें सीधे पौधारोपण करने की बजाय उनमें से ऐसे पौधे चुने जो अच्छी स्थिति में हो। इनमें कोई रोग दिखाई दे तो पहले फफंूदनाशक व कीटनाशक डालें ताकि पौधे की बढ़वार अच्छी तरह हो सकें।

एक महीने बाद : अब उसे जहां चाहें रोपें

एक महीने पौधे की देखभाल करने के बाद वह तीन-चार फीट का हो जाएगा। ऐसे में उसे जहां चाहें वहां रोप सकते हैं। इसके लिए उतना गड्ढा खोदें जितनी पॉलीथिन की साइन है यानी पॉलीथिन को हटाकर उसकी मिट्‌टी को गड्ढे में उतार दें।

नर्सरी में ये पौधे मिल सकेंगे

शीशम, गुलमोहर, कचनार, डेल्टाफॉर्म, सागवान, बांस, जामफल, सीताफल, कटहल, नींबू, पीपल, वट, तीन महीने में फली देने वाले सुरजना, केसिया साइमा, करंज, अशोक, गुलर, गुड़हल, चंपा, बिल्वपत्र, नीम, चिरोल, जंगल जलेबी, सप्तपर्णी, आवंला, अनार, सेहतूत, बादाम, काजू, बाेगनवेलिया, रेंट्री, मीठा नीम, हारसिंगार, खेर, थाइकस।

विलुप्त प्रजातियों के भी

विलुप्त हो चुके पौधे जैसे अंजन, कुसुम, गुगल, आचार, चारोली, कुल्लु, अर्जुन, बहेड़ा, महुआ, पुत्रनजीवा, शमी भी मिलेंगे। नर्सरी प्रभारी का कहना है कि आमतौर पर ये पौधे नर्सरी में नहीं मिलते।

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