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गंभीर डेम सूखा तो एक हजार साल से भी ज्यादा पुराने गुप्तेश्वर मंदिर का गुंबद और नंदी मिट्‌टी से बाहर आया

Ujjain News - गंभीर डेम का पानी सूखा तो बिल्वेश्वर महादेव के सामने डेम के जल संग्रहण क्षेत्र में जलमग्न हो चुका गुप्तेश्वर...

Bhaskar News Network

Jun 14, 2019, 09:35 AM IST
Ujjain News - mp news due to severe dame the dome and nandi of the gupteeshwar temple which lasted more than a thousand years came out of the soil
गंभीर डेम का पानी सूखा तो बिल्वेश्वर महादेव के सामने डेम के जल संग्रहण क्षेत्र में जलमग्न हो चुका गुप्तेश्वर महादेव के मंदिर का गुंबज और नंदी प्रतिमा बाहर दिखाई देने लगी। ग्रामीणों का कहना है 1992 तक मंदिर में पूजन होता था। इसके बाद मंदिर जलमग्न हो गया। पुराविद् इसे एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना बता रहे हैं। इसके विक्रमादित्य कालीन होने की भी संभावना है।

गंभीर डेम क्षेत्र में 84 महादेव में से एक और पंचक्रोशी का पड़ाव स्थल बिल्वेश्वर महादेव मंदिर है। यह टीले पर बना है। इसके सामने गंभीर डेम के जल संग्रहण क्षेत्र में गुप्तेश्वर का मंदिर अब दिखाई दे रहा है। इसके गुंबद व सभा मंडप का कुछ हिस्सा, पुराने पीपल का बचा हुआ भाग, नंदी प्रतिमा मिट्टी के बाहर निकल आई है। 80 साल के बगदी राम बताते हैं डेम बनने के पहले तक मंदिर पूरा बाहर था। नंदी के आगे से मंदिर के गर्भगृह में जाने की सीढ़ियां हैं, जिनसे उतर कर गर्भगृह में जाते थे। गर्भगृह में छोटा का शिवलिंग और उसकी बड़ी जालधारी है। इसके तीन तरफ दीवार और एक तरफ गुप्त रास्ता है। कहते हैं यह गुप्त रास्ता रामघाट तक जाता है। ग्रामीण बताते हैं डेढ़ सौ साल पहले भी मंदिर जमीन में धंसा हुआ था। उसका गुंबद मिट्टी से बाहर आया तो ग्राम वासियों ने खुदाई कर मंदिर को बाहर निकाला था। विक्रमसिंह के अनुसार मंदिर के बाहरी हिस्से में परकोटा भी था।

पुराना बिल्वेश्वर मंदिर भी होने की संभावना

पुराविद् यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि यह मंदिर पुराना बिल्वेश्वर मंदिर रहा होगा, जिसके जलमग्न होने से टीले पर नया मंदिर बनाया गया होगा। दोनों मंदिर ठीक आमने-सामने हैं। यह कभी भव्य मंदिर रहा है, जिसके भग्नावशेष डेम के जल संग्रहण क्षेत्र में फैले हुए हैं। पुराविद् डॉ. रमन सोलंकी का मानना है कि पुरातत्व विभाग इसका सर्वे कराए तो उज्जैन के इतिहास की नई जानकारी मिल सकती है।

मंदिर के शिखर और स्तंभों का अवलोकन करते डॉ. सोलंकी। इनसेट नंदी की प्रतिमा।

गर्भगृह के भीतर पत्थरों से बंद रास्ते से पानी आता था

मंदिर की एक दीवार में दरवाजा जैसा है जो पत्थरों से बंद है। पत्थर इस तरह जमा कर रखे गए हैं, जिन्हें जरूरत होने पर हटाया जा सके। पत्थरों से रीस कर पानी आता है। जिससे शिवलिंग हर मौसम में जलमग्न रहता था। गरमी में जब चारों तरफ सूखा होता था तभी मंदिर के गर्भगृह में पानी भरा रहता था। पंचक्रोशी यात्रा का मार्ग मंदिर के पास से होकर जाता था। पंचक्रोशी यात्री पहले यहां पूजन करते थे और इसके बाद बिल्वेश्वर में। पूजन के लिए गर्भगृह से पानी बाहर निकालना पड़ता था। इसके बाद ही गर्भगृह में पूजन करना संभव होता था। माना जाता है कि जहां पत्थर लगे हैं वह गुप्त मार्ग है।

मालवा के भूरा बलुआ पत्थर का नंदी और सभा मंडप

पुराविद् डॉ. सोलंकी ने गुरुवार को मंदिर का अवलोकन करने के बाद बताया मंदिर परमार काल के पहले का है। यानी एक हजार साल से ज्यादा पुराना है। नंदी मालवा के बलुआ पत्थर से बना है तथा सभा मंडप भी इसी पत्थर से बना है। सभा मंडप की छत में सुंदर कमल बना हुआ है। मौजूदा गुंबद मराठा कालीन तीन सौ साल पुराना है। यानी मराठा काल में इसका जीर्णोद्धार हुआ था। मंदिर से लगा पीपल का विशाल पेड़ था, जिससे तने से टिक कर ही मौजूदा मंदिर बचा हुआ है। मालवा के पत्थरों का उपयोग, गुप्त मार्ग आदि के कारण इसे विक्रमादित्य कालीन भी मान सकते हैं, क्योंकि भर्तृहरि गुफा, करोहन में ऐसे गुप्त मार्ग हैं जिनके किस्से सम्राट विक्रमादित्य से जुड़े हुए हैं। गुप्तेश्वर में मिले गुप्त मार्ग को लेकर किवदंतियों भी है कि वीर विक्रम यहां दर्शन के लिए आता था।

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