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गाेवर्धन सागर : लोग बोले- 70 साल से जमीन हमारी, अब सरकारी या तालाब की कैसे हो गई?
गाेवर्धन सागर मामले में तहसीलदार के नाेटिस के जवाब में पक्षकाराें के जवाब अाने लगे हैं। हैरत ये है कि अब तक अाए सभी जवाबाें का मजमून एक जैसा अाैर यह है कि वर्ष 1950-51 से जमीन निजी ताैर पर हमारी रही है, अब कैसे सरकारी व तालाब की हाे गई? इधर इन हालाताें के चलते अधिकारी मानने लगे हैं कि ये मामला अासानी से व जल्दी सुलझने वाला नहीं है। एेसे में नगर निगम व प्रशासन की उक्त सागर के विकास की अवधारणा काे गहरा धक्का लग सकता है।
बुधवारिया स्थित गाेवर्धन सागर शहर के सप्त सागराें में से एक हैं। सर्वे नंबर 1281 में 1927 के सरकारी रिकाॅर्ड में ये 36 बीघा में फैला था। पूरी जमीन सरकारी थी लेकिन बाद में रिकाॅर्ड में जमीन के लिए मालिकाें के नाम जुड़ते चले गए। हालात ये हाे गए कि अब राजस्व रिकाॅर्ड में तालाब की जमीन केवल तीन बीघा ही बची है। इधर प्रशासन के निर्देश पर नगर निगम शहर के अन्य तालाबाें के साथ ही इस तालाब के भी विकास की याेजना बना रहा हैं लेकिन यहां की जमीन पर दूसरे लाेगाें के हक जताने से रूकावट अाई। एेसे में तहसीलदार पूर्णिमा सिंघी ने तालाब की जमीन पर हक जताने वाले करीब 25 लाेगाें काे नाेटिस जारी इनसे संबंधित दस्तावेज व अपना पक्ष रखने काे कहा था। इसी कड़ी में इनमें से 6 से अधिक लाेगाें ने अपने दस्तावेज प्रस्तुत कर तर्क दिए हैं। तर्क ये कि वर्ष 1950-51 से जमीन उनकी निजी ताैर पर रही है ताे अब सरकारी व तालाब की कैसे मान ली जाए?
लिंक दस्तावेजाें की जांच से सामने अा सकती सच्चाई
अधिकारी इस प्रकरण काे जटिल मानकर चल रहे हैं। साथ ही ये भी कहते हैं कि जमीन के शुरू से अब तक के लिंक दस्तावेजाें की पड़ताल में सच्चाई सामने अाएगी कि कहां से गड़बड़ी हुई या फिर तालाब की जमीन कैसे निजी हाेने लगी थी? बहरहाल जांच के ये बिंदु बाद के हैं लेकिन हाल फिलहाल ये मामला इतनी जल्दी सुलझने वाला नहीं जितना की माना जा रहा था। इसलिए भी कि कुछ लाेगाें के व प्रशासन के उक्त जमीन काे लेकर न्यायालय में भी प्रकरण प्रचलित हैं।
मामला जल्दी व आसानी से सुलझने वाला नहीं