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रामकथा केवल सुनें ही नहीं आत्मसात भी करें- पं. मेहता
संपूर्ण रामकथा मानव जीवन के लिए आदर्श आचार संहिता है। रामचरितमानस के सात कांडों को जीवन की सात महत्वपूर्ण अवस्थाओं के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। इसलिए राम कथा केवल सुनना ही नही बल्कि जीवन में आत्मसात भी करना चाहिए।
यह बात मानस मर्मज्ञ पं. विजयशंकर मेहता ने बुधवार को लोति स्कूल परिसर स्थित राजभाऊ महाकाल सभागृह में ब्रह्मलीन रामनारायण जूनवाल की पुण्यस्मृति में जूनवाल परिवार द्वारा आयोजित रामकथा सार के आध्यात्मिक आयोजन में कही। पं. मेहता ने बालकांड को सहज-सरल अवस्था बताया, वहीं उत्तर कांड को समर्पण की अवस्था बताया। उन्होंने कहा मनुष्य को प्रशंसा सुनकर अहंकार में चूर होने की बजाए सतर्क होकर अच्छा कार्य के लिए संकल्पित होना चाहिए। शुभ संकल्प में देरी नहीं करना चाहिए। हनुमान चालीसा व सुंदरकांड करने वालों की रक्षा स्वयं हनुमानजी करते हैं। रामकथा सार का शुभारंभ पं. मेहता सहित सीताराम जूनवाल, गजराजसिंह जूनवाल, कवि अशोक भाटी ने किया। पं. मेहता का स्वागत डॉ. प्रभुलाल जाटवा, सुरेंद्र जूनवाल, हेमंत व्यास आरएन राठौर, अजय मीणा, डॉ. उषा भटनागर, डॉ. शोभा शौचे, दीनदयाल बड़ोदिया, शैलेंद्र व्यास, राम भागवत ने किया। संचालन डॉ. अनिल जूनवाल ने किया। आभार जयप्रकाश जूनवाल ने माना।