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किसी व्यक्ति का अगर आचरण अच्छा है तो उसे सजा में मिल सकती है छूट: मुनि श्री

कोई व्यक्ति जान बूझकर अपराध करता हैं,उसको सजा अवश्य मिलती है, लेकिन यदि उस व्यक्ति का आचरण अच्छा है तो उसकी मिली हुई...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 05:46 AM IST
कोई व्यक्ति जान बूझकर अपराध करता हैं,उसको सजा अवश्य मिलती है, लेकिन यदि उस व्यक्ति का आचरण अच्छा है तो उसकी मिली हुई सजा में छूट भी मिल जाती है। उसी प्रकार एक सम्यक दृष्टि जीव है और उसने पूर्व में किए पापों के कारण नरक गति का बंध कर लिया है तो वह सम्यक दृष्टि जीव नरक में तो जाएगा लेकिन उसने जितना समय का निदान वध किया था उसके अच्छे आचरण से वह धीरे- धीरे घटता जाता है। और वह जीव नरक गति से पुन: मनुष्य गति में आकर मोक्ष पद को प्राप्त कर सकता है। उपरोक्त उदगार मुनि श्री अभय सागर महाराज ने र|करंडक श्रावकाचार ग्रंथ की व्याख्या करते हुए सम्यक दर्शन के महत्व को दर्शाते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने राजा श्रेणिक का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे निदान बंध के कारण राजा श्रेणिक के जीव ने मुनिराज के गले में मरा हुआ सर्प डालकर 33 सागर की नरक आयु का बंध किया था लेकिन वह घटते- घटते इतना कम हो जाएगा कि वह अगली चौबीसी में तीर्थंकर पद पर होंगे। मुनि श्री ने कहा कि हालांकि एक सम्यक दृष्टि जीव कभी भी कुछ अपवाद को छोड़कर नरक गति में नहीं जाता है। वह मनुष्य गति से देवगति और देव गति से पुन्हा मनुष्य गति में अथवा त्रियंचगति में ही जाएगा। जैसे- जैसे आपकी आयु बढ़ती जाती है आपके अंदर का उत्साह घटता जाता है। वर्तमान में जीता जागता साक्षात उदाहरण आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज को देख लो। लगभग 72 वर्ष की उनकी आयु हैं,लेकिन उनके शरीर की कांति को देख लो उनके आगे नई उम्र के मुनिराज भी फीके नजर आते हैं। बल को भी देख लीजिए इस उम्र में भी वह तीस- तीस किलोमीटर का विहार करते हैँ। जब कि उनकी आहारचर्या देख लो तो नीरस आहार लेते हैं। फिर भी वह बल में विरले ही नजर आते है। वह मानव के बीच महामानव हैं।

आचार्य भगवन कभी भी एक साथ कोई भी वृत/ नियम संयम नहीं देते वह हमेशा कहते हैं कि अपने अंदर की शक्ति को पहचानों। वह हमेशा स्वयं के परीक्षण की ही बात करते है। साथ ही यह भी कहते है कि अपनी शक्ति अनुसार व्यक्ति को वृत/ नियम/ संयम अवश्य लेना चाहिए। लेकिन कभी- कभी उस शक्ति को क्रम अनुसार भी करना चाहिए। हमारे अंदर सभी प्रकार की साधना का अभ्यास होना चाहिए। दशलक्षण पर्व व्यंजन खाने पीने का पर्व नहीं!वस्तुतः यह पर्व हमारे अंदर की शक्ति को प्रगट करने का पर्व हैं। कम से कम 10 दिन प्रदर्शन से दूर रहकर 12 प्रकार के जो तप हैं उन तपों को अभ्यास के रुप में अवश्य करना चाहिए। उन्होंने 12 प्रकार के तपों में उनोदर तप की व्याख्या करते हुए कहा कि बहुत भूख लगी है लेकिन थोड़ा सा लेकर अथवा अकेले जल लेकर उठ जाना ऊनोदर तप कहलाता है। एवं वृति परिसंख्यान वृत जिसमें कोई अनूठी विधि लेकर निकलना एवं उसमें भी विधि मिलने के उपरांत भी भोजन में भी प्रथम विशेष वस्तु लेने का संकल्प है अमुक वस्तु लेकर उठ जाना भी अनोदर तप कहलाता है।

हमारे अंदर सभी प्रकार की साधना का अभ्यास होना चाहिए।

मुनिश्री अभयसागर महाराज

वैदिक धर्म व्यवस्था से ही सुखी होगा मानव समाज- अंजलि आर्य

कुरवाई। विद्या आर्य सभा, धर्म आर्य सभा, राज आर्य सभा जैसी वैदिक धर्म व्यवस्था की पुनर्स्थापना की जाना चाहिए। जो कि समाज में नैतिक शिक्षा देकर अच्छे नागरिक बनाने, सभी मनुष्यों को एक मानव धर्म पर चलाने समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने वाले राजनेताओं को देश की सत्ता सौंपने का काम करेगी। तभी मानव समाज सुखी रह सकेगा. यह विचार आर्य समाज की राष्ट्रीय प्रवक्ता वेद विदुषी अंजलि आर्य हरियाणा ने वेद मंदिर में आयोजित जनजागृति महोत्सव में व्यक्त किए। इस मौके पर आर्य सभा सदों द्वारा उनका पुष्पहारों से स्वागत किया गया। इस मौके पर भजनोपदेशक नेत्रपाल आर्य ने भी अपने भजनों से श्रोताओं का मन मोह लिया। आर्य समाज कुरवाई द्वारा प्रारंभ वेद प्रचार अभियान 14 सितम्बर तक जारी रहेगा। जिसमें प्रातःकालीन हवन यज्ञ के पारिवारिक सत्संग के अलावा सांयकालीन सत्र में वेद मंदिर आर्य समाज कुरवाई में प्रवचन कार्यक्रम चल रहे हैं। आयोजन में पगरानी से पधारे वानप्रस्थी शिवमुनि तथा श्रीराम मुनि वानप्रस्थी का भी स्वागत किया गया। वेद विदुषि आचार्य अंजलि आर्य ने कहा कि आज कान्वेंट में पढ़ने बाले बच्चे, माता-पिता को वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा रहे हैं। वेल एजुकेटेड सरकार से वेतन पाने के अलावा ऊपर की कमाई में लगे हुए हैं। यह शिक्षा व्यवस्था हमारे देश के लिए घातक बन गई है। विद्या का मतलब केवल इंजीनियर, डाक्टर बनाना नहीं है, वैदिक शिक्षा में हम अपनी संतान को अच्छा इंसान बनाते हैं। वैदिक शिक्षा व्यवस्था छात्र- छात्राओं में पवित्रता पूर्वक जीवन जीने की भावना भरती है। आज चुनाव में खड़े होने बाले नेता यह घोषणा नहीं करते कि वह नशा मुक्त समाज बनाएंगे। धर्म अनुसार आचरण करके ही देश के राज कार्य को ठीक किया जा सकता है। वेद ईश्वरीय ज्ञान है। जो व्यक्ति वेद के मूल से जुड़ा रहता है, वह धर्म और संस्कृति के नाम पर कहीं भी भटकता नहीं है। वेद श्रृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक शाश्वत है। जो वेद ज्ञान से जुडे हैं, वह वही कार्य करेंगे, जो सैद्धांतिक दृष्टि से सही होगा, किंतु वेद के मूल से हटकर मानव वैचारिक धरातल पर भटक जाता है। पारिवारिक सत्संग के प्रथम दिवस रविन्द्र कुमार सोनी के आस्था ज्वेलर्स परिसर में देवयज्ञ संपन्न हुआ। वहीं द्वितीय दिवस मुख्य यजमान सुधीर कुमार साहू के निवास पर देवयज्ञ संपन्न हुआ।