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भगवान महावीर ने अपने जीवन के 29 वें वर्ष में वर्षी दान शुरूकर रोज 1 करोड़ 8 लाख सोना मोहरे दान देकर अरिहंत के कर्तव्य को निभाया

भगवान महावीर स्वामी ने लौकांतिक देवो के अनुरोध पर तीर्थ प्रवर्तन हेतु अपने ग्रस्त जीवन के 29 वें वर्ष में वर्षी दान...

Dainik Bhaskar

Sep 12, 2018, 05:46 AM IST
Vidisha - भगवान महावीर ने अपने जीवन के 29 वें वर्ष में वर्षी दान शुरूकर रोज 1 करोड़ 8 लाख सोना मोहरे दान देकर अरिहंत के कर्तव्य को निभाया
भगवान महावीर स्वामी ने लौकांतिक देवो के अनुरोध पर तीर्थ प्रवर्तन हेतु अपने ग्रस्त जीवन के 29 वें वर्ष में वर्षी दान का प्रारंभ कर प्रतिदिन 1 करोड़ 8 लाख सोना मोहर दान कर अरिहंत के कर्तव्य का निर्वहन किया। उक्त विचार जैन श्वेतांबर समाज के पर्युषण पर्व के छठवें दिन कच्छी भवन में आयोजित धर्म सभा में मुंबई से पधारे आराधक महेश भाई ने व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने गृहस्थ जीवन के 30 वें वर्ष में दीक्षा ग्रहण की उनका दीक्षा महोत्सव अत्यंत ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास के वातावरण में संपन्न हुआ जिसमें अनेक राजा-महाराजाओं सहित प्रचंड संख्या में श्रावक श्राविकाये उपस्थित थे ।

दीक्षा के समय भगवान महावीर के दो दिवसीय उपवास थे उपवास के पालना के समय देवों द्वारा पंच दिव्य प्रकट होते हैं ।इसके पूर्व उन्होंने पंचमुष्ठी के द्वारा स्वयं के केश लोचन किए श्री महेश भाई ने बताया भगवान महावीर के बाल्यकाल में बालक वर्धमान को उनके माता-पिता बैंड बाजों के साथ उनको ज्ञानार्जन के लिए पाठशाला ले गए। तब इंद्र महाराज अपने ज्ञान से यह सोचते हैं कि जिस युवक को मती श्रुत अवधि ज्ञान हो उसको पाठशाला ले जाना सूरज को रोशनी दिखाने के बराबर है। इंद्र महाराज ब्राह्मण के रूप में देवलोक से आकर वर्धमान से ऐसे प्रश्न पूछते हैं जिनका उत्तर पाठशाला में ज्ञान प्रदान करने वाले पंडित जी भी नहीं दे पाते हैं ।भगवान ने उन सभी शंकाओं का तत्काल समाधान किया यह देख कर भगवान के माता पिता भी उनको पाठशाला से वापस अपने महल ले जाते हैं ।भगवान महावीर अपने गृहस्थ जीवन के 30 वर्षों पश्चात दीक्षा ग्रहण करते हैं। सभी सुख-सुविधाएं छोड़ कर जंगल की ओर विचरित होते हैं। उन्होंने कहा की भगवान महावीर के जीवन से हम सभी को प्रेरणा लेना चाहिए कि जिन्होंने महल की समस्त ऐशो-आराम शान-शौकत छोड़कर त्याग का जीवन अपनाया श्री महेश भाई ने बताया कि भगवान के पारणे के समय देवों द्वारा वस्त्रों की वर्षा सुगंधित जल से पृथ्वी सिंचित की जाती है पुष्प वृष्टि देवों द्वारा वाद यंत्रों के माध्यम से आकाश में दिव्य ध्वनि प्रकट कर अहोदान अहोदान की घोषणा की जाती है वही 12.50 करोड़ सोने की मोहर की वर्षा कर पंच द्रव्य प्रकट किए जाते हैं ।उन्होंने कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने अपने जीवन के साडे बारह वर्षों तक अनेक उपसर्ग सहन किए उनके दोनों कानों में लोहे के किले तक ठोके गए । कल्पसूत्र का वाचन करते हुए कहा कि भगवान महावीर स्वामी एवं जैन तीर्थंकरों के सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है। हमको उनके बताए मार्ग एवं उपदेशों पर चलकर अपने जीवन को सार्थक करना चाहिए। पर्युषण पर्व के छठवें दिन संग पूजा का लाभ अश्विन गाला विशन जी सावला खीमजी शाह परिवार द्वारा लिया गया। सायंकाल वासुपूज्य जिनालय में भक्ति का भव्य आयोजन किया गया जिसमें महिलाओं द्वारा गुजराती गरबा रास की उत्कृष्ट प्रस्तुति दी गई।

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