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35 फीट ऊंचा निशान लेकर स्वांग गायन करते हुए निकली युवा व बुजुर्गों की टोली
बुधवार को होली की दूज पर नगर में देर रात तक कलगी-तुर्रा का उत्साह और उल्लास दिखाई दिया। सिरोंज के विद्वानों की काशी के विद्वानों पर जीत की यादगार के रूप में नगर में विजयी निशान निकाले गए। देर रात तक मुख्य बाजार में ख्याल गायन का दौर चलता दिखाई दिया। आयोजन में सुरक्षा की दृष्टि से भारी संख्या में पुलिस बल भी तैनात किया गया था।
मध्यकाल में सिरोंज के विद्वानों ने शास्त्रार्थ में काशी के विद्वानों को पराजित किया था। जिसके फलस्वरूप काशी के विद्वानों को अपने विजयी निशान तथा वाद्य यंत्र सिरोंज में ही छोड़ कर जाना पड़ा था। इस जीत के स्मरण स्वरूप नगर में हर साल होली की दूज पर आयोजित कलगी-तुर्रा पर्व में विजयी निशान निकाले जाते हैं। बुधवार को शाम 7 बजे करीब सबसे पहले गणेश की अथाई, रावजी पथ तथा पंचकुईया क्षेत्र से मध्यकालीन विजयी निशान मुख्य बाजार में आए। गणेश की अथाई के निशान के साथ पंडित नलिनीकांत शर्मा के साथ ही उनके भाई पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा भी थे। वहीं रावजी पथ से निकले के निशान के साथ एडवोकेट राहुल शर्मा, रोहिताश्व शर्मा तथा राजेश वशिष्ठ, पंचकुईया से निशान के साथ राजकुमार माथुर एवं संजीव माथुर परिवार के सदस्य शामिल थे। इसी तरह हाजीपुर स्थित प्राचीन शिव मंदिर से भी एक विजयी निशान निकाला गया। इस निशान के साथ पप्पू साहू और अन्य स्थानीय सदस्य शामिल थे। 30 से 35 फीट लंबाई वाले विजय निशानों को लेकर चल रहा यह जुलूस घेतल गली चौराहे पर पहुंचकर समाप्त हुआ। दूसरी ओर एक निशान कस्टम पथ से भी निकाला गया। यह निशान भी घेतल गली चौराहे पर पहुंचा और देर रात स्वांग और लोकगीतों का गायन किया। आयोजन को देखने के लिए इसके साथ भी बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक मौजूद थे। जो दोनों ही पक्षों की हौसला अफजाई करते हुए चल रहे थे।
कलर्गी-तुर्रा व स्वांग गायन देखने उमड़े लोग
विजयी निशान के इस पर्व पर निकलने वाले कलर्गी-तुर्रा पर्व को और अधिक खास बना रहे थे। सिर पर आकर्षक साफा बांधे कलगी एवं तुर्रा पक्ष के लोग झांझर तथा ढपली बजाते हुए स्वांग गायन करते हुए चल रहे थे।
कलगी पक्ष की टीम गणेश की अथाई तथा रावजी पथ से तथा तुर्रा पक्ष की टीम हाजीपुर तथा कंड्यापुरा कस्टम पथ की ओर से मुख्य बाजार पहुंचे थे। बड़ी संख्या में लोग नगाड़े बजा कर आयोजन में सहभागिता कर रहे थे। दोनों ही पक्ष गायन
करते हुए देर रात में घेतल गली स्थित अढाई सीढ़ी पर पहुंचे। यहां पर काफी देर तक दोनों ही पक्षों में वाद-विवाद भी हुआ। जो अंत में बराबरी पर खत्म हुआ। इस दौरान देर रात तक आयोजन स्थल पर बड़ी संख्या में पुलिस बल भी तैनात रहा।
मध्यकाल में सिरोंज के विद्वानों ने शास्त्रार्थ में काशी के विद्वानों को पराजित किया था
कलगी शक्ति और तुर्रा पक्ष होता है ब्रह्मा का प्रतीक
कलगी-तुर्रा स्वांग एवं फड़ गायन की कला है। जिसमें कलगी और तुर्रा दो पक्ष होते हैं। कलगी पक्ष शक्ति एवं तुर्रा पक्ष ब्रह्मा का प्रतीक होता है। दोनों ही पक्षों द्वारा व्यंगात्मक लहजे में तरह-तरह के स्वांग गाए जाते हैं। पहले होली की दूज, रंगपंचमी तथा गणगौर पर्व पर स्वांग गायन होता था लेकिन अब सिर्फ होली के दूज पर ही सिरोंज में यह आयोजन होता है। कलगी पक्ष के स्वांग गायन में मोतीनाथ, सुनकीनाथ, धन्नानाथ तथा रामनारायण भार्गव माहिर थे। इसी तरह तुर्रा पक्ष के स्वांग गायन में हरिनारायण भार्गव, बाबूलाल श्रीवास्तव, चर्चित नाम रहे हैं।