सुबह नाश्ता, दोपहर को खाना, शाम को बांटे कपड़े

Vidisha News - मंगलवार को सकल तारण तरण दिगंबर जैन समाज विदिशा द्वारा श्रीमद जिन तारण तरण मंडलाचार्य संत तारण स्वामी का 571वां...

Dec 04, 2019, 11:05 AM IST
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मंगलवार को सकल तारण तरण दिगंबर जैन समाज विदिशा द्वारा श्रीमद जिन तारण तरण मंडलाचार्य संत तारण स्वामी का 571वां जन्मोत्सव उत्साह से मनाया गया। इसमें सबसे पहले सुबह 5:30 बजे से प्रभातफेरी नगर के मुख्य मार्गों से निकाली गई। इसके बाद सुबह 7:30 से तीन बत्ती जी का पाठ किया गया।

इस मौके पर ब्रह्मचारी प्रज्ञानंद ने प्रवचन दिया। प्रख्यात भजन गायिका दीक्षा के सुमधुर संगीत के साथ ब्रहद मंदिर विधि कार्यक्रम हुआ। तारण समाज विदिशा और न्यास के अध्यक्ष सुरेश कुमार जैन द्वारा ब्रह्मचारी प्रज्ञानंद महाराज जी को वर्षावास के लिए श्रीफल भेंट किया गया। तारण तरण सोशल ग्रुप विदिशा द्वारा मंदिर के बाहर फलाहार का वितरण किया गया। श्री तारण तरण दिसंबर जैन चैत्यालय न्यास खरीफाट के महामंत्री अनिल कुमार जैन ने बताया कि जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में श्री तारण तरण दिगंबर जैन युवा परिषद आदर्श इकाई द्वारा डायलिसिस सेंटर में नि:शक्तजनों का एक-एक दिन का डायलसिस नि:शुल्क कराया गया। इसके बाद दोपहर के समय माधवगंज चौराहे पर सैकड़ों लोगों को नि:शुल्क भोजन का वितरण किया गया। खरी फाटक चैत्यालयजी के सामने फल वितरण किया गया। शाम को सिविल लाइंस स्थित श्री हरि वृद्धाश्रम में जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्रों को बांटा गया।

जात-पांत में नहीं करते थे भरोसा: गुरुदेव संत तारण तरण जात-पांत में भरोसा नहीं करते थे। उन्होंने समाज से भेदभाव को समाप्त किया। उनका कहना था कि आत्मा की कोई जाति नहीं होती है। शरीर की जाति होती है। संस्कारों से ही मनुष्य में सदगुणों का विकास होता है। सेमलखेड़ी में संत तारण तरण का मंदिर 7 एकड़ में फैला है। यहीं उन्होंने 21 साल की उम्र में दीक्षा लेने के बाद 14 ग्रंथों की रचना की थी।

सेमलखेड़ी में की थी 14 ग्रंथों की रचना

सन 1448 यानी संवत 1505 में कटनी जिले के पुष्पावती नामक स्थान पर गुरुदेव संत तारण तरण का जन्म हुआ था। 5 साल की उम्र में उन्हें विलक्षण ज्ञान प्राप्त हुआ था। 11 साल में आत्मानुभूति हुई थी। 21 साल में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। इसके बाद अपने मामा लक्ष्मण सिंघई के पास सेमलखेड़ी सिरोंज आ गए थे। यहां अपनी तपोभूमि बनाई। 60 साल की उम्र में उन्होंने दिगंबर साधु का वेश धारण किया था। यहां उन्होंने 14 ग्रंथों की रचना की थी। इसके बाद सन 1515 यानी संवत 1572 में उन्होंने अशोकनगर जिले की मुंगावली तहसील के मल्हारगढ़ नामक स्थान पर समाधि ली थी। दमोह के पास सूखा निसईजी में गुरुदेव की विहार स्थली रही है। सेमलखेड़ी स्थित धर्मशाला में 180 कमरे, 5 प्राचीन गुफाएं हैं। सिद्ध क्षेत्र में 7 मंजिला मामाजी की हवेली भी है।

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