एक किमी के दायरे में हंै उदयगिरि पहाड़ी पर 20 गुफाएं

Vidisha News - विदिशा|विदिशा स्टेशन से लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पश्चिम दिशा में विंध्य पर्वतमाला की लगभग 1 किलोमीटर लंबी...

Dec 11, 2019, 11:00 AM IST
Vidisha News - mp news there are 20 caves on the udayagiri hill in a radius of one km
विदिशा|विदिशा स्टेशन से लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पश्चिम दिशा में विंध्य पर्वतमाला की लगभग 1 किलोमीटर लंबी पहाड़ी पर 20 गुफाएं उत्कीर्ण हैं जिन्हें सांची के अभिलेखों में बेस गिरी तथा मेघदूत में नीचे गिरी के नाम से वर्णन किया गया है।

वर्तमान में पर्वत श्रंखला उदयगिरि के नाम से जानी जाती है। उदयगिरि नामकरण संभवत: परमार नरेश उदयादित्य के नाम पर पड़ा होगा। इस पहाड़ी पर ब्राह्मण तथा जैन धर्म से संबंधित 20 छोटी-बड़ी गुफाएं हैं। अधिकांश गुफाएं चंद्रगुप्त द्वितीय तथा कुमार गुप्त प्रथम ईसवी सन 400 से 426 के बीच निर्मित हुई हैं। इनमें वैष्णव धर्म को समर्पित गुफाओं की बहुलता है जो इस नगर में पूर्व से व्याप्त सांस्कृतिक परंपराओं की परिचायक हैं यहां विद्यमान गुफाओं की निर्माण शैली मंदिर स्थापत्य के अनुरूप है। कालिदास ंने अपने महाकाव्य मेघदूत एवं मालविकाग्निमित्रम् में विदिशा का उल्लेख किया है।

उदयगिरि में वैष्णम धर्म की गुफाओं की बहुलता: गुप्त काल में गुफाएं जो चंद्रगुप्त द्वितीय व कुमार गुप्त द्वारा निर्मित हुई इनमें वैष्णव धर्म को समर्पित गुफाओं की बहुलता है। क्रमांक 1 अथवा 20 शिल्प शास्त्र की दृष्टि से यह गुफा भारत में मंदिर निर्माण विद्या में आरंभिक काल का परिचायक है। गुप्तकालीन मूर्ति शिल्प का अंकन कला जगत की श्रेष्ठ कृतियों में शामिल है। अन्य गुफाओं में क्रमांक तीन एवं चार शैव धर्म को समर्पित हैं। गुफा क्रमांक 6 ,7 अत्यंत आकर्षक हैं। गुफा क्रमांक 7 के पास चट्टानों को काटकर रास्ता बनाया गया है। गुफा क्रमांक 5 में संसार की प्रसिद्ध कृति वराह की प्रतिमा है।

कंटेंट: अरुण त्रिवेदी, फोटो: सीताराम मालवीय

कटे हुए पहाड़ जैसा दिखाई देता है लोहांगी पहाड़ी का स्वरूप

विदिशा रेलवे स्टेशन से लगभग एक किमी दूर 200 से ज्यादा फीट ऊंची एक पहाड़ी है जो निर्जन एवं पथरीली है जिसका उपरी भाग समतल है। इसी समतल भाग में मंदिर ,मस्जिद एवं शुंगकालीन अशोक स्तम्भ का शीर्ष है।

लोहांगी पहाड़ी का वर्तमान स्वरूप एक कटे हुए पहाड़ जैसा है। चारों ओर से पहाड़ी के पत्थर को काटा गया होगा। विदिशा के किले की दीवारों, विजयमंदिर या बीजा मंडल का निर्माण आदि इसी पहाड़ी के पत्थरों से हुआ होगा। यह पत्थरों की एकरूपता देख कर प्रतीत होता है। लोहांगी पर जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं,जिनका निर्माण नपा द्वारा किया गया है। सीढ़ियों के पहले पहाड़ी पर जाने के लिए एक रपट वाला रास्ता था। उसी से पैदल अथवा घोड़े पर जाया जाता था।

प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध जी ने अपनी कविता में लोहांगी को याद करते हुए लिखा है: उस अंधियारे ताल के उस पार नगर निहारता-सा खड़ा है पहाड़ एक, लोहे की नभ-चुम्भी शिला का चबूतरा लोहांगी कहाता है, कि जिसके भव्य शीर्ष पर बड़ा भारी खण्डहर, खण्डहर के ध्वंसों में बुजुर्ग दरख़्त एक जिसके घने तने पर, लिक्खी है प्रेमियों ने अपनी याददाश्तें, लोहांगी में हवाएं दरख्त में घुसकर पत्तों से फुसफुसाती कहती हैं, नगर की व्यथाएं, सभाओं की कथाएं, मोर्चों की तड़प और मकानों के मोर्चे मीटिंगों के मर्म-राग, अंगारों से भरी हुई प्राणों की गर्म राख, रें ज़िन्दगी का प्रश्नमयी थरथर थरथराते बेक़ाबू चांदनी के पल्ले-सी उड़ती है गगन-कंगूरों पर । पीपल के पत्तों के कम्प में चांदनी के चमकते कम्प से ज़िन्दगी की अकुलायी थाहों के अंचल उड़ते हैं हवा में !! गजानंद माधव मुक्तिबोध:

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