तृष्णा की यह खाई कभी भरती नहीं है, इसे जितना भी भरो सदैव खाली ही नजर आती है: आचार्य श्री

Vidisha News - प्रकृति का एक नियम है जो जितना भारी होता है वह नीचे की ओर जाता है। उसी प्रकार हम जितने-जितने परिग्रह को इकट्ठा करते...

Nov 21, 2019, 09:50 AM IST
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प्रकृति का एक नियम है जो जितना भारी होता है वह नीचे की ओर जाता है। उसी प्रकार हम जितने-जितने परिग्रह को इकट्ठा करते चले जाएंगे, उतने-उतने हम नीचे पाप के बोझ से दबते चले जाएंगे। इस प्रकार का दृव्य को इकट्ठा करने में दुख। यह खो जाए तो दुख। इसको खर्च करने में दुख। यानी कि धन आए तो दुख और जाए तो दुख। इस प्रकार इंसान परिग्रह को एकत्रित कर दुख ही दुख एकत्रित कर रहा है। उपरोक्त उदगार आचार्य उदार सागर महाराज ने जैन भवन किरी मोहल्ला आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ऐसा धन किस काम का जो हमारी दुर्गति का कारण बने। धन के प्रति मूर्छा सर्प योनि में जन्म दिलाती है। यहां पर वह धन को एकत्रित करता है और वहां सर्प योनि में जन्म लेकर काला नाग बन करके उसकी सुरक्षा करता है। उन्होंने कहा कि धन के संग्रह के कारण ही यह दुर्गति होती है, फिर भी धन के प्रति मूर्छा हमारी समाप्त नहीं होती। आजकल तो सोना पहनने का धर्म ही नहीं हैं। यदि सोना पहन कर बाजार में निकल जाओ और चोरों को मालूम पड़ जाए कि असली सोना पहने है तो नाक- कान की छोड़ो सीधे गला कट जाता है। इस प्रकार की घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ने और सुनने को मिलती हैं। उन्होंने कहा कि तृष्णा की यह खाई कभी भरती नहीं है। इसे जितना भी भरो सदैव खाली ही नजर आती हैं। आशा के इस गड्ढे में तीनों लोको की संपदा भी डाल दो तो वह कभी समाप्त नहीं होती।

धन के संग्रह के कारण ही दुर्गति होती है, फिर भी धन के प्रति मूर्छा समाप्त नहीं होती

आचार्य मुनि श्री महाराज के प्रवचन सुनने पहुंचे जैन समाज के श्रद्धालु।

अनलिमिटेड इच्छाओं के कारण गायब हो गए कल्प वृक्ष

महाराजजी कहते हैं कि पहले के जमाने में कल्पवृक्ष हुआ करते थे लेकिन लोगों की अनलिमिटेड इच्छाओं के कारण ही आज कल्पवृक्ष गायब हो गए हैं। क्योंकि इच्छाओं का अनंत आकाश है और संतोष की कोई सीमा नहीं है। आचार्य श्री ने कहा कि यदि संतोष हमारे पास आ जाए तो आज भी हम कल्पवृक्ष को पैदा कर सकते हैं लेकिन वर्तमान समय में असीमित आकांक्षाओं के कारण उसकी पूर्ति संभव ही नहीं हैं। संतोष नहीं होने के कारण ही संचय करने की प्रवृत्ति बढ़ती चली जा रही है। उन्होंने एक घटना सुनाते हुए कहा कि एक लोहार था और वह अपने सीमित साधनों से अपनी रोजी रोटी कमा रहा था। सुबह- शाम भगवान के भजन गाता और हमेशा प्रसन्न रहता था। एक सेठजी ने जब यह देखा तो उन्होंने एक दिन उस लोहार के घर की छप्पर से धीरे- धीरे 99 रुपए डाल दिए। लोहार बड़ा खुश कि भगवान ने छप्प रफाड़ कर धन दिया है। उसने उन रुपयों को गिना तो वह निन्यानबे थे और वह दुःखी हो गया। वह निन्यानबे के फेर के पड़कर अपना सुख और चैन गंवा बैठा। कहते हैं कि उसका भगवान के प्रति भजन- पूजन छूट गया लेकिन वह सौ कभी पूरे नहीं हुए।

संग्रह की प्रवृत्ति ही दुख का मूल कारण

उदार सागर महाराज ने अपने प्रवचन में विदेश में घटी एक और घटना जो कि समाचार पत्रों के माध्यम से सुनने में आई थी, उसे सुनाते हुए कहा कि कि एक व्यक्ति कार से दोनों ओर नोट फेंकता चला जा रहा था। लोगों ने कहा कि यह पागल तो नहीं हो गया। तो उसने जवाब दिया कि मैं अभी तक तो पागल ही था जो दिन रात मेहनत करके अथाह दौलत को कमाया और आज वही दौलत मेरी परेशानी का कारण बनी हुई है। आज मैं दोनों हाथों से जब अपनी दौलत को लुटा रहा हूं तो मैं अपने आपको काफी हल्का महसूस कर रहा हूं। आचार्य श्री ने कहा कि संग्रह की प्रवृत्ति ही दुःख का कारण है। और हम सभी को परिग्रह परिमाण व्रत को रखकर संग्रह की इस प्रवृत्ति से बचकर सुख को पा सकते हैं।

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