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तुम किसी जीव के सुख-दुख को देने वाले नहीं हो, न ही किसी के कर्ता हो, संसार तो कर्म धीन है

Vidisha News - जग के वैभव को पाकर के निश दिन कैसा अलमस्त रहा। चारों गतियों की ठोकर को खाने में ही कैसा मस्त रहा। संसार में जीवों...

Feb 15, 2020, 09:50 AM IST
Vidisha News - mp news you are not going to give happiness or sorrow to any living being nor are you the doer of anyone the world is poor

जग के वैभव को पाकर के निश दिन कैसा अलमस्त रहा। चारों गतियों की ठोकर को खाने में ही कैसा मस्त रहा। संसार में जीवों के लिए संयोग और वियोग से ही दुख होता है उन संयोगों को और वियोग को छोड़ना होगा तभी आपके जीवन में अध्यात्म का रस आ सकता है। जिसके जीवन में अध्यात्म का रस आ जाता है वही जीवन में सच्चे रस का रसपान कर सच्चे सुख को प्राप्त कर सकता है। उपरोक्त उदगार मुनि प्रसाद सागर महाराज ने श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा कि यह शरीर जब मां के गर्भ में आया और हमें परिवार मिला इससे मिलने वाले सभी संयोग और वियोग की समस्याओं से यह जीव दुखी हो जाता है। कभी कभी जीवन साथी के संयोग और वियोग की स्थिति में यह जीव सुख और दुख महसूस करता है तो कभी संतान के सुख दुख में, कभी बेटा हो या बेटी उनकी पढ़ाई को लेकर तो कभी वह संतान के कहना नहीं मानने पर यह जीव दुख महसूस करता है। मुनि श्री ने कहा कि जिस जीव ने जग के वैभव को ठुकरा कर राग द्वेष की इस परणति से छुटकारा पाया है उसी ने सच्चे सुख को प्राप्त किया है। उन्होंने कहा कि भले ही विज्ञापन का जमाना हो लेकिन वस्तु में क्वालिटी नहीं होती है तो वह वस्तु ज्यादा नहीं चल पाती। उसी प्रकार बाहरी आडंबर के साथ अध्यात्म टिक नहीं सकता।

बेटा और बेटियों की पढ़ाई हैं से दुखी

मुनि श्री ने कहा कि कर्म के उदय में कर्म का बंध करता है तो कर्म के विपाक में उन बंधे हुए कर्म को छोड़ भी सकता है। उन्होंने कहा कि संसार के संयोग और वियोग ही सुख दुख के कारण हैं। संसार के दुखों का वर्णन करते हुए कहा कि कहीं कोई बेटा और बेटियों की पढ़ाई से दुखी हैं तो कहीं कोई अपने व्यापार या अपने अधिकारी या अधिनस्थों के कारण दुखी है। यह संसार के दुख हैं आप अपने अंदर से कर्तापने का भाव निकाल दो। उन्होंने कहा कि विवेकी जन अपनी बुद्धि से काम करते हैं। विचार करो कि आप किसी जीव के सुख दुख को देने वाले नहीं हो न ही तुम किसी के कर्ता हो और न ही तुम उसके भोक्ता हो, संसार तो कर्म धीन है।

महाराज श्री ने एक घटना सुनाते हुए कहा कि पपोरा जी में गोभक्त जीव दया प्रेमी एडवोकेट एके जैन आए और उन्होंने आचार्य श्री को बताया कि भारत सरकार में एक नियम था कि जो अनुपयोगी जानवर हैं उनको स्लाटर हाउस में ले जाया जा सकता था और उस नियम के कारण न जाने कितने जीवों की हत्या हो रही थी। आचार्य श्री आपके आशीर्वाद से हमने सुप्रीम कोर्ट में पिटीसन दायर की थी एवं सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निर्णय दिया कि
अनुपयोगी जानवरों को भी स्लाटर हाउस नहीं ले जाया जा सकता। सरकार उनको गाे शालाओं में रखने की व्यवस्था करे।

भले ही विज्ञापन का जमाना हो, लेकिन वस्तु में क्वालिटी नहीं है तो वह ज्यादा नहीं चलता

देव शास्त्र गुरु का कर्ज कभी भी नहीं मिट सकता: मुनिश्री

आचार्य श्री आपके आशीर्वाद से आज में कर्ज मुक्त हो गया हूं तो आचार्य श्री ने कहा कि देव शास्त्र गुरु का कर्ज कभी भी नहीं मिट सकता। इस कर्ज से तो हम तभी मुक्त हो सकते हैं जब हम शरीर से मुक्त होकर सिद्ध शिला पर जाकर विराजमान हो जाएं। उन्होंने कहा कि हम लोग क्या कर रहे हैं थोड़ा बहुत काम किया और फूले नहीं समाए और अपने आपको कर्ताबुद्धी से अलग नहीं कर पाते। साथ ही कहा कि परिणामों की बात है जैसे हमारे परिणाम होते हैं वैसे ही हमारे कर्म बंधते एवं छूटते हैं। उन्होंने भीष्म पितामह का उदाहरण देते हुए कहा कि पितामह बाणों की शैया पर लेटे हुए थे तो पांडवों ने द्रोपदी से नीति सीखने की बात कही तो द्रोपदी उग्र हो उठी और कहा कि कैसे पितामह हैं और उनकी कैसी नीति? जब इस राज्य सभा में मेरे साथ अनर्थ हो रहा था मेरी अस्मिता लूटी जा रही थी तो उनकी नीति कहां गई थी? तो पांडवों ने उसको समझाया और पितामह के पास ले गए और द्रोपदी की ओर से उसके द्वारा कहे गए वचनों की क्षमा मांगी तो उसका जबाव देते हुए भीष्म पितामह कहते हैं कि उस समय में सिंहासन से बंधा हुआ था। जैसा अन्न में खा रहा था वैसी मेरी बुद्धि चल रही थी। कौरवों के खाए हुए अन्न से जो रक्त अशुद्ध हो गया था। वह रक्त पांडवों के बाणों से निकल गया है और में अपने आपको उस सिंहासन के कर्ज से मुक्त महसूस कर रहा हूं। मुनि श्री ने कहा कि इससे यह बात सिद्ध होती है कि “जैसा खाओ अन्न वैसा होवे मन, जैसा पीओ पानी वैसी होवे वाणी।

शिक्षा के साथ ही दिए जाना चाहिए संस्कार

महाराज श्री ने कहा कि संस्कारों की बात करते हुए कहा कि इस विदिशा नगरी ने आपको शिक्षा के संस्कार दिए हैं। आपके नगर में शिक्षा की शुरुआत करने में तो भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद आपके यहां के बड़जात्या शिशु मंदिर में आए थे। आज भी वहां पर वह शिलालेख लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में आज आचार्य श्री ने प्रतिभा स्थली के माध्यम से बेटियों को संस्कारित करने के साथ ही आधुनिक शिक्षा देने का जो आशीर्वाद दिया है वह आज फलीभूत हो रहा है। आचार्य श्री चाहते हैं कि वर्तमान समय में शिक्षा के साथ संस्कार भी दिए जाना चाहिए। जिसके पास शिक्षा के साथ संस्कार रहते हैं वह अपने जीवन का उत्रोतर विकास करता है। इसलिए आज आचार्य गुरुदेव विद्या सागर महाराज शिक्षा के स्तर में संस्कारों को पुनर्जीवित करना आवश्यक मानते हैं। उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन जो कि एक किसान के बेटे थे एवं शून्य से शिखर की ओर पहुंच कर राष्ट्रपति बने थे। जब उनसे कहा गया कि आज आप राष्ट्रपति हैं और अपने शत्रुओं को नष्ट क्यूं नहीं करते तो उन्होंने जो जबाव दिया वह ग्रहण करने योग्य हैं। उन्होंने कहा कि में अपने शत्रुओं को अपना मित्र बनाकर नष्ट कर रहा हूं। यह दयालुता के परिणाम जब उन एक विदेशी किसान के बेटे के पास हो सकते हैं तो क्या हम भारतवासी और जैन कुल में पैदा हुए हमारे अंदर यदि जीव रक्षा और दयालुता के परिणाम न आवे तो हमारा जैन कुल और भारतीय होने का देव शास्त्र गुरु का सानिध्य मिलने का कोई लाभ नहीं होगा।

जग के वैभव को पाकर के निश दिन कैसा अलमस्त रहा। चारों गतियों की ठोकर को खाने में ही कैसा मस्त रहा। संसार में जीवों के लिए संयोग और वियोग से ही दुख होता है उन संयोगों को और वियोग को छोड़ना होगा तभी आपके जीवन में अध्यात्म का रस आ सकता है।

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