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जीएनई मायोपैथी: ये अजीब लाइलाज बीमारी, दस लाख लोगों में एक को

हैदराबाद, दिल्ली और कुछ अन्य जगह इलाज संभव, लेकिन इलाज भी बीमारी को सिर्फ बढ़ने से रोक सकता, खत्म नहीं कर सकता

Dainik Bhaskar

Sep 09, 2018, 12:35 AM IST
GNE Myopathy Strange Endangered Disease

नई दिल्ली. रतलाम में रेलवे में जूनियर इंजीनियर 28 वर्षीय दिलीप पाटीदार डेढ़ वर्ष पूर्व बाइक चलाते समय अचानक से गिर पड़े। देखा कि बायां पैर उठ नहीं पा रहा है। जब वे डॉक्टर के पास गए तो बहुत बाद में मालूम पड़ा कि यह जीएनई मायोपैथी बीमारी है।

दिलीप बताते हैं कि शुरू में बीमारी समझ में ही नहीं आई। लगा कि चलने में कमजोरी आ गई है तो मैं ताकत की दवाई लेने लगा। मैंने इंदौर, मुंबई आदि स्थानों पर दिखाया। डॉक्टरों ने बताया कि दुनिया में इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। डॉक्टरों के मुताबिक करीब जीएनई मायोपैथी 10 लाख लोगों में से एक को होती है। यह जेनेटिक रोग है। यह मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के 33 प्रकार में से एक है। हैदराबाद, दिल्ली और कुछ अन्य जगह इसका इलाज होता है, लेकिन यह इलाज भी बीमारी को सिर्फ बढ़ने से रोक सकता है, खत्म नहीं कर सकता।

देश में सिर्फ इसी बीमारी के इलाज के लिए एक सेंटर सोलन में चल रहा है। इंडियन एसोसिएशन ऑफ मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (आईएएमडी) सोलन की प्रमुख संजना गोयल कहती हैं कि यह बीमारी चार वर्ष की आयु से लेकर उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो सकती है। अभी हाल ही में हमारे सामने ढाई वर्ष में यह बीमारी हाेने का केस भी अाया है। शुरुआत में छोटे बच्चे एड़ी उठाकर पंजे से चलते हैं। घुटनों पर हाथ रखकर या रेलिंग पकड़कर सीढ़ियां चढ़ पाते हैं। यह बीमारी हैरीडिटी नहीं है, लेकिन जेनेटिक अवश्य है। पहले बहुत परेशानी थी लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद अभी विकलांग श्रेणी में इसे माना है। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी 33 प्रकार की होती है। जीएनई मायोपैथी 10 लाख में से एक लोग को होती है, यह रेयर किस्म की बीमारी है। वहीं मस्कुलर डिस्ट्रॉफी देश में करीब 3500 लोगों में एक व्यक्ति को है। यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है।
गोयल ने कहा कि इस बीमारी का जल्दी से पता नहीं चलता है, लोग इसे वीकनेस मानकर हेल्थ टॉनिक लेने लगते हैं। मांसपेशियां कमजोर होकर ढीली पड़ जाती हैं, लगातार छोटी होती चली जाती हैं। दुर्भाग्य से अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज नहीं खोजा गया है। अभी अमेरिका में जरूर इस संबंध में शोध और क्लिनिकल ट्रायल हो रहे हैं। थैरेपी और योग से इस रोग को बढ़ने से रोका जा सकता है। इस रोग की शुरुआत में पहले-पहल तो शरीर का संतुलन बनाने में दिक्कत आती है। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी में व्यक्ति बिना सहारे के खड़े होने, पीठ टिकाए बिना बैठने में दिक्कत महसूस करता है। पलकें लटक जाती हैं। रीढ़ की हड्डी झुकने लगती है। चलने-फिरने में दिक्कत होती है। सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। जोड़ों में तकलीफ होती है। न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार यह इतनी रेयर बीमारी नहीं है, इसके बावजूद अभी जेनेटिक होने के कारण इसका उपचार संभव नहीं है। गोयल कहती हैं कि हमने देश में बहुत सारे स्थानों पर कैंप लगाए। हर जगह 90 से 120 तक इस रोग से पीड़ित मरीज मिल जाते हैं।

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