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असम में एनआरसी की दूसरी लिस्ट जारी: असम में 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 वैध नागरिक, 40 लाख के नाम शामिल नहीं

2 वर्ष पहले
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- असम इकलौता राज्य जहां नेशनल रजिस्टर बन रहा
- राजनाथ सिंह ने कहा कि जिनके नाम लिस्ट में नहीं, उनके खिलाफ काेई कार्रवाई नहीं होगी
- सिटीजन रजिस्टर के विरोध में प्रदर्शन की आशंका, सात जिलों में धारा 144 लागू

 


गुवाहाटी .  असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) का फाइनल ड्राफ्ट सोमवार को जारी किया गया। इसके मुताबिक 3.39 करोड़ में से 2.89 करोड़ लोगों को नागरिकता के लिए योग्य पाया गया। 40 लाख लोगों के नाम इस लिस्ट में नहीं हैं। जो नाम छूट गए हैं, उनमें भाजपा और एआईयूडीएफ का एक-एक विधायक शामिल है। हालांकि, केंद्र ने कहा कि ड्राफ्ट में जिन लोगों के नाम नहीं हैं, उन्हें विदेशी घोषित नहीं किया जाएगा। यह सिटीजन रजिस्टर का दूसरा और अंतिम ड्राफ्ट है। 31 दिसंबर को पहला ड्राफ्ट जारी किया गया था। तब 1.90 करोड़ लोगों के नाम शामिल किए गए थे। राहुल गांधी ने सरकार पर तंज कसा कि इस पेंचीदा और संवेदनशील प्रक्रिया को बेहद सुस्त तरीके से अंजाम दिया गया।

संसद में भी असम के मुद्दे पर हंगामा हुआ। लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, "यह काम पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रहा है। मैं विपक्ष से पूछना चाहता हूं कि इसमें केंद्र की क्या भूमिका है? ऐसे संवेदनशील मुद्दों का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए। जो भी लिस्ट इस समय जारी हुई है, वह फाइनल नहीं है। सूची में जिनका नाम नहीं है, वे दो महीने-तीन महीने या जो भी समय तय हो, उसमें दावा कर सकेंगे। इसके बाद इस मसले का निपटारा किया जाएगा। यह भी सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा। हम कुछ नहीं कर सकते।"  

 

ममता ने कहा- भाजपा वोटों की राजनीति कर रही: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, "जिन 40 लाख लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे कहां जाएंगे? क्या सरकार के पास उनके लिए कोई पुनर्वास कार्यक्रम है? आखिरकार बंगाल ही पीड़ा सहेगा। ये भाजपा की वोटों की राजनीति है। बंगाली भाषियों को निशाना बनाया जा रहा है। मैं गृहमंत्री से संशोधन लाने की मांग करती हूं। लोगों को साजिश के तहत अलग किया जा रहा है। लोगों को उन्हीं के देश में शरणार्थी बनाया जा रहा है। इसका असर हमारे राज्य में भी महसूस किया जा रहा है। ऐसे भी लोग हैं, जिनके पास आधार और पासपोर्ट हैं। उनका नाम भी ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं है। क्या सरकार जबरदस्ती उन्हें बाहर निकालना चाहती है?" इस पर बंगाल यूनिट के भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि ममता बनर्जी एनआरसी के मुद्दे पर राजनीति कर रही हैं। अगर बंगाल में भाजपा आती है तो यहां भी एनआरसी बनाया जाएगा। 

 

मनमोहन ने की थी एनसीआर की पहल : राहुल ने फेसबुक पोस्ट में लिखा, " एनसीआर की पहल यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह ने 1985 में हुई असम संधि के वादों को पूरा करने के लिए की थी। लेकिन, जिस तरह से केंद्र और असम की भाजपा सरकार ने इस प्रक्रिया को अंजाम दिया है, उसमें काफी कुछ बाकी रह गया है। लोग सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं। जिनके साथ नाइंसाफी हुई है, उन्हें इंसाफ दिलाया जाए।" 

 

फाइनल ड्राफ्ट में आया एआईयूडीएफ सांसद बदरुद्दीन का नाम : फाइनल ड्राफ्ट में जिन दो विधायकों के नाम नहीं हैं, वे मोरीगांव से भाजपा के रमाकांत देवरी और दक्षिण अभयपुरी से एआईयूडीएफ के अनंत कुमार मल्लाह हैं। हालांकि, ड्राफ्ट में एआईयूडीएफ के सांसद बदरुद्दीन अजमल का नाम है। इससे पहले दिसंबर 2017 में आए पहले ड्राफ्ट में उनका नाम नहीं था। इस ड्राफ्ट में 1.4 करोड़ लोगों के नाम नहीं थे।

 

आगे क्या : गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि जिनके नाम इस ड्राफ्ट में शामिल नहीं हैं, उन्हें विदेशी घोषित नहीं किया जाएगा। ये अधिकार केवल ट्रिब्यूनल के पास है, जहां ऐसे लोग जा सकते हैं। जिनके नाम फाइनल ड्राफ्ट में नहीं हैं, उन्हें भारत या असम का अवैध निवासी भी नहीं माना जाएगा। एनआरसी के संयुक्त सचिव सत्येंद्र गर्ग ने बताया कि दावे और आपत्ति की प्रक्रिया 30 अगस्त से शुरू होगी और 28 सितंबर तक चलेगी। वहीं, राजनाथ सिंह ने भरोसा दिलाया कि जिनके नाम लिस्ट में नहीं हैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। 

 

कौन हैं वे 40 लाख लोग जिनके नाम ड्राफ्ट में नहीं : एनआरसी के राज्य संयोजक प्रतीक हजेला ने कहा- किस वजह से लोगों के नाम लिस्ट में शामिल नहीं किए गए, ये सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। हम उन्हें व्यक्तिगत तौर पर ये बताएंगे। ऐसे लोग एनआरसी सेवा केंद्र आकर भी वजह जान सकते हैं। हालांकि, रजिस्ट्रार ऑफिस ने बताया कि असम के सिटीजन रजिस्टर में चार कैटेगरी में दर्ज लोगों को शामिल नहीं किया गया। ये कैटेगरी हैं- 1) संदिग्ध वोटर, 2) संदिग्ध वोटरों के परिवार के लोग, 3) फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में जिनके मामले लंबित हैं, 4) जिनके मामले लंबित हैं, उनके बच्चे। इनमें सबसे विवादास्पद कैटेगरी संदिग्ध वोटरों की है। चुनाव आयोग ने 1997 में यह कैटेगरी शुरू की थी। ऐसे 1.25 लाख संदिग्ध वोटर असम में हैं। वहीं, 1.30 लाख मामले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में लंबित हैं।

 

नेशनल रजिस्टर की जरूरत क्यों :  असम इकलौता राज्य है जहां नेशनल सिटीजन रजिस्टर बनाया जा रहा है। दरअसल, असम में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों को लेकर हमेशा से विवाद रहा है। एक अनुमान के मुताबिक असम में करीब 50 लाख बांग्लादेशी गैरकानूनी तरीके से रह रहे हैं। यह किसी भी राष्ट्र में गैरकानूनी तरीके से रह रहे किसी एक देश के प्रवासियों की सबसे बड़ी संख्या है। 80 के दशक में इसे लेकर छात्रों ने आंदोलन किया था। इसके बाद असम गण परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ। समझौते में कहा गया कि 1971 तक जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे, उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को निर्वासित किया जाएगा। अब तक सात बार एनआरसी जारी करने की कोशिशें हुईं। 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अंत में अदालती आदेश के बाद ये लिस्ट जारी हुई है।

 

500 ट्रक के वजन के बराबर दस्तावेज जमा हुए : 3 साल में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों ने नागरिकता साबित करने के लिए 6.5 करोड़ दस्तावेज सरकार को भेजे। ये दस्तावेज करीब 500 ट्रकों के वजन के बराबर था। इसमें 14 तरह के प्रमाणपत्र थे। 2016 में पहली बार भाजपा ने राज्य में सरकार बनाई। सीएम सर्वानंद सोनोवाल ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए एनआरसी से अलग डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट कार्यक्रम शुरू किया। इसमें एक लाख से ज्यादा सरकारी कर्मचारी लगाए गए। इस अभियान पर करीब 900 करोड़ रुपए खर्च हुए। इस लिहाज से यह किसी देश में गैरकानूनी तरीके से रहे दूसरे देश के लोगों को वापस भेजने का सबसे बड़ा अभियान भी है।

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