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मायानगरी / 14 साल, 2000 मौतें, ~2800 करोड़ खर्च फिर क्यों हर बारिश में डूब जाती है मुंबई?



14 years, 2000 deaths, 2800 crores spent but why every rain gets drowned in Mumbai?
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14 years, 2000 deaths, 2800 crores spent but why every rain gets drowned in Mumbai?

  • कुर्ला कलिना पुल से सीएसटी पुल तक मीठी नदी को चौड़ा करने का काम नहीं हो पाया है, जिसकी वजह से इस इलाके में सर्वाधिक पानी भरता है
  • मीठी को चौड़ा-गहरा करने पर अब तक मुंबई मनपा और एमएमआरडीए ने लगभग 1400-1500 करोड़ रु खर्च किए, यह ब्रिमस्टोवर्ड प्रोजेक्ट के अतिरिक्त है

Dainik Bhaskar

Jul 07, 2019, 09:38 AM IST

मुंबई. देशभर में भले ही बारिश का इंतजार रहता हो, लेकिन मुंबई पर ये हर साल आफत बनकर बरसती है। मुंबई 3-4 दिन के लिए ठप हो जाती है। मुंबई की यह डरावनी तस्वीर दुनिया ने पहली बार 2005 में देखी थी। उस साल यहां करीब 1000 लोगों की मौत हुई थी। इस बार भी मुंबई दो दिन तक डूबी रही। ऐसे में सवाल उठता है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई हर साल क्यों डूब जाती है? 


भास्कर ने इस बारे में पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अलग-अलग विभागों की रिपोर्ट के अनुसार 2005 के बाद से अब तक इस समस्या पर मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एमएमआरडीए) और मुंबई महानगर पालिका (मनपा)ने केवल नदी, नालों की सफाई और पंपिंग स्टेशन के निर्माण में ही 2815 करोड़ रुपए खर्च कर दिए। जबकि मुंबई की समस्या वैसी ही बनी हुई है। वहीं इससे भी भयावह ये है कि इस तरह की त्रासदी में पिछले 14 सालों में मुंबई में करीब 2000 लोगों की मौत हो चुकी है।


आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल गलगली मीठी नदी और मुंबई के नालों की साफ-सफाई के विषय पर बारीकी से नजर रखते हैं। वे इसके लिए मुंबई मनपा और एमएमआरडीए को ज्यादा जिम्मेदार ठहराते हैं। गलगली कहते हैं कि मुंबई मनपा को ब्रिमस्टोवड प्रोजेक्ट के तहत जिन 58 कार्यों को करना था। उसमें से पंपिंग स्टेशन के कार्य को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर कार्य अधूरे हैं।


अनिल बताते हैं कि मीठी नदी मुंबई को पानी आपूर्ति करने वाली विहार झील से शुरू होकर कुर्ला, साकी नाका, एयरपोर्ट, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों से होते हुए माहिम की खाड़ी के पास अरब सागर में जाकर मिलती है। 26 जुलाई 2005 को जब मुंबई में बाढ़ आई थी, तब उसकी मुख्य वजह मीठी नदी का ओवर फ्लो होकर बहना भी था। इस घटना के बाद ही मुख्य रूप से पूरे शहर को इसकी अहमियत समझ में आई थी। चितले समिति की सिफारिश पर अब तक मीठी नदी की साफ-सफाई, उसे चौड़ा व गहरा करने, उसके आसपास से स्ट्रक्चर को दूसरी जगह स्थानांतरित करने, 4 पुलों के निर्माण सहित अन्य कार्यों पर करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है।


ऐसा नहीं है कि मुंबई मनपा और एमएमआरडीए ने मुंबई को डूबने से बचाने के लिए सिर्फ मीठी नदी पर ही पानी की तरह पैसे बहाए हैं। मुंबई उपनगर को बचाने के लिए 12 किमी लंबी दहिसर नदी, 7 किमी लंबी पोइसर नदी और 7 किमी लंबी ओशिवरा नदी पर भी करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं। इसी तरह 8 स्थानों पर 500 करोड़ रुपए खर्च कर पंपिंग स्टेशन के निर्माण की योजना है, लेकिन अब तक 6 स्थानों पर ही पंपिंग स्टेशन बने हैं।

 

मशहूर टाउन प्लानर चंद्रशेखर प्रभु बेझिझक कहते हैं कि बारिश में मुंबई डूबने के लिए कोई और नहीं, बल्कि हम खुद जिम्मेदार हैं। आप सुबह-सुबह कभी जुहू बीच जाइए। आपको बड़ी संख्या में प्लास्टिक की थैलियां किनारे बहकर आई हुई मिलेंगी। इसलिए कितनी भी मशीनरी इस्तेमाल की जाए, कितना भी पैसा खर्च किया जाए। यदि हर दिन लोग अपने आसपास के नालों में प्लास्टिक की थैलियां फेंकते रहेंगे, तो मुंबई में पानी भरना स्वाभाविक है। इसके लिए हर बार मुंबई मनपा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। प्रभु की बातों पर मीठी नदी के दोनों ओर कांक्रीट की ऊंची दीवार बनाए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल करने वाले बुजुर्ग जनक दफ्तरी भी सहमति व्यक्त करते हैं।

 

उन्होंने कहा, मीठी नदी सहित मुंबई की सभी नदियों और प्रमुख नालों के स्वाभाविक प्रवाह को मनचाहे ढंग से मनपा अधिकारियों ने मोड़ दिया है। पहले जो पानी जमीन के अंदर जाता था वह अब कांक्रीट की बनी सड़कों पर बहने लगा है। सरकार पानी निकासी की क्षमता 25 मिमी प्रति घंटे से बढ़ाकर 50 मिमी करने के लिए विभिन्न योजनाओं को पूरा करने की कोशिश कर तो रही है मगर मुंबई के लोग अपनी जिम्मेदारी का सही ढंग से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। महाराष्ट्र में प्लास्टिक बैन है। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है। लोग इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक को नदियों और नालों में फेंक देते हैं, जिससे पानी की निकासी रुक जाती है। जब कभी मुंबई में उम्मीद से ज्यादा बारिश कम समय में होती है तो पूरा शहर डूब जाता है।
 

2005 से जून 2019 तक मुंबई को डूबने से बचाने के लिए हुए प्रमुख कार्यों पर खर्च

कार्य      खर्च (करोड़ में)
मीठी नदी पर (एमएमआरडीए व मुंबई मनपा)     1,656.75
दहिसर नदी पर   125
पोइसर नदी पर     195
ओशिवरा व वालभट नदी पर   77.50
हाजी अली सहित 6 स्थानों पर पंपिंग स्टेशन पर 653
मुंबई के नालों की सफाई पर   107.8
उपरोक्त प्रमुख कार्यों पर कुल हुआ खर्च 2,815.05

टेबल स्रोत- विभिन्न विभागों की रिपोर्ट और आरटीआई से मिली जानकारी

  • पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान बृहन्मुंबई स्ट्राॅम वाॅटर डिस्पोजल प्रोजेक्ट (ब्रिमस्टोवड) परियोजना पर 1650 करोड़ रुपए के करीब खर्च हो चुके हैं। 
  • मीठी को चौड़ा-गहरा करने पर अब तक मुंबई मनपा और एमएमआरडीए ने लगभग 1400 से 1500 करोड़ रुपए खर्च किए होंगे। यह ब्रिमस्टोवर्ड प्रोजेक्ट के अतिरिक्त है।

 

कैग रिपोर्ट में बताए ये कारण

  • 1. बीएमसी ने जो गटर बनाए हैं वो सपाट बनाए हैं। इससे ज्वार-भाटे का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • 2. गटर मलबे से लबालब भरे रहते हैं, यही कारण है कि जरा सी बारिश में उफनने लगते हैं।
  • 3. पानी की निकासी करने वाली नालियां समुद्र से नीचे हैं, इस कारण उनमें पानी भरा ही रहता है।
  • 4. समुद्र में पानी फेंकने वाली 45 निकास नालियों में से केवल 3 पर दरवाजे हैं, इसलिए जब समुद्र में ज्वार आता है तभी नालियों से ही समुद्री पानी को भीतर आने से रोका जा सकता है।
  • 5. गटरों की क्षमता प्रति घंटा 25 मिमी पानी बाहर निकालने की है जबकि 4 घंटे में 400 मिमी बारिश हुई।

 

जहां होता है सबसे अधिक जल जमाव
कुर्ला कलिना पुल से सीएसटी पुल तक मीठी नदी को चौड़ा करने का काम नहीं हो पाया है। जिसकी वजह से इस इलाके में सर्वाधिक पानी भरता है। 

 

सीवेज का पानी छोड़कर यहां फैलाई जाती है सबसे अधिक गंदगी
एशिया के सबसे बड़ा स्लम धारावी इलाके के डेढ़ हजार से अधिक औद्योगिक ठिकाने मीठी नदी के पास स्थित हैं। जो बड़े पैमाने पर रासायनिक कचरा व सीवेज का पानी इसमें छोड़ते हैं।

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