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नेवी का विद्रोह / 1946: रिन रिवोल्ट के बाद अंग्रेजों ने मान लिया था, भारत छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं



फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, इस दौरान बंबई में बड़ा हिंसक आंदोलन हुआ था। फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, इस दौरान बंबई में बड़ा हिंसक आंदोलन हुआ था।
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फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, इस दौरान बंबई में बड़ा हिंसक आंदोलन हुआ था।फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, इस दौरान बंबई में बड़ा हिंसक आंदोलन हुआ था।

  • 1945-46 में आंदोलनों से डर गए थे अंग्रेज, लोग सेना के समर्थन में सड़कों पर उतरे 
  • नेवी के 20 ऑफिस खाली हो गए थे, करीब 20 हजार जवान इन हड़तालों से जुड़े 
  • विदेशों से रिहा भारतीय सैनिकों पर अंग्रेजों ने चलाया मुकदमा, इससे भड़का जनता का गुस्सा

Dainik Bhaskar

Aug 24, 2019, 04:35 PM IST

जनवरी, फरवरी 1946 में देश में नेवी का एक ऐसा आंदोलन भड़का था, जिसने अंग्रेज हुकुमत को अहसास करा दिया था कि अब भारत छोड़ना ही होगा। ऐसा पहली बार था जब सेना ही सेना के खिलाफ खड़ी हाे गई थी। इसे रिन रिवोल्ट कहा गया था। 
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस के छोटे-बड़े तमाम नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया था। जून 1945 के मध्य में, लड़ाई खत्म होने के एक ही महीने बाद, सारे नेता रिहा होने वाले थे, ताकि वायसरॉय वेवल शिमला समझौते पर आगे बढ़ सकें।

 

जेल से रिहा होने से पहले सारे नेताओं में संशय था कि बाहर निकलते ही उन्हें मायूस जनता मिलेगी और शायद आंदोलन को फिर से खड़ा करने में वक्त लगेगा। आखिर पिछले तीन साल जनता नेतृत्व विहीन थी। लेकिन यह सारे नेता जब जेल से रिहा हुए, तो अचरज की सीमा नहीं थी, क्योंकि इन्होंने अपने स्वागत के लिए जनता रूपी समुद्र को देशभर की सारी जेलों के सामने उमड़ते देखा था। इस बार मामला सेना के आंदोलन का था।

 

1944 से ही भारत के पूर्वी क्षेत्र से भारतीय सैनिक बंदियों के तरीके से देश में लाए जा रहे थे, जिन्हें जापानियों ने रिहा किया था और जो आजाद हिंद फौज से जुड़कर ब्रिटिश सेना के विरुद्ध नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में लड़े थे। वह 1945 की सर्दी थी, जब इन बंदियों पर मुकदमा चलना था और संपूर्ण भारत ब्रिटिश सरकार पर उन्हें रिहा करने के लिए दबाव बना रहा था।


21 नवंबर 1945 को फारवर्ड ब्लॉक, स्टूडेंट फेडरेशन तथा इस्लामिया कॉलेज के विद्यार्थी कलकत्ता में डलहौजी स्क्वैयर, जहां से सरकार काम किया करती थी, वहां धरने के लिए पहुंचे। सरकार ने इन पर लाठियां बरसाईं, जिसके जवाब में विद्यार्थियों ने ईंट-पत्थर बरसा दिए। इस पथराव के जवाब में पुलिस ने विद्यार्थियों पर गोली चलाई, जिसमें दो विद्यार्थियों की मृत्यु हुई और 52 घायल हो गए। 11 फरवरी 1946 को मुस्लिम लीग के विद्यार्थियों ने कांग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा के विद्यार्थियों के साथ मिलकर धर्मतोला स्ट्रीट पर धारा 144 का उल्लंधन किया। यह सब भारत के सैनिकों को रिहा करवाने के लिए हो रहा था। आंदोनल बढ़ता जा रहा था। 

 

जवान ने ‘भारत छाेड़ो’ का नारा दिया तो अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया, इसके बाद भड़क गया सेना का आंदोलन 
18 फरवरी 1946 को 1100 नेवी के जवान जो एचएमआईएस तलवार पर सवार थे, उन्होंने बंबई में विद्रोह कर दिया। बीसी दत्त नामक एक जवान को इस बात के लिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि वह अपने जहाज (तलवार) पर भारत छोड़ो का नारा लगा रहा था। अगले ही दिन कैसल तथा फोर्ट बैरक्स के जवानों ने भी इस विद्रोह का तब साथ दे दिया, जब उन्हें पता चला कि तलवार के जवानों पर सरकार ने गोलियां चलाईं, जो असल में अफवाह थी। वह अपनी पोस्ट से बाहर निकले और ट्रकों-लॉरियों में लोड होकर पूरे बंबई में कांग्रेस का झंडा फहराते घूमते रहे। कभी विदेशियों को धमकाते, कभी पुलिस को डराते और इक्की-दुक्की जगह इन्होंने ऑफिसों के शीशे भी तोड़े।

 

खबर फैली और बंबई-कलकत्ता की जनता इन रॉयल इंडियन नेवी के आंदोलित जवानों के पक्ष में सड़कों पर आ गई। पुलिस स्टेशनों, पोस्ट ऑफिसों, रेलवे तथा ट्राम स्टेशनों, दुकानों और बैंकों को आग के हवाले कर दिया गया और जगह-जगह हड़ताल आयोजित हुई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस विद्रोह जिसे रिन (रॉयल इंडियन नेवी) रिवोल्ट  का नाम दिया गया। अकेले बंबई में 30 दुकानें, 10 डाकघर, 10 पुलिस चौकियां, 64 राशन की दुकानों और 200 बिजली के खंभों को बर्बाद कर दिया गया। पूरी बंबई अचानक रुक-सी गई। 

19 फरवरी तक कराची में नेवी के जवान जो एचएमआईएस हिंदुस्तान पर तैनात थे, वे भी हड़ताल से जुड़ गए। रिन रिवोल्ट आग जैसे फैलते हुए मद्रास, विशाखापट्टनम, कलकत्ता, दिल्ली, कोचीन, जामनगर, अंडमान यहां तक कि बहरीन और ऐडन तक पहुंच गई। 72 जहाज और समुद्र के किनारे पर करीब 20 नेवी के ऑफिस खाली हो गए क्योंकि करीब 20 हजार जवान इन हड़तालों से जुड़ चुके थे। रिन रिवोल्ट ताबूत की आखिरी कील साबित हुआ। पहले आजाद हिंद फौज और फिर रॉयल इंडियन नेवी के जवानों के आंदोलन से जुड़ते ही भारत की जनता जैसे भयमुक्त हो गई थी।

 

इस रिवोल्ट ने आम जनमानस में ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार को भी मानो ये विश्वास दिला दिया था कि अब भारत को आजाद होने से कोई नहीं रोक सकता। यह संयोग नहीं था कि 18 फरवरी 1946 को बंबई में नेवल स्ट्राइक शुरू हुई और 19 फरवरी को ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री क्लिमेंट ऐटली ने संसद में घोषणा की कि भारत में एक कैबिनेट मिशन भेजा जाएगा ताकि भारत की नई सरकार की रूपरेखा पर कांग्रेस से चर्चा हो सके।  इस घोषणा के लिए 19 फरवरी का दिन चौंकाने वाला इसलिए भी था, क्योंकि इस मिशन की रूपरेखा 22 जनवरी 1946 को बना ली गई थी और इसकी घोषणा 1 हफ्ते बाद तय थी। आखिरकार वल्लभ भाई पटेल को जवानों से आत्मसमर्पण का आह्वान करना पड़ा। रिन रिवोल्ट से पहले हर आंदोलन जनता बनाम ब्रिटिश सरकार था। पर रिन रिवोल्ट लड़ाई का वो हिस्सा था जिसमें सरकार की सेना अपनी सरकार के ही खिलाफ खड़ी हो गई हो और यही रिन रिवोल्ट को खास बनाता है। 

 

सेना नमक के कारण राष्ट्रवादी है- वेवल रिपोर्ट
सन 1945 तक आते-आते अंग्रेजों को यह साफ हो गया था कि अब उन्हें भारत छोड़ना ही पड़ेगा। वॉयसराय वेवल ने 31 दिसंबर 1945 को इंग्लैंड के राजा को स्पष्ट लिखा था कि ‘हमें एक ऐसे विद्रोह को टालने के लिए, जो कि सन 1942 से भी भयंकर साबित हो सकता है, कुछ समझौता कर लेना चाहिए।’ वेवल की यह धारणा मिलेट्री खुफिया विभाग की रिपोर्ट पर आधारित थी। ऐसी ही एक रिपोर्ट में वेवल को 26 नवंबर 1945 में बताया गया था कि ‘तनावपूर्ण राजनीतिक वातावरण में एक ऐसा बदलाव अचानक आया है जैसा सन् 1857 के दिनों में था। इस तथ्य से अपनी आंखों को बंद करने से कोई लाभ नहीं होगा कि सेना में प्रत्येक भारतीय अफसर अपने नमक के कारण राष्ट्रवादी है।’ 

 

ग्रंथ साहिब के साथ नेताजी की तस्वीर ने डराया
नवंबर 1945 में गुरू पर्व पर कलकत्ता के गुरुद्वारे में गुरुग्रंथ साहिब के साथ नेताजी की तस्वीर लगा दी गई थी। सभा में लगभग 3 हजार अंग्रेज भारतीय सेना के सिख अफसर और जवान शामिल थे। सैनिक खुफिया विभाग गुरू ग्रंथ साहिब के साथ नेताजी की तस्वीर रखने पर चौंक गया, लेकिन उसे हटाने की हिम्मत न कर सका। देश आजाद हिंद फौज के पीछे खड़ा था। लेकिन मुस्लिम लीग उन मुस्लिम युवकों को धमका रही थी, जो आजाद हिंद फौज के समर्थन जुलूसों में शामिल हुए थे। लीग की धारणा थी कि वह आजाद हिंद फौज का समर्थन कर ही नहीं सकती क्योंकि यदि यह फौज भारत को जीत लेती तो पाकिस्तान की मांग ध्वस्त हो जाती।

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