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हिरासत में हुई मौतों का जिम्मेदार कौन?:देश में एक दशक में न्यायिक और पुलिस हिरासत में रोज 5 लोगों की जान गई, इस साल जनवरी से जुलाई तक 914 मौतें हुईं

नई दिल्लीएक वर्ष पहले
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मानवाधिकार आयोग का कहना है कि वीआईपी कैदियों को जेलों में तमाम सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन आम कैदी दुर्दशा में रहते हैं। - Dainik Bhaskar
मानवाधिकार आयोग का कहना है कि वीआईपी कैदियों को जेलों में तमाम सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन आम कैदी दुर्दशा में रहते हैं।
  • मानवाधिकार आयोग के मुताबिक इस साल 7 महीनों में 914 मौतें हुईं, इनमें पुलिस हिरासत की 53 मौतें हुईं
  • कोरोना महामारी की वजह से देश के कई जेलों में स्थिति और खराब हुई है, साफ-सफाई की भी व्यवस्था नहीं

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में 17 हजार 146 लोगों की न्यायिक और पुलिस हिरासत में जान गई है। इस लिहाज से रोजाना औसतन 5 लोगों की मौत होती है। इनमें से 92 फीसदी मौतें 60 से 90 दिनों की अवधि वाली न्यायिक हिरासत में हुईं। बाकी मौतें पुलिस हिरासत में हुईं, जो 24 घंटे की अवधि की होती है। यह समय कई बार मजिस्ट्रेट के आदेश पर 15 दिन तक बढ़ाया जा सकता है। इस साल जनवरी से जुलाई तक 914 मौतें हुई हैं।

मानवाधिकार आयोग पहले भी समय-समय पर अपनी चिंता जाहिर करता रहा है, लेकिन उसके सुझाव, सिफारिशें और नाराजगी जस की तस बनी हुई हैं और हिरासत में मौतों का ग्राफ चढ़ता ही जा रहा है।

टॉर्चर, पिटाई के अलावा खराब स्वास्थ्य की वजह से भी जाती है जान

आयोग के मुताबिक न्यायिक हिरासत में होने वाली सभी मौतें टॉर्चर, पिटाई और जेलकर्मियों की ज्यादतियों की वजह से नहीं हुईं, बल्कि इनके पीछे कैदियों की बीमारी, इलाज में देरी और उपेक्षा, खराब रहन-सहन, मनोवैज्ञानिक समस्या या वृद्धावस्था जैसे अन्य कारण भी हो सकते हैं। वहीं, इंडिया स्पेंड वेबसाइट पर मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों की मदद से प्रकाशित एक विस्तृत विश्लेषण में दर्ज 17 हजार 146 मौतें, पुलिस और जेल व्यवस्था की कहानी बयां करती हैं।

पिछले महीने तमिलनाडु में जेल में पिता-बेटे की मौत हुई थी

पिछले महीने तमिलनाडु की एक जेल में पुलिस बर्बरता का शिकार बने दलित पिता-पुत्र की मौत ने इस ओर हर किसी का ध्यान खींचा। पूरे देश में इस मामले की गूंज सुनाई दी। इससे पुलिस जवाबदेही की मांग ने जोर पकड़ा। मद्रास हाईकोर्ट ने जांच का आदेश दिया और राज्य सरकार ने मामला सीबीआई को सौंप दिया।

कुचले जा रहे हैं कैदियों के मानवाधिकार

  • मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के मुताबिक ऐसी मौतों की सूचना 24 घंटे में मुहैया करानी होती है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। निर्देशों पर दोहरी मार ये है कि रिपोर्ट पेश न कर पाने की सूरत में दंड का भी कोई प्रावधान नहीं है। इस बारे में जानकारों का कहना है कि पुलिस के पास अपने बचाव की बहुत सी दलीलें रहती हैं।
  • आयोग के निर्देश ये भी कहते हैं कि हिरासत में हुई मौत की मजिस्ट्रेट जांच दो महीने में पूरी करा लेनी चाहिए और इसमें मृत्यु के हालात, तरीके और घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा और मौत की वजह दर्ज होना चाहिए।

वीआईपी कैदियों को तमाम सुविधाएं मिलती हैं

कैदियों के भी मानवाधिकार हैं, ये बात जेल प्रशासन और सरकारें न जाने कैसे भुला बैठती हैं। वीआईपी कैदियों को तमाम सुविधाएं मिलती हैं, लेकिन आम कैदी दुर्दशा में रहते हैं। उनके भोजन, कपड़े, बिस्तर, पीने के पानी, नहाने-धोने, साफ-सफाई, उपचार आदि पर पर्याप्त खर्च न किए जाने की शिकायतें अक्सर सामने आती रही हैं।

कोरोना के बाद जेलों की स्थिति और खराब हुई

हिरासत में मौत का मामला जेलों के चिंताजनक हालात से भी जुड़ा है। अगर कैदियों की मृत्यु दर जेलों में अधिक है तो देखा जाना चाहिए कि उन जगहों पर रहन-सहन और स्वास्थ्य की सुविधाएं कैसी हैं। एक सच्चाई ये भी है कि कोविड महामारी की वजह से देश की कई जेलों की दुर्दशा पर नए सिरे से ध्यान गया है। भीमा कोरेगांव मामले में जेल में बंद 80 वर्षीय जाने-माने तेलुगु कवि वरवर राव कोरोना की चपेट में आ गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

कैदियों में दलित, पिछड़े, मुस्लिम ज्यादा

हिरासत में यातना, उपेक्षा और मौतों के डरावने आंकड़ों के बीच एक चिंताजनक तथ्य ये भी है कि जेलों में बंद कैदियों और विचाराधीन कैदियों में सबसे अधिक संख्या दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों की है। जम्मू कश्मीर जैसे प्रदेश को भी नहीं भूलना चाहिए जहां लापता हो चुके लोगों के परिजन दशकों से इंसाफ के लिए भटकते रहे हैं।

भारत ने यूएन समझौते पर दस्तखत किए, पर पुष्टि नहीं की

  • टॉर्चर और क्रूर, अमानवीय व्यवहार या सजा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में हुए समझौते पर भारत अक्टूबर 1997 में दस्तखत तो कर चुका है, लेकिन विधि आयोग की सिफारिश के बावजूद इसकी पुष्टि उसने नहीं की है।
  • हिरासत में मौतों को लेकर एक मजबूत कानून का न बन पाना भी इस मामले की एक बड़ी पेचीदगी है। राजनीतिक और पुलिस व्यवस्था और ब्यूरोक्रेसी के दबाव अपना काम करते रहते हैं।
  • अक्सर इस मामले में ये दलील भी दी जाती है कि पुलिस पर अनावश्यक दबाव आएगा और अपराधियों को बल मिलेगा, लेकिन एक बेहतर और पारदर्शी व्यवस्था के दावे में ये तर्क नहीं खपता।
  • विशेषज्ञों के मुताबिक पुलिस जांच और पूछताछ की प्रक्रिया इतनी दोषपूर्ण न होती, अगर जांच के वैज्ञानिक तरीके उपलब्ध होते और पुलिस को विशेष रूप से इस काम के लिए प्रशिक्षित किया जाता। एक कारगर फोरेंसिक तकनीक का अभाव भी समस्या है।

पुलिस तंत्र में भी सुधार की जरूरत

  • हिरासत में मौत की घटनाओं के बीच पुलिस के अंदरूनी तंत्र में भी सुधार की जरूरत है, जिसका संबंध भर्तियों से लेकर वेतन विसंगतियों, पदोन्नति, और अन्य सुविधाओं से जुड़ा है।
  • पुलिसबल में कमी का असर पुलिसकर्मियों के कामकाज पर भी पड़ता है, इन सबका अर्थ ये नहीं है कि वे अपनी खीझ या हताशा गरीब, कमजोर और बेसहारा कैदियों पर निकालें।
  • जेल सुधारों के लिए नियम कायदे बनाने के अलावा उच्च अधिकारियों और उनके मातहतों में मानवाधिकारों के प्रति संवेदना और सजगता भी जरूरी है। मानवाधिकार आयोगों को भी और अधिकार संपन्न और प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
  • औपनिवेशिक दौर के पुलिस एक्ट को बदल कर पुलिस अफसरशाही के ढांचे में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है। इस ढांचे को पुलिस की अंदरूनी जरूरतों के हिसाब से ढालना होगा न कि सरकारों और राजनीतिक दलों के हितों के हिसाब से। आखिरकार पुलिसकर्मी नागरिकों के रखवाले हैं, उन पर जुल्म ढाने वाले एजेंट नहीं।
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