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कोरोना के सही आंकड़े नहीं बता रहीं सरकारें:भारत में महामारी से मौतों की वास्तविक संख्या 5 गुना अधिक, डेटा छिपाने के लिए राज्य सरकारों पर केंद्र का दबाव

5 महीने पहलेलेखक: जेफ्री जेंटलमैन/समीर यासिर/हरिकुमार/सुहासिनी राज
भारत में फैले वायरस के नए स्वरूप ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर संकट में बदल चुकी है। अस्पताल भर चुके हैं, ऑक्सीजन सप्लाई कम पड़ रही है, मरीज डॉक्टरों का इंतजार करते हुए दम तोड़ रहे हैं। मृतकों की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से बहुत ज्यादा है। दुनिया के लगभग आधे नए केस भारत में मिल रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है, 'यह संख्या विचलित करती है, फिर भी वायरस के फैलाव की सही स्थिति नहीं दिखाई जा रही है। डेटा छिपाने के लिए राज्यों पर केंद्र सरकार का दबाव है।' इधर, वैज्ञानिक इस बात को लेकिर चिंतित हैं कि भारत में वायरस के नए स्वरूप अधिक घातक हो सकते हैं। वैक्सीन का ज्यादा प्रतिरोध भी कर सकते हैं। नए मरीजों की तेज बढ़ोतरी के पीछे वायरस के नए स्वरूप की भूमिका हो सकती है।

बड़ी संख्या में मौतों की अनदेखी हो रही
देश के विभिन्न स्थानों पर श्मशान घाटों में लोगों से हुई बातचीत से पता लगता है कि मौतों की सही संख्या सरकारी आंकड़ों से बहुत ज्यादा है। कुल मौतों का आंकड़ा 2 लाख के करीब पहुंचने की सरकारी जानकारी संदिग्ध है। विश्लेषकों का कहना है कि नेता और प्रशासक बड़ी संख्या में मौतों की अनदेखी करते हैं या गिनती कम कर रहे हैं।

परिजन भी शर्म के मारे जानकारी छिपा रहे
परिजन भी शर्म के मारे कोरोना से मौतों की जानकारी छिपाते हैं। कभी न बंद होने वाले इंडस्ट्रियल प्लांट की तरह अहमदाबाद में एक बड़े विश्राम घाट में चौबीसों घंटे चिताएं जल रही हैं। वहां काम करने वाले सुरेशभाई बताते हैं कि उन्होंने पहले कभी मौतों का ऐसा अंतहीन सिलसिला नहीं देखा, लेकिन वे मृतकों के परिजनों को जो पेपर स्लिप देते हैं, उसमें मृत्यु का कारण नहीं लिखते। वे कहते हैं कि अधिकारियों ने ऐसा करने के निर्देश दिए हैं।

लापरवाही से बने ऐसे हालात
भारत की स्थिति पर गहराई से नजर रखने वाली मिशिगन यूनिवर्सिटी की महामारी विशेषज्ञ भ्रमर मुखर्जी का कहना है कि यह पूरी तरह से आंकड़ों का संहार है। हमने जितने मॉडल बनाए हैं, उसके आधार पर हमारा विश्वास है कि भारत में बताई जा रही संख्या से दो से पांच गुना तक अधिक मौतें हुई हैं। कुछ माह पहले भारत में स्थिति अच्छी थी। यह सोचकर कि बुरे दिन बीत गए, अधिकारियों और नागरिकों ने सावधानी बरतना छोड़ दिया।

अब तक सिर्फ 10% भारतीयों को वैक्सीनेशन
अब अनगिनत भारतीय सोशल मीडिया पर अस्पताल, बेड, दवाइयों और सांस लेने के लिए ऑक्सीजन दिलाने के हृदयविदारक मैसेज कर रहे हैं। अखबार नेशनल इमरजेंसी जैसी हेडलाइन लगा रहे हैं। देशभर में सामूहिक अंतिम संस्कार हो रहे हैं। कई बार दर्जनों चिताएं एक साथ धधकती हैं। जबकि दूसरी ओर, भारत का वैक्सीन लगाने का अभियान घिसट रहा है। विश्व का प्रमुख वैक्सीन निर्माता होने के बावजूद अब तक सिर्फ 10% भारतीयों को ही वैक्सीन लग पाई है।

भोपाल : 13 दिन में एक हजार मौतें, बताई 41, सरकार ने हर बार मौतें छिपाईं, भास्कर ने बार-बार सच बताया
(भास्कर भी मौत के आंकड़े छिपाने का खुलासा कर चुका है। हम श्मशान में कोविड प्रोटोकॉल से हुए अंतिम संस्कार और सरकार के दिए मौत के आंकड़ों की गड़बड़ी बार-बार सामने लाए हैं। अब दुनिया के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भोपाल में मौत के आंकड़ों में इसी गड़बड़ी पर रिपोर्ट की है।)

गैस त्रासदी झेल चुके भोपाल के लोग बताते हैं कि उस हादसे के बाद श्मशान घाट पहली बार इतने व्यस्त हैं। अप्रैल मध्य के 13 दिनों में भोपाल में अधिकारियों ने कोरोना से 41 मौतें होने की जानकारी दी। न्यूयार्क टाइम्स द्वारा शहर के विश्रामघाटों और कब्रिस्तानों में किए गए सर्वे से पता लगा कि इस अवधि में एक हजार से ज्यादा अंतिम संस्कार कोविड प्रोटोकॉल के तहत हुए हैं।

UP और गुजरात की भी यही स्थिति
कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉ. जीसी गौतम कहते हैं कि अधिकारी ऐसा कर रहे हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि लोगों में दहशत फैले। यही स्थिति उत्तर प्रदेश और गुजरात की है। यहां अप्रैल मध्य में अधिकारियों ने हर दिन क्रमश: औसतन 73 और 121 मौतें बताईं। जबकि गुजरात के विश्रामघाटों और कब्रिस्तानों में रोज औसतन 610 कोरोना मरीजों के शव पहुंचे।

छत्तीसगढ़ : जिले के आंकड़े सरकार से अलग
एक उदाहरण कांग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़ का है। दुर्ग जिले में अधिकारियों ने 15 से 21 अप्रैल के बीच कोरोना से 150 से अधिक मौतों की जानकारी दी थी। राज्य सरकार ने दुर्ग में मौतों की संख्या आधी से कम बताई। इस पर स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव कहते हैं कि हमने पारदर्शिता बरतने की कोशिश की है। हम किसी भी समय सुधार करने के लिए तैयार हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मौतें छिपाने के पीछे राजनीतिक एजेंडा भी हो सकता है।

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