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आज का इतिहास:524 साल पहले भारत की खोज के लिए निकले थे वास्को डी गामा, केरल के कालीकट तट पर पहुंचने में लगे थे 11 महीने

3 महीने पहले
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1497 में आज ही के दिन वास्को डी गामा अपनी पहली भारत यात्रा पर निकले थे। 4 विशाल जहाजों और सैकड़ों नौकाओं के साथ 170 लोगों को लेकर निकले वास्को डी गामा को भारत पहुंचने में करीब 11 महीने लग गए। इसी के साथ वास्को डी गामा ने यूरोप से भारत पहुंचने का समुद्री रास्ता खोज लिया था। पुर्तगालियों के लिए ये एक बड़ी उपलब्धि थी।

दरअसल भारत की चाय और मसाले हमेशा से पूरी दुनिया में प्रसिद्ध रहे हैं। उस समय भी यूरोपीय देश भारत के मसालों और चाय का इस्तेमाल करते थे। भारत से ये सामान अरब देशों से होते हुए यूरोप पहुंचता था। अरब देशों ने यूरोपीय देशों को कभी भी ये नहीं बताया था कि ये सामान आता कहां से है। अरबों के लिए ये कमाई का एक बड़ा जरिया था।

यूरोपीय लोगों को पता तो था कि दूर कहीं भारत है, लेकिन वहां पहुंचने का समुद्री रास्ता नहीं पता था। अरब देशों से होते हुए भारत नहींं पहुंचा जा सकता था इसलिए यूरोपीय लोग समुद्र से भारत पहुंचने का रास्ता तलाशने लगे।

इटली के क्रिस्टोफर कोलंबस सबसे पहले भारत पहुंचने का समुद्री रास्ता पता करने निकले, लेकिन अटलांटिक महासागर में भटक गए और अमेरिका पहुंच गए।

इसके 5 साल बाद वास्को डी गामा भारत पहुंचने का समुद्री रास्ता खोजने निकल पड़े। उनके साथ एक बड़ा काफिला था जिसमें सफर के लिए जरूरी सामान और बाकी चीजों को रखा गया। सफर के दौरान स्थानीय लोगों से बातचीत के लिए 3 भाषाविद भी साथ रखे गए, जिनमें से 2 अरबी बोलते थे और एक अफ्रीका की बांटु भाषा बोलता था। रास्ते की निशानदेही के लिए अपने साथ बड़े-बड़े पत्थरों के पिलर भी रखे गए।

वास्को डी गामा।
वास्को डी गामा।

वास्को डी गामा एक बेहतरीन कप्तान थे और उन्हें समुद्री रास्तों की बढ़िया जानकारी थी। 26 जुलाई को डी गामा का काफिला सैंटियागो पहुंच गया। यहां एक हफ्ते आराम किया। महीनों तक सफर जारी रहा और नवंबर में कैप ऑफ गुड होप से होते हुए काफिला हिंद महासागर में दाखिल हुआ। इतने लंबे और थका देने वाले सफर में उनके कई साथी बीमार भी पड़ गए, कई मारे गए और उनका खाने का सामान भी खत्‍म होने लगा था। इसको देखते हुए वास्को डी गामा ने मोजांबिक में रुकने का फैसला किया। यहां नावों की मरम्मत की गई और खाने का सामान इकट्ठा किया गया। कहा जाता है कि मोजांबिक के सुल्‍तान को उन्‍होंने कई बेशकीमती तोहफे दिए जिसके बदले सुल्तान ने उन्हें 2 नाविक दिए, जिन्हें भारत तक के समुद्री रास्तों की जानकारी थी।

अप्रैल तक काफिला केन्या पहुंच चुका था। आखिरकार लंबे सफर के बाद 20 मई 1498 को वास्‍को डी गामा ने भारत के कालीकट की धरती को छुआ।

यहां पर वो कालीकट के राजा से मिले और उसको व्‍यापार के लिए राजी किया, लेकिन मुस्लिम व्यापारियों ने वास्को का विरोध किया जिसका नतीजा ये हुआ कि तीन महीने में ही उन्हें वापस पुर्तगाल लौटना पड़ा। अगस्त में जब काफिला पुर्तगाल के लिए चला तो बेहद खराब मौसम की वजह से 170 में से केवल 55 लोग ही जिंदा बचे।

इसके बाद वास्को डी गामा दो बार और भारत आए। अपने तीसरे और आखिरी दौरे के दौरान ही उनकी तबीयत खराब हो गई और 24 मई 1524 को निधन हो गया। वास्को डी गामा के शव को कोच्चि में ही दफनाया गया। 1538 में उनकी कब्र को खोदकर उसके अवशेषों को बाहर निकाला गया और पुर्तगाल ले जाया गया।

1954: भाखड़ा नहर परियोजना का उद्घाटन

हिमाचल के भाखड़ा में एक तेंदुए का पीछा करते हुए ब्रिटिश जनरल लुई डेन सतलज नदी की तराई में पहुंच गए थे। यहां पर जब उन्होंने सतलज नदी के बहाव को देखा तो सोचा कि इसका इस्तेमाल तो बिजली बनाने में किया जा सकता है।

1908 में उन्होंने इसके लिए ब्रिटिश सरकार को एक प्रस्ताव भेजा, लेकिन सरकार ने पैसों की कमी का हवाला देते हुए मना कर दिया। इसके करीब 10 साल बाद तत्कालीन चीफ इंजीनियर एफ.ई. वैदर के प्रयासों से एक विस्तृत रिपोर्ट बनाई गई, जिसमें 395 फीट ऊंचा बांध बनाने का प्रस्ताव था।

इस बांध को रोपड़ से करीब 69 किलोमीटर दूर बनाया जाना था। अभी तक बांध को बनाने का उद्देश्य केवल सिंचाई के लिए पानी रोकना ही था। इस दौरान कई बार प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनती रही लेकिन हर बार किसी वजह से पास न हो सकी। आखिरकार 1948 में प्रोजेक्ट रिपोर्ट पास हो पाई। इस रिपोर्ट में भाखड़ा डैम, नांगल डैम और नहरों को बनाने का प्रस्ताव था।

1951 में प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ। अमेरिका से इंजीनियरों की टीम बुलाई गई। फैसला लिया गया कि पहले नहर बनाई जाएगी ताकि किसानों को जल्द से जल्द सिंचाई के लिए पानी मिल सके। सामान लाने ले जाने के लिए रोपड़ से नांगल तक 60 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाई गई, सड़कें भी बनाई गईं और 50 बेड का एक अस्पताल भी बनाया गया।

8 जुलाई 1954 को प्रधानमंत्री नेहरू ने डैम का उद्घाटन किया था।
8 जुलाई 1954 को प्रधानमंत्री नेहरू ने डैम का उद्घाटन किया था।

कहा जाता है कि भाखड़ा-नांगल नहर परियोजना पर पंडित नेहरू को बेहद गर्व था। उन्‍होंने इसके निर्माण के दौरान परियोजना का 10 बार दौरा किया। आज ही के दिन 1954 में नेहरू ने इस परियोजना का उद्घाटन किया था।

आज पेरिस का जन्मदिन

आज फ्रांस की खूबसूरत राजधानी पेरिस का जन्मदिन है। माना जाता है कि आज ही के दिन 250 BC में पेरिस की स्थापना हुई थी। पैरिसी जनजाति के कुछ लोग 250 BC के आसपास सीन नदी के किनारे पर आकर बसे थे। ये नदी फिलहाल पेरिस से होकर गुजरती है।

एफिल टॉवर को देखने हर साल लाखों टूरिस्ट पेरिस पहुंचते हैं।
एफिल टॉवर को देखने हर साल लाखों टूरिस्ट पेरिस पहुंचते हैं।

धीरे-धीरे नदी किनारे इन लोगों की आबादी बढ़ती गई और जनजाति के नाम पर ही इस इलाके को पेरिस पुकारा जाने लगा। 15 से 17वीं शताब्दी के दौरान पेरिस कला, आर्किटेक्चर और विज्ञान के केंद्र के तौर पर उभरा। 18वीं शताब्दी के मध्य में नेपोलियन तृतीय ने पेरिस को मॉडर्न तरीके से बसाने का फैसला लिया, जिसकी जिम्मेदारी इंजीनियर और प्लानर जॉर्ज यूजीन को दी गई।

हाल के पेरिस में कई चीजें यूजीन की प्लानिंग के तहत ही बनी हैं। आज पेरिस दुनिया के खूबसूरत शहरों में गिना जाता है।

8 जुलाई के दिन को इतिहास में और किन-किन घटनाओं की वजह से याद किया जाता है…

2007: 42 साल बाद भारत-बांग्लादेश के बीच रेल यातायात शुरू हुआ। 1965 के बाद से दोनों देशों के बीच रेल यातायात बंद था।

2007: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का निधन हुआ।

1994: अपने पिता के निधन के बाद किम जोंग उन ने नॉर्थ कोरिया के सुप्रीम लीडर का पद संभाला।

1889: अमेरिकी अखबार 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' की शुरुआत हुई। आज हर दिन इसकी 20 लाख प्रतियां बिकती हैं।