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आज का इतिहास:आदिवासियों के भगवान बिरसा की आज पुण्यतिथि, 25 साल की उम्र में ही अंग्रेजों ने धीमा जहर देकर मार दिया था

2 महीने पहले
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जल, जंगल और जमीन को लेकर आदिवासियों का संघर्ष सदियों पुराना है और आज भी चला आ रहा है। ऐसे ही एक विद्रोह के जनक की आज पुण्यतिथि है। आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा का आज ही के दिन साल 1900 में रांची की जेल में निधन हो गया था।

बिरसा मुंडा की उम्र भले ही छोटी थी, लेकिन कम उम्र में ही वे आदिवासियों के भगवान बन गए थे। 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों द्वारा लागू की गई जमींदारी और राजस्व-व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई छेड़ी। बिरसा ने सूदखोर महाजनों के खिलाफ भी बगावत की। ये महाजन कर्ज के बदले आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर लेते थे। बिरसा मुंडा के निधन तक चला ये विद्रोह 'उलगुलान' नाम से जाना जाता है।

औपनिवेशिक शक्तियों की संसाधनों से भरपूर जंगलों पर हमेशा से नजर थी और आदिवासी जंगलों को अपनी जननी मानते हैं। इसी वजह से जब ब्रिटिशर्स ने इन जंगलों को हथियाने की कोशिशें शुरू कीं तो आदिवासियों में असंतोष पनपने लगा।

ब्रिटिश लोगों ने आदिवासी कबीलों के सरदारों को महाजन का दर्जा दिया और लगान के नए नियम लागू किए। नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे आदिवासी कर्ज के जाल में फंसने लगे। उनकी जमीन भी उनके हाथों से जाने लगी। दूसरी ओर, अंग्रेजों ने इंडियन फॉरेस्ट एक्ट पास कर जंगलों पर कब्जा कर लिया। खेती करने के तरीकों पर बंदिशें लगाई जाने लगीं।

आदिवासियों का धैर्य जवाब देने लगा था। तभी उन्हें बिरसा मुंडा के रूप में अपना नायक मिला। 1895 तक बिरसा मुंडा आदिवासियों के बीच बड़ा नाम बन गए थे। लोग उन्हें 'धरती बाबा' नाम से पुकारने लगे। बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को दमनकारी शक्तियों के खिलाफ संगठित किया। अंग्रेजों और आदिवासियों में हिंसक झड़पें होने लगीं। अगस्त 1897 में बिरसा ने अपने साथ करीब 400 आदिवासियों को लेकर एक थाने पर हमला बोल दिया। जनवरी 1900 में मुंडा और अंग्रेजों के बीच आखिरी लड़ाई हुई। रांची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई इस लड़ाई में हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजों का सामना किया, लेकिन तोप और बंदूकों के सामने तीर-कमान जवाब देने लगे। बहुत से लोग मारे गए और कई लोगों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया।

बिरसा पर अंग्रेजों ने 500 रुपए का इनाम रखा था। उस समय के हिसाब से ये रकम काफी ज्यादा थी। कहा जाता है कि बिरसा की ही पहचान के लोगों ने 500 रुपए के लालच में उनके छिपे होने की सूचना पुलिस को दे दी। आखिरकार बिरसा चक्रधरपुर से गिरफ्तार कर लिए गए।

अंग्रेजों ने उन्हें रांची की जेल में कैद कर दिया। कहा जाता है कि यहां उनको धीमा जहर दिया गया। इसके चलते 9 जून 1900 को वे शहीद हो गए।

एमएफ हुसैन का निधन 9 जून 2011 को हुआ था। साल 2000 में उन्होंने माधुरी दीक्षित को लेकर ‘गजगामिनी’ फिल्म बनाई थी।
एमएफ हुसैन का निधन 9 जून 2011 को हुआ था। साल 2000 में उन्होंने माधुरी दीक्षित को लेकर ‘गजगामिनी’ फिल्म बनाई थी।

2011: मकबूल फिदा हुसैन का निधन

चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन का निधन आज ही के दिन साल 2011 में हुआ था। उनका जन्म महाराष्ट्र के पंढरपुर में 17 सितंबर 1915 को हुआ था। पढ़ाई के लिए वे पंढरपुर से इंदौर आ गए। यहां से शुरुआती पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के लिए वो मुंबई चले गए। 1935 में उन्होंने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया।

फिल्म सिटी मुंबई में हुसैन का करियर भी फिल्मों के बैनर, पोस्टर और होर्डिंग बनाने से शुरू हुआ। धीरे-धीरे हुसैन प्रसिद्धि पाने लगे। 1947 में बॉम्बे आर्ट सोसायटी की एग्जीबिशन में हुसैन की पेंटिंग ‘सुनहरा संसार’ प्रदर्शित की गई। इसके बाद जगह-जगह हुसैन की पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगने लगीं।

1952 में पहली बार ज्यूरिख में उनके चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित की गई। ये विदेश में उनकी पहली प्रदर्शनी थी। इसके बाद भारत के साथ-साथ हुसैन विदेश में भी प्रसिद्ध होने लगे। 1991 में हुसैन को पद्म विभूषण से नवाजा गया। इससे पहले उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका था। भारत सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य भी बनाया।

90 के दशक में हुसैन अपने करियर के पीक पर थे। उनकी एक पेंटिंग लाखों में बिकती थी, लेकिन इसी समय विवादों के साथ भी उनका नाम जुड़ गया। 1996 में ‘विचार मीमांसा’ नामक एक मैगजीन में हुसैन के बनाए कुछ चित्र छपे। मैगजीन ने इन चित्रों का शीर्षक दिया 'मकबूल फिदा हुसैन- पेंटर या कसाई'। इन चित्रों में अपमानजनक तौर पर हिन्दू देवी-देवताओं को दिखाया गया था। इसके विरोध में देशभर में हुसैन के खिलाफ प्रदर्शन हुए, FIR दर्ज हुई और उनके घर पर तोड़फोड़ भी की गई।

यहां से हुसैन और विवाद एक-दूसरे के पर्याय बन गए। 2004 में एम एफ हुसैन की मीनाक्षी नाम से फिल्म आई। इस फिल्म के एक गीत पर खासा विवाद हुआ। मुस्लिम संगठनों ने गीत के बोल को ईशनिंदा माना और फिल्म में से गीत को हटाने की मांग की।

साल 2006 में एक मैगजीन के कवर पेज पर हुसैन का बनाया एक चित्र छपा, जिसमें भारत के नक्शे पर एक नग्न युवती को लेटा दिखाया गया। इस पर भी खासा विवाद हुआ। इन विवादों के बीच हुसैन ने भारत छोड़ दिया। वे लंदन और दोहा में निर्वासित जीवन बिताने लगे। 2010 में उन्हें कतर की नागरिकता मिल गई। आज ही के दिन 2011 में लंदन में उनका निधन हो गया।

1934: पहली बार पर्दे पर आया ‘डोनाल्ड डक’

मिकी माउस के बाद डिज्नी का दूसरा सबसे फेमस कार्टून कैरेक्टर डोनाल्ड डक आज ही के दिन पहली बार दर्शकों के सामने आया था। साल 1934 में डिज्नी ने ‘द वाइज लिटिल हेन’ नाम से एनिमेटेड फिल्म रिलीज की थी, इसी फिल्म में डोनाल्ड डक को पहली बार दर्शकों ने देखा था। क्लारेंस नैश ने डोनाल्ड डक को अपनी आवाज दी थी।

डोनाल्ड डक को अपनी आवाज देने वाले क्लारेंस नैश।
डोनाल्ड डक को अपनी आवाज देने वाले क्लारेंस नैश।

कहा जाता है कि डिज्नी को डोनाल्ड डक बनाने का आइडिया क्लारेंस नैश की आवाज सुनकर आया। क्लारेंस नैश अजीब आवाज में “मेरी हैड अ लिटिल लेंब” कविता गा रहे थे। वॉल्ट को लगा कि ये आवाज डक की आवाज से मिलती-जुलती है। उन्होंने इस आवाज के लिए एक डक का कैरेक्टर बनाने का फैसला लिया।

अपनी बेवकूफी भरी हरकतों और गुस्सैल मिजाज की वजह से जल्द ही डोनाल्ड डक दर्शकों में लोकप्रिय हो गया। अगले दो दशकों में ही डोनाल्ड डक 100 से भी ज्यादा फिल्मों में नजर आया। मिकी माउस के बाद डोनाल्ड डक को डिज्नी का सबसे सफल कार्टून कैरेक्टर माना जाता है।

9 जून के दिन को इतिहास में इन महत्वपूर्ण घटनाओं की वजह से भी याद किया जाता है...

2008: फिल्म ‘चक दे इंडिया’ के लिए अभिनेता शाहरुख खान को नौवें आईफा पुरस्कार समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला।

1983: यूके में हुए चुनावों में मार्गरेट थैचर की कंजर्वेटिव पार्टी को जीत मिली। ये पार्टी को मिली लगातार दूसरी जीत थी।

1975: ब्रिटिश पार्लियामेंट ने सदन की कार्यवाही का रेडियो पर लाइव प्रसारण शुरू किया।

1960: चीन में आए चक्रवाती तूफान मैरी के कारण 1600 लोगों की मौत हो गई।

1959: अमेरिका ने यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन सबमरीन को लॉन्च किया। न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल से लैस ये दुनिया की पहली सबमरीन थी।