भास्कर पड़ताल / पीड़ित बच्ची पढ़ी-लिखी हो तो आरोपी को पॉक्सो एक्ट में सजा दिलाना आसान



accused is easy to punish in Pocso Act if victim is literate
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accused is easy to punish in Pocso Act if victim is literate

  • बच्ची पढ़ी-लिखी है और उनके पास इसका रिकॉर्ड है, तो वे खुद को नाबालिग साबित करने में सफल रहीं
  • निरक्षर बच्ची की उम्र पता करने के लिए मेडिकल चेकअप में आरोपी को संदेह का लाभ मिल जाता है

Dainik Bhaskar

Jul 20, 2019, 11:52 PM IST

जोधपुर (भंवर जांगिड़). नाबालिग बच्चियों के दुष्कर्मियों को सख्त सजा देने के लिए पॉक्सो जैसा कड़ा कानून बनाया गया है। लेकिन यह तब कारगर है जब केस में पीड़ित नाबालिग साबित हो। इसलिए पॉक्सो के हर केस में आरोपियों का पूरा जोर पीड़ित को बालिग साबित करने पर ही रहता है।

 

भास्कर ने पॉक्सो के बीस केस की पड़ताल की तो पता चला कि जो पीड़ित बच्चियां पढ़ी-लिखी हैं और उनके पास इसका रिकॉर्ड है, वे खुद को नाबालिग साबित करने में सफल हुई हैं। हमने पॉक्सो की जोधपुर महानगर, जिला व जैसलमेर-बाड़मेर अदालतों में पिछले दो महीनों में हुए बीस फैसलों की स्टडी की है।

 

दरअसल, कानूनन बालिग साबित करने के लिए सबसे पहले 10वीं की मार्कशीट देखी जाती है। वह नहीं हो तो पहली कक्षा में प्रवेश का रिकॉर्ड होना चाहिए। फिर नगर पालिका-निगम व पंचायत का जन्म रजिस्टर चेक किया जाता है। इनमें से कुछ भी नहीं हो तो आखिर में मेडिकल जांच होती है। लेकिन उसमें जो भी उम्र बताई जाती है, उसमें ओपिनियन दिया जाता है कि दो साल प्लस-माइनस हो सकता है। ऐसी स्थिति में आरोपी को संदेह का लाभ मिलता है।

 

गुरुकुल में पढ़ने वाली छात्रा से दुष्कर्म करने के मामले में आसाराम को उम्रकैद हुई है। उसे सजा दिलाने वाले पीड़िता के वकील पीसी सोलंकी का कहना है कि बेटियों को पढ़ाना जरूरी है। यह बढ़ते यौन हमलों व दुष्कर्म के केस में भी जरूरी हो गया है। आसाराम की ओर से आए बड़े-बड़े वकीलों का एकमात्र प्रयास था कि किसी तरह पीड़िता बालिग साबित हो जाए। उन्होंने एजुकेशन के फर्जी दस्तावेज भी प्रस्तुत किए, परंतु पीड़िता के असली दस्तावेजों के आगे सभी हार गए। अगर बच्ची पढ़ी-लिखी नहीं होती तो बचाव पक्ष मेडिकल जांच कराता और आसाराम को संदेह का लाभ दिला कर दोष मुक्त करवा देता।

 

इन चार मामलों से समझें उम्र के दस्तावेज कैसे मदद करते हैं?


1). पंचायत में रजिस्ट्रेशन नहीं था इसलिए पॉक्सो नहीं लग पाया
जैसलमेर के फलसूंड में एक झाड़-फूंक करने वाले ने बालिका से दुष्कर्म का प्रयास किया। पॉक्सो में केस दर्ज हुआ। आरोपी के पक्ष के लोगों ने पंचायत बैठाकर गलती के लिए माफी मंगवा दी। साथ ही पीड़िता पर बयान बदलने का दबाव बनाया। पीड़िता 8वीं में पढ़ रही थी, इसलिए 10वीं की मार्कशीट होनी नहीं थी। कक्षा 8 में प्रवेश की जन्मतिथि के अनुसार वह नाबालिग थी, परंतु पहली कक्षा में प्रवेश का रिकॉर्ड ही नहीं था। क्योंकि यहां तो वह 7वीं पास कर भर्ती हुई थी, पिछला रिकॉर्ड कहीं मिला नहीं। फिर मां-पिता ने कहा कि जन्म के समय उन्होंने पालिका-पंचायत में जन्म रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराया था। आखिर में आरोपी को संदेह का लाभ मिला और पॉक्सो के अपराध से दोष मुक्त हो गया।


2). उम्र के दस्तावेज नहीं होने से आरोपी को संदेह का लाभ मिला
राजस्थान के देचू से अपहरण कर एक बालिका को जोधपुर लाया गया। कमरे में बंधक बनाकर आरोपियों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। विशिष्ट लोक अभियोजक ने बताया कि पीड़िता नाबालिग थी, ऑसिफिकेशन टेस्ट में उसकी उम्र 15 से 17 वर्ष आई है। बच्ची के पास जन्म संबंधी दस्तावेज नहीं हैं। पीड़िता भी पढ़ी-लिखी नहीं थी। उसने खुद को 20 साल का बता दिया था। इसमें भी संदेह का लाभ लेकर आरोपी दोषमुक्त हो गए।


3). 10वीं की मार्कशीट थी, इसलिए नाबालिग माना
जोधपुर के पास के कुड़ी भगतासनी से एक बालिका का अपहरण हो गया। उसे महाराष्ट्र के रत्नागिरि में बंधक बनाकर दुष्कर्म किया गया। एक ही समाज का मामला होने के कारण सामाजिक दबाव में पीड़िता ने बयान बदले और कहा कि वह अपनी मर्जी से शादी करने गई थी। मगर पीड़िता 11वीं में पढ़ती थी, इसलिए 10वीं की मार्कशीट में उसकी जन्मतिथि 6 अगस्त 1997 लिखी हुई थी। इस हिसाब से घटना के वक्त वह नाबालिग साबित हो गई। लड़की के नाबालिग होने के कारण आरोपी को सजा सुनाई गई और ऊपरी अदालत में उसकी अपील भी खारिज हुई।


4). नौकरी करती थी, लेकिन दस्तावेज से नाबालिग साबित हुई
बालेसर का दो साल पुराना मामला भी ऐसा ही है। वहां प्राइवेट जॉब करने वाली बालिका को उसका रिश्तेदार अश्लील फोटो खींचकर ब्लैकमेल करता था। उसे डराकर जोधपुर और जयपुर ले गया। वहां दुष्कर्म किया। जयपुर से निकलते वक्त उसे रिश्तेदारों ने पकड़ लिया। कोर्ट में आरोपी ने पूरी ताकत से यह बताने का प्रयास किया कि दोनों में प्रेम-संबंध था। लड़की ने ही शादी के लिए दबाव बनाया था। लड़की 18 साल की थी तभी तो वह जॉब कर रही थी। लड़की की मेडिकल जांच करवा लो, उम्र का पता चल जाएगा। मगर एजुकेशन सर्टिफिकेट से पीड़िता नाबालिग साबित हुई और आरोपी को सजा मिल गई, अन्यथा मेडिकल जांच में वह दोष मुक्त हो सकता था।

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