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नक्सलवाद कितना असरदार:हर हमले के बाद खात्मे का दावा करती है सरकार, लेकिन बीजापुर अटैक दे रहा है नक्सलियों की मजबूती का सबूत

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: हेमंत अत्री
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बीजापुर नक्सल अटैक के बाद सरकार ने हमेशा की तरह फिर से दावा किया है कि अब निर्णायक लड़ाई होगी। नक्सलवाद का खात्मा जल्द कर दिया जाएगा। इस दावे की वास्तविकता क्या है? देशभर में नक्सली कितने प्रभावी हैं? 7 पॉइंट में जानिए दावे और हकीकत..

1. समाज की सोच और नक्सलवाद का मकसद
समाज के कई वर्ग, खासतौर पर युवा पीढ़ी माओवादियों के बारे में रोमांटिक भ्रम रखती है। ये भ्रम इन वर्गों में नक्सलियों की विचारधारा को लेकर आधी-अधूरी समझ से पैदा होता है। दरअसल, माओवादी विचारधारा का मूल हिंसा है। देश के अलग-अलग राज्यों में कई माओवादी संगठन एक्टिव हैं, पर मौजूदा समय में सबसे बड़ा नक्सल संगठन सीपीआई माओइस्ट है। यही सबसे ज्यादा हिंसक वारदातों को अंजाम देता है। ये 2004 सितंबर में पीपुल्स वार और MCC के मर्जर के बाद बना था। माओवाद का असल मकसद मौजूदा लोकतांत्रिक ढांचे को खत्म कर नई लोकतांत्रिक क्रांति को शुरू करना है। अभी नक्सली आंध्र, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और वेस्ट बंगाल के 90 जिलों में हैं। इनमें से 7 जिले नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इनके अलावा 37 जिले मध्यम प्रभावित और 46 मामूली रूप से प्रभावित हैं।

2. दावा प्रभाव कम करने का, पर हमले बताते हैं दावा गलत
प्रभावित इलाकों में नक्सलियों की ओवर ग्राउंड और अंडर ग्राउंड माओवादी गतिविधियों का विश्लेषण किया जाए तो सरसरी तौर पर उनका प्रभाव कम होता दिखता है। 4 फरवरी, 2020 को मिनिस्टर ऑफ स्टेट जी कृष्णा रेड्डी ने भी लोकसभा में बताया कि पिछले कुछ सालों में नक्सली घटनाओं में कमी आई है। उनका दायरा भी घटा है। पर इस तरह के रुझान भ्रामक साबित होते हैं। खासतौर से 3 अप्रैल को हुए हमले और पिछले कुछ सालों में हुई बड़ी हिंसक घटनाओं को देखें तो इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि माओवाद अंतिम सांसें ले रहा है।

3. सरकार के एक्शन के बाद और मजबूत होते दिख रहे नक्सली
2005 में जब सलवा जुडूम मूवमेंट और नक्सलवाद का सामूहिक विरोध शुरू हुआ तो कहा गया कि ये समस्या जल्द खत्म हो जाएगी। असलियत ये है कि सलवा जुडूम के बाद कमजोर होने के बजाय माओवादी और ज्यादा ताकतवर होकर उभरे। 6 अप्रैल 2010 को हुए सुकमा हमले में 76 जवानों की शहादत, 25 मई 2013 को टॉप कांग्रेस लीडरशिप की हत्या के बाद भी नक्सलियों के जल्द खात्मे का दावा किया गया था।

4. नक्सलियों ने ऑपरेशनल एफिशियेंसी को बरकरार रखा है
नक्सलियों की हिंसक घटनाओं में बेशक कमी दिखाई दी है, लेकिन उनके संगठनों ने दोबारा खड़े होने की जबरदस्त क्षमता दिखाई है। अपने प्रभाव वाले इलाकों में ऑपरेशनल एफिशियेंसी और जमीनी क्षमताओं को इन्होंने बरकरार रखा है। ऐसे में प्रभावित इलाकों में इनके जल्द खात्मे की संभावना तो नहीं नजर आती।

5. नया बेस कैंप डेवलप कर रहे हैं नक्सली
छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा इलाके में सुरक्षा बलों ने कई नए कैंप खोले हैं। ऐसे में आने वाले समय में नक्सली एक्टिविटी कम होनी चाहिए, लेकिन इन जगहों से लगे हुए दंडकारण्य में बहुत बड़े इलाके हैं, जहां नक्सली अपने छिपने का नया ठिकाना आसानी से ढूंढ लेंगे। अबूझमाढ़ में तो नक्सली पहले से ही बहुत मजबूत स्थिति में है। 2 मार्च 2020 की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि नक्सली महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में काम करने के लिए अमरकंटक के जंगलों में नया बेस कैंप तैयार करने में जुटे हुए हैं। सीपीआई माओइस्ट ने अपनी 21 मेंबर्स की सेंट्रल कमेटी फिर से बना ली है, जो उनके पोलित ब्यूरो के बाद सबसे अहम है। ये सब संकेत है कि नक्सली खुद को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

6. शांतिपूर्ण आंदोलनों पर सरकार का रिएक्शन और बेरोजगारी चिंता की बात
आज देशभर में संवैधानिक और शांतिप्रिय तरीकों से हो रहे आंदोलनों पर जिस तरह से सरकार निगेटिव रिएक्शन दे रही है। इन आंदोलनों को नक्सलवाद से जोड़ा जा रहा है, वह चिंता की बात है। अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई और तेजी से फैलती बेरोजगारी भी ऐसे ही कारण हैं। इन सबसे नक्सलवादियों को एक मॉरल सपोर्ट मिलने की आशंका बढ़ रही है। जबकि असलियत ये है कि नक्सलवाद से आदिवासी ग्रामीण ही नहीं, पूरा देश त्रस्त है।

7. सुरक्षा बलों के ऑपरेशन और एडमिनिस्ट्रेटिव एक्शन ही समाधान नहीं
दक्षिण बस्तर में पिछले 10 साल में सुरक्षा बलों ने बहुत सारे कैंप खोले हैं। सड़कें बनाने का काम भी चल रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें भी स्पेशल स्कीम्स पर काम कर रही हैं। पर क्या एडमिनिस्ट्रेटिव एक्शन और सुरक्षा बलों के ऑपरेशन ही समस्या का समाधान हैं? दरअसल, नक्सलवाद को सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं मानना चाहिए। एडमिनिस्ट्रेशन, पुलिस और सुरक्षा बलों को साथ में लेकर प्रभावित इलाकों के सामाजिक-राजनीतिक हालात बदलने की जरूरत है। जब तक देश में नक्सलवाद पैदा करने वाली वजहें जिंदा हैं, ये समस्या बनी रहेगी।

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