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कृषि कानून वापसी का पॉलिटिकल गणित:तीन राज्यों की 314 सीटों पर किसान हावी, इस कारण BJP के लिए गेम चेंजर हो सकता है दांव

नई दिल्ली12 दिन पहले

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद केंद्रीय कैबिनेट की मुहर लगने के साथ ही तीनों कृषि कानूनों की वापसी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। 2022 की शुरुआत में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिहाज से विपक्षी दल इसे पॉलिटिकल कवायद कह रहे हैं, लेकिन चुनावों में तकनीकी तौर पर महज पांच से छह महीने का समय बचे होने से यह भी बड़ा सवाल है कि इन कानूनों से मुरझाया कमल कितना खिल पाएगा? इसके लिए कृषि कानून वापसी का पूरा पॉलिटिकल गणित और इसका प्रभाव समझना होगा।

तीन राज्य की इकोनॉमी का आधार है कृषि
अगले साल की शुरुआत में जिन पांच राज्यों में चुनाव हैं, उनमें पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर शामिल हैं। इनमें तीन राज्य पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की 75 फीसदी से ज्यादा इकोनॉमी कृषि आधारित है, यानी किसान ही नहीं मजदूर से लेकर व्यापारी तक, सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से खेती से जुडे़ हैं। खासतौर पर पंजाब और उत्तर प्रदेश की राजनीति को कृषि से जुड़े फैसले बेहद प्रभावित करते रहे हैं।

UP में 210 सीटों पर जीत-हार तय करते हैं किसान
UP की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 210 सीटों पर किसान ही जीत-हार का फैसला करते हैं। इसी फैक्टर ने पिछले एक साल से कृषि कानूनों पर अड़ियल रवैया अपनाकर बैठी सरकार को बैकफुट पर आने के लिए मजबूर किया है। भाजपा चुनावों तक किसानों को नाराज नहीं करना चाहती।

खासतौर पर वेस्ट UP में कृषि कानूनों को लेकर बनी नाराजगी ने अहम भूमिका निभाई है। यहां के जाट समुदाय ने भाजपा को UP और केंद्र में सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। यहां 12% जाट, 32% मुस्लिम, 18% दलित, OBC 30% हैं। किसान आंदोलन में दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर सबसे ज्यादा जाट समुदाय के ही किसान बैठे दिखाई दिए। इसके अलावा वेस्ट UP में ही बागपत और मुजफ्फरनगर हैं, जो जाटों के गढ़ हैं। किसान आंदोलन की अगुआई कर रही एक तरह से भारतीय किसान यूनियन का गढ़ सिसौली भी मुजफ्फरनगर में है और जाट समुदाय के परंपरागत झुकाव वाले रालोद की राजधानी कहलाने वाला छपरौली बागपत में आता है।

पंजाब की 77 सीटों पर गणित बदलेगी यह कवायद
पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से 40 अर्बन, 51 सेमी अर्बन और 26 रूरल सीट हैं। रूरल के साथ सेमी अर्बन विधानसभा सीटों पर किसानों का वोट बैंक हार-जीत का फैसला करता है। यानी 117 में से 77 सीट पर कृषि कानून की वापसी प्रभाव डाल सकती है।

किसान आंदोलन में सबसे अहम भूमिका पंजाब के किसानों ने ही निभाई है।
किसान आंदोलन में सबसे अहम भूमिका पंजाब के किसानों ने ही निभाई है।

पंजाब मालवा, माझा और दोआबा एरिया में बंटा हुआ है। सबसे ज्यादा 69 सीटें मालवा में हैं। मालवा में ज्यादातर रूरल सीटें हैं, जहां किसानों का दबदबा है। यही इलाका पंजाब की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाता है। भाजपा की निगाहें इसी इलाके में मतदाताओं के बीच सेंध लगाने पर है।

साथ ही इन कानूनों की वापसी से जहां कांग्रेस छोड़कर नया दल बनाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह और भाजपा के गठबंधन की राह साफ हुई है, वहीं कृषि कानूनों के मुद्दे पर भाजपा का साथ छोड़ने वाले अकाली दल के भी दोबारा गले मिलने की संभावना बन गई है।

उत्तराखंड की 70 में से 27 सीट के बदलेंगे समीकरण
उत्तराखंड के छोटा राज्य होने के बावजूद वहां का पूरा मैदानी इलाका कृषि आधारित काम-धंधों वाला ही है। राज्य विधानसभा में 70 सीटें हैं, जिनमें राजधानी देहरादून समेत मैदान के चार जिलों की 27 सीटों पर किसान की नाराजगी बेहद अहम साबित होती है।

देहरादून जिले की विकासनगर, सहसपुर, डोईवाला और ऋषिकेश सीट, हरिद्वार जिले में शहर सीट को छोड़कर 11 में से 10 सीट, उधमसिंह नगर की नौ, नैनीताल जिले की रामनगर, कालाढूंगी, लालकुआं और हल्द्वानी विधानसभा सीट पर किसान खेल बदल सकते हैं। यहां का किसान 2022 के चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठा था, लेकिन अब कृषि कानूनों की वापसी से भाजपा डैमेज कंट्रोल में कामयाब हो सकती है।